For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

हमे अजमाने की कोशिश न कर

हमे आजमाने की कोशिश न कर

जरा दूर जाने की कोशिश न कर



अगर साथ चलने गवारा न हो .

(तो) बहाने बनाने की कोशिश न कर.



मेरा दामन तुम्हारे लिए ही बना ,

ये कह कर लुभाने की कोशिश न कर .



सिर्फ तेरे आंसू ही मांगे हैं ,अब,

देख ले भाग जाने की कोशिश न कर .



तेरा इतिहास का पोथा थोथा छोडो ,

'आज ' से भाग पाने की कोशिश न कर .



कल अँधेरे में थे; दीप अब है जला .

दीप से मुंह फिराने की कोशिश न कर.



दीप… Continue

Added by DEEP ZIRVI on October 12, 2010 at 6:30am — 3 Comments

ग़ज़ल

हर दिन जमाना दिल को मेरे आजमाता है,
मिलता है जो भी, बात उसकी ही चलाता है.

मालूम है मुझको की आईना है सच्चा पर,
ये आजकल, सूरत उसी, की ही दिखता है.

पीना नहीं चाहा कभी मैने यहाँ फिर भी,
मयखाने का साकी, ज़बरदस्ती पिलाता है.

सच है खुदा तू ही मदारी है जहाँ का बस,
हम सब कहाँ है नाचते, तू ही नचाता है.

"मासूम" अब रोना नहीं दुनिया मे ज़्यादा तुम,
इस आँख का पानी उठा सैलाब लाता है.

Added by Pallav Pancholi on October 12, 2010 at 12:00am — 1 Comment

आपस में भाइयों को लड़ाकर चला गया

शैतान अपना काम बनाकर चला गया

आपस में भाइयों को लड़ाकर चला गया



फिर आदतन वो मुझको सताकर चला गया

हँसता हुआ जो देखा रुलाकर चला गया



उल्फत का मेरी कैसा सिला दे गया मुझे

पलकों पे मेरी अश्क सजाकर चला गया



"जाने से जिसके नींद न आई तमाम रात"

वो कौन था जो ख्वाब में आकर चला गया



बदनाम कर रहा था जो मुझको गली गली

देखा मुझे तो नज़रें झुकाकर चला गया



कातिल को जब वफाएं मेरी याद आ गयीं

तुरबत पे मेरी अश्क बहाकर चला… Continue

Added by Hilal Badayuni on October 11, 2010 at 11:00pm — 5 Comments

निर्बाध प्रहशन



मैंने पूछा था

तट की गीली रेत से

जीवन क्या है

और क्या है

तेरी नियति ?

कुचली जाती पैरों से

क्या हुआ विलुप्त

दर्द की

अनुभूति !!!?



उसने हँसकर

कहा-

जीवन क्या

और मरण क्या

नश्वरता का है

प्रहशन ,

कूल**

परिवर्तन

ही बंधन है

मध्य है

जीवन की

निर्बाध गति ।

~शशि रंजन मिश्र



** कूल=… Continue

Added by Shashi Ranjan Mishra on October 11, 2010 at 7:00pm — 1 Comment

लघुकथा: मोहनभोग -संजीव वर्मा 'सलिल'

लघुकथा: मोहनभोग

-संजीव वर्मा 'सलिल'

*

*

'हे प्रभु! क्षमा करना, आज मैं आपके लिये भोग नहीं ला पाया. मजबूरी में खाली हाथों पूजा करना पड़ रही है.



' किसी भक्त का कातर स्वर सुनकर मैंने पीछे मुड़कर देखा.



अरे! ये तो वही सज्जन हैं जिन्होंने सवेरे मेरे साथ ही मिष्ठान्न भंडार से भोग के लिये मिठाई ली थी फिर...?



