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July 2016 Blog Posts

मक्खियाँ (लघुकथा) राहिला

सौम्या की खास सहेली काफ़ी जतन के बाद भी लन्दन से शादी के एक दो दिन पहले ना पहुँच, ठीक उसी दिन पहुँच पायी।अपनी प्रिय सखी की पसंद को लेकर उसके मन में काफ़ी सवाल थे,जो मौका पाते ही निकल पड़े।

"तू बस एक वजह बता दे इस कोयले की खान से शादी करने की?"उसने एक नज़र स्टेज पर खड़े उसके दूल्हे डाल कर कहा।

"तमीज से बोल रमा!इतना तो याद रख ,तू मेरे पति के बारे में बात कर रही है।"

"अच्छा!!खूब ,जरा देख..,अपने पूरे कुटुंब को एक नज़र।इतनी हेठी शख्सियत तो तेरे ड्राइवर की भी नहीं।"

"शक्ल…

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Added by Rahila on July 1, 2016 at 3:00pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पुत्र प्राप्ति मन्त्र (लघु कथा 'राज ')

 “अरे..अरे रे रे ....  ये क्या कर रहे हो दिमाग तो खराब नहीं हो गया आप लोगों का... किराए दार  होकर बिना बताये मेरे ही घर में ये तोड़ फोड़ क्यूँ?” घर के मुख्य द्वार जिसपर उसके स्वर्गीय पति का नाम लिखा था मजदूरों द्वारा हथौड़े से तोड़ते हुए देखकर आपा खो बैठी सावित्री|

“अरे कोई कुछ बोलता क्यूँ नहीं बंद करो ये सब वरना अभी पुलिस को बुलाती हूँ”

“हाँ बुला लीजिये आंटी जी ताकि आज आपको भी पता लगे किरायेदार कौन है वो तो मेरे सास ससुर ने अब तक मेरा व् मेरे पति का मुँह बंद कर रखा था आज कल…

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Added by rajesh kumari on July 1, 2016 at 10:00am — 10 Comments

गजल(आहटों से डर रहा....)

2122 2122 212

आहटों से डर रहा वह अाजकल

चाहतों का बस हुआ वह आजकल।1



फूल को समझा रहा है असलियत

सुरभियों को डँस रहा वह अाजकल।2



शब्द मय चुभते नुकीले दुर्ग में

राह भूला,है फँसा वह अाजकल।3



बात की गहराइयाँ समझे बिना

तंज बेढब कस खड़ा वह आजकल।4



रोशनी की चाह में खुद को भुला

हो गया है अलबला वह अाजकल।5



आदमी लगता कभी सुलझा हुआ

फिर लगा खुद ही ठगा वह अाजकल।6



चादरें हैं श्वेत सबको क्या पता

काजलों में है रँगा… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 1, 2016 at 6:30am — 8 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - भूल जा संवेदना के बोल प्यारे // --सौरभ

२१२२ २१२२ २१२२



फ़र्क करना है ज़रूरी इक नज़र में

बदतमीज़ों में तथा सुलझे मुखर में



शांति की वो बात करते घूमते हैं

किन्तु कुछ कहते नहीं अपने नगर में



शाम होते ही सदा वो सोचता है-

क्यों बदल जाता है सूरज दोपहर में



भूल जा संवेदना के बोल प्यारे

दौर अपना है तरक्की की लहर में



हो गया बाज़ार का ज्वर अब मियादी

और देहाती दवा है गाँव-घर में



आदमी तो हाशिये पर हाँफता है

वेलफेयर-योजनाएँ हैं…

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Added by Saurabh Pandey on July 1, 2016 at 12:30am — 30 Comments

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