मुझसे न रहा गया, पूछ बैठा: ''भाई जी! आज सवेरे हमने साथ-साथ ही भगवान के भोग के लिये मिष्ठान्न लिया था न? फिर आप खाली हाथ कैसे? वह मिठाई क्या… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on October 11, 2010 at 6:30pm — 3 Comments

जनक छंदी मुक्तिका: सत-शिव-सुन्दर सृजन कर ------- संजीव 'सलिल'

जनक छंदी मुक्तिका:



सत-शिव-सुन्दर सृजन कर



संजीव 'सलिल'



*

*



सत-शिव-सुन्दर सृजन कर,



नयन मूँद कर भजन कर-



आज न कल, मन जनम भर.







कौन यहाँ अक्षर-अजर?



कौन कभी होता अमर?



कोई नहीं, तो क्यों समर?





किन्तु परन्तु अगर-मगर,



लेकिन यदि- संकल्प कर



भुला चला चल डगर पर.





तुझ पर किसका क्या असर?



तेरी किस पर क्यों नज़र?



अलग-अलग जब… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on October 11, 2010 at 5:55pm — 1 Comment

इंतज़ार ...

मैं करता हूँ तेरा इंतज़ार प्यार में ,
प्यार करता है तेरा इंतज़ार मुझमे ..

शाम से ही रोशन ये चाँद ,
पलकें झपकते ये सितारे तमाम ,
ख्वाबों की बार बार आती जाती मुस्कान ,
हैं सभी बेचैन तेरे इंतज़ार में..

हवाएं ,
लहरें
और मैं
इंतज़ार का ही हैं नाम , प्यार में..

ख़ामोशी करती है प्यार
और प्यार करता है ख़ामोशी,
मैं करता हूँ दोनों
प्यार और खामोश इंतज़ार ...

Added by Veerendra Jain on October 11, 2010 at 1:20pm — 2 Comments

दूर तुम हो पास अब तन्हाई है

दूर तुम हो पास अब तन्हाई है

ज़िंदगी किस मोड़ पर ले आई है



हुस्न वाले चैन छीने दर्द दें

अक्ल अब जा के ठिकाने आई है



काटनी होगी फसल तन्हाई की

पर्वतों सी हो गयी ये राई है



रात आधी चाँद पूरा नींद गुम

चोट दिल की भी उभर सी आई है



आजकल क्यूँ गुम से रहते हो बड़े

मुझसे पूछे रोज मेरी माई है



तुम न हो तो फ़िक्र करते सब मेरी

दोस्त पूछे, ध्यान रखता भाई है



दिल न लगता है किसी भी अब जगह

दिल लगाने की सज़ा यूँ पाई… Continue

Added by vikas rana janumanu 'fikr' on October 11, 2010 at 1:00pm — 5 Comments

ज़माना याद रखे जो ,कभी ऐसा करो यारो .

ज़माना याद रखे जो ,कभी ऐसा करो यारो .

अँधेरे को न तुम कोसो, अंधेरों से लड़ो यारो .



निशाने पे नज़र जिसकी ,जो धुन का हो बड़ा पक्का ;

'बटोही श्रमित हो न बात जाये जो ' बनो यारो .



जगत में भूख है ,तंगी - जहालत है जहां देखो ;

करो सर जोड़-कर चारा चलो झाडू बनो यारो .



रखे जो आग सीने में, जो मुख पे राग रखता हो ;

अगर कुछ भी नही तो राग दीपक तुम बनो यारो .





नदी भी धार बहती है,लहू भी धार बहती है ,

जो धारा प्रेम की लाये वो भागीरथ बनो यारो… Continue

Added by DEEP ZIRVI on October 10, 2010 at 6:59pm — 5 Comments

खिलौना अपने दिल का

खिलौना अपने दिल का हम तुम्हे फौरन दिला देते;
तुम्हे एस की जरूरत है;अगर तुम ये बता देते .
कभी इस से कहा तुम ने कभी उस से कहा तुम ने ;
मुझे अपना समझ क्र तुम कभी दिल की सुना देते .
deepzirvi@yahoo.co.in

Added by DEEP ZIRVI on October 10, 2010 at 6:55pm — 1 Comment

आदमी को ढूढने में खो गया है आदमी .

आदमी को ढूढने में खो गया है आदमी.
आँख है खुली मगर सो गया है आदमी.

खुद जला है रातदिन खुद मिटा है रातदिन ;
और खुद की खोज में ,लो गया है आदमी .

घर बना सका नही वो तमाम उम्र में ;
रात दिन बेशक कमाई को गया है आदमी.

एक दिल की दास्ताँ ये दास्ताँ नही सुनो;
दिल्लगी से दिल लगाई हो गया है आदमी.

दीप हर डगर जले ,हर नगर ख़ुशी पले;
बीज हसीन ख्वाब से बो रहा है आदमी
------------------------------------

Added by DEEP ZIRVI on October 10, 2010 at 6:30pm — 1 Comment

रौशनी-अँधेरे का तो रहा बखेडा है

सूरजों की बस्ती थी, जुगनुओं का डेरा है ,

कल जहा उजाला था अब वहां अँधेरा है.



राह में कहाँ बहके, भटके थे कहाँ से हम ,

किस तरफ हैं जाते हम, किस तरफ बसेरा है.



आदमी न रहते हों बसते हों जहां पर बुत ,

वो किसी का हो तो हो, वो नगर न मेरा है.



रहबरों के कहने पर रहजनों ने लूटा है ,

रौशनी-मीनारों पे ही बसा अँधेरा है .



मछलियों की सेवा को जाल तक बिछाया है ,

आजकल समन्दर में गर्दिशों का डेरा है.



दीप को तो जलना है, दीप तो जलेगा ही… Continue

Added by DEEP ZIRVI on October 10, 2010 at 6:30pm — 2 Comments

हाइकु मुक्तिका: जग माटी का... संजीव 'सलिल'

हाइकु मुक्तिका:



संजीव 'सलिल'

*

*

जग माटी का / एक खिलौना, फेंका / बिखरा-खोया.



फल सबने / चाहे पापों को नहीं / किसी ने ढोया.

*

गठरी लादे / संबंधों-अनुबंधों / की, थक-हारा.



मैं ढोता, चुप / रहा- किसी ने नहीं / मुझे क्यों ढोया?

*

करें भरोसा / किस पर कितना, / कौन बताये?



लूटे कलियाँ / बेरहमी से माली / भंवरा रोया..

*

राह किसी की / कहाँ देखता वक्त / नहीं रुकता.



साथ उसी का / देता चलता सदा / नहीं जो… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on October 10, 2010 at 2:39pm — 6 Comments

एक प्रतिभागी की व्यथा-कथा

मैं तो बस एक प्रतिभागी हूं.



वक्ता के समर्थन में



सिर हिलाना ही



मेरी नियति है.



संवाद बोलने को तरसता,



एक्सप्रेशन्स दर्शाने को लालायित,



मूव्मेंट्स करने को निषिद्ध,



किंकर्तव्यविमूढ़ सा,



अश्व की भाँति



सिर हिलाता,



मन ही मन



परमात्मा से विनती करता रहता हूं,



कि हे ईश्वर,



ये वक्तागण ख़ूब ग़लतियाँ करें.



ताकि मुझ 'एक्सट्रा कलाकार' की,



एक दिन की… Continue

Added by moin shamsi on October 10, 2010 at 12:56pm — No Comments

गज़ल:हमारा शक ...

हमारा शक सही हो ऐसा अक्सर नहीं होता,

हर आदमी के हाँथ में पत्थर नहीं होता.



मेरे दुखों की बाबत मुझसे न पूछिए,

जो ज्वार को रोये वो समुन्दर नहीं होता.



मैं अपने घर के लोगों से मिलता हूँ उसी रोज,

जिस रोज मेरे घर मेरा दफ्तर नहीं होता.



सच बोलता हूँ मान न होने का गम नहीं,

नासूर कितने होते जो नश्तर नहीं होता.



कितने बरस से बन रही हैं योजनाएं पर,

लाखों हैं जिनके सर पर छप्पर नहीं होता.



गढ़ते हैं किले आपके कर पेट पीठ एक,

उनको… Continue

Added by Abhinav Arun on October 10, 2010 at 10:00am — 2 Comments

गज़ल:याद जाने कहाँ

याद जाने कहाँ खो गयी,

बात आयी गयी हो गयी .



दिन में हल मैं चलाता रहा,

रात में बीज वो बो गयी.



बंद थीं मछलियाँ जार में,

तितली पानी से पर धो गयी.



बाद मुद्दत के आयी खुशी ,

मेरे हालात पर रो गयी.



तुमने बच्ची को डाटा बहुत ,

लेके टेडी बीयर सो गयी.



उसकी यादों में खोया था मैं,

इसका तस्कीन कर वो गयी.



एक नौका नदी से मिली ,

और मंझधार में खो गयी.



माँ ने कुछ भी तो पूछा न था,

कैसे मन को मेरे टो… Continue

Added by Abhinav Arun on October 10, 2010 at 10:00am — 1 Comment

गज़ल:उसकी हद उसको..

उसकी हद उसको बताऊंगा ज़रूर,

बाण शब्दों के चलाऊंगा ज़रूर.



इस घुटन में सांस भी चलती नहीं,

सुरंग बारूदी लगाऊंगा ज़रूर.



यह व्यवस्था एक रूठी प्रेयसी,

सौत इसकी आज लाऊंगा ज़रूर.



सच के सारे धर्म काफिर हो गए,

झूठ का मक्का बनाऊंगा ज़रूर.



इस शहर में रोशनी कुछ तंग है,

इसलिए खुद को जलाऊंगा ज़रूर.



आस्था के यम नियम थोथे हुए,

रक्त की रिश्वत खिलाऊंगा ज़रूर.



आख़री इंसान क्यों मायूस है ,

आदमी का हक दिलाऊंगा… Continue

Added by Abhinav Arun on October 10, 2010 at 9:30am — 2 Comments

"रंग"



जीवन... जीतें हैं लोग...

वही... जो, जैसा मिल जाता है उन्हें...

पर इस एक जीवन में... है एक और जीवन...

जिसे, अक्सर भूल जातें हैं हम...

वो है 'रंगों' का जीवन...

हर रंग एक जीवन खुद में...

हर जीवन एक रंग खुद में....

हर रंग की अपनी कहानी...

हर कहानी का अपना रंग...

खुशियाँ, उदासियाँ, उल्लास, विश्वास...

जीवन की तरह हर मोड़ है यहाँ...

हर खुशबू है, हर सपना है...



कभी उदासी में साथ… Continue

Added by Julie on October 9, 2010 at 5:00pm — 10 Comments

घर - एक नज़्म

चाँद घुटनों पे पड़ा था

अम्बर की किनारी पे



शब-ए-काकुल मे

तरेड़ पड़ गयी थी

चांदनी की .......

"जैसे तेरी कोरी मांग,

मैंने अभी भरी नहीं "



माँ ने अंजल भर के तारो से

चरण-अमृत छिड़का हो

सारा आसमान जैसे सजाया हो

आरती की थाली की मानिंद

तेरा गृह-प्रवेश करने के लिए ....... !



.. पर इतना बड़ा आसमान

कैसे मेरे छोटे से घर मे समाता .....



" अच्छा होता मैं घर ही न बनाता"

मैं घर ही न बनाता ...… Continue

Added by vikas rana janumanu 'fikr' on October 9, 2010 at 3:30pm — 6 Comments

..... जलने दो

(सब से पहले यहीं पर प्रस्तुती कर रहा हूँ इस रचना की , आशीर्वाद दीजियेगा)





जलने दो मुझे जलने दो ,अपनी ही आग में जलने दो .

ये आग जलाई है में ने , मुझे अपनी आग में जलने दो .



तू मेरी चिंता मत करना ,ठंडी आहें भी मत भरना ;

मैं जलता था मैं जलता हूँ ,सम्पूर्णता को मचलता हूँ ,

मन मचल रहा है मचलने दो ;मुझे अपनी आग में जलने दो .





दाहक,दैहिक पावक न ये ,मानस तल का दावानल है,

ज्वाला मैं जन्म पिघलने दो ,मन को शोलों में ढलने दो

मुझे जलने दो… Continue

Added by DEEP ZIRVI on October 9, 2010 at 3:00pm — 2 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Monday
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service