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दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंच



अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।

जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।



यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक ।

कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द  अतिरेक ।।



निश्चित सबको छोड़ना, जीवन का यह मंच ।

पर्दा गिरते ही मिटें , झूठे सभी प्रपंच ।।



आदि - अन्त के मध्य को, मंच करे साकार ।

इस जीवन के सत्य को, कहते हैं संसार ।।



आया जो इस मंच पर, गूँजे उसका नाम ।

हुआ अँधेरा बोलता , किरदारों का काम ।।



करे… Continue

Added by Sushil Sarna on May 30, 2026 at 2:42pm — 4 Comments

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए

जंगल का कानून है पहला, चुप रहिए

मँहगाई से पागल जनता, चुप रहिए

पूँजीपति को सारी सुविधा, चुप रहिए

 

प्रश्न…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 30, 2026 at 10:17am — 3 Comments

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,

लंबी है कहानी, फिर कभी।

मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,

वो धुंधली सी निशानी, फिर कभी।

अभी तो ज़ख्म ही ताज़ा बहुत हैं,

वो यादों की ज़बानी, फिर कभी।

अकेलेपन से दोस्ती कर ली है मैंने,

तुम्हारी मेहरबानी, फिर कभी।

मिरी जुनूँ की दीवानी न देखी तुमने,

वहशतों का ये मंज़र, फिर कभी।

लबों पर ठहरी है बात जो अब तलक, 

वही बे-ज़ुबानी, फिर कभी।

ख़लाओं में जो ढूँढती है तुम्हें, 

हमारी हैरानी, फिर…

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Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on May 29, 2026 at 12:45pm — 1 Comment

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है

 

समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।।

 

समय का खेल कुछ यूँ है कि कट जाए हो जैसा भी

कहीं गर हो बुरा तो भी ये अनुभव ही कराता है।।

 

बड़ा बलवान होता है समय इसकी बड़ी बातें

कोई कितना भी सँभले पर निवाला हो ही जाता है।।

 

समय को जिन्दगी में जो समझ ले है समय उसका

अजब हैं…

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Added by Awanish Dhar Dvivedi on May 19, 2026 at 4:45pm — No Comments

माँ

माँ यह शब्द नहींं केवल

इस जग की माँ से काया है।

हम सबकी खातिर अतिपावन

माँ के आँचल की छाया है।१।

माँ यह विषय अलौकिक है

परब्रह्म जीव के जैसा ही।

माँ इस सृष्टि की अनुपम है

कारक ईश्वर है ऐसा ही।२।

माता बच्चों की होती है

पालक सर्जक शुभ सुखराशी।

माँ की गोदी में पलते हैं

अज विष्णु ईश प्रभु अघनाशी ।३।

हैं शास्त्र सदा से ही कहते

माँ की पद्वी सर्वोत्तम है।

माँ का स्नेहामृत पाने को

जग में…

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Added by Awanish Dhar Dvivedi on May 19, 2026 at 4:42pm — No Comments

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें



बेगुनाही और

इन्साफ की

बात क्यों सोचती हैं ये औरतें

चुपचाप अहिल्या बन क्यों नहीं जातीं  ?


अस्मिता और

सवाल उठाने की

बात क्यों सोचती हैं ये औरतें

चुपचाप द्रौपदी बन क्यों नहीं जातीं …
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Added by amita tiwari on May 14, 2026 at 10:00pm — 1 Comment

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,

एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।

दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे हैं,

और हम... जो खेतों से कटकर आ रहे हैं।

वे हमारे 'अधिकार' नहीं निचोड़ते,

वे हमारे भीतर कहीं आत्मा तक निचोड़ते हैं।

पहले वे मीठी बातें करते हैं, जैसे शक्कर की चाशनी,

फिर हमें परतों में दबाकर,

हमारा 'रक्त' मत पेटियों (ईवीएम) के गिलास में भर लेते हैं।

जब चुनावी कोल्हू रुकता है,

तब हम इंसान नहीं बचते...

हम…

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Added by आशीष यादव on May 11, 2026 at 9:33am — 1 Comment

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत मनुष्य को संवेदनहीन कर रहा है. यह मोबाइल का युग जिसने सबको अपनी गिरफ्त में ले रखा है जिससे नवजात बच्चे तक अछूते नहीं हैं . इसी को ध्यान में रखकर मैंने मुख्य शीर्षक मशीनी मनुष्य के अंतर्गत कई कविताओं को लिखने की कोशिश की है.

01

शीर्षक: कारपोरेट कीबोर्ड 

उंगलियाँ नाचती हैं…

मकाम पर नहीं, काली कुंजियों के मैदान…

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Added by आशीष यादव on April 20, 2026 at 12:31am — No Comments

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ

अमर तो नहीं होती

एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को

फिर भी

जानते बूझते भी मन को ये क्या हो जाता है…
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Added by amita tiwari on April 14, 2026 at 7:30pm — 3 Comments

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजते

भावनात्मक अवरोधों के दबाव में

कभी ऐसा भी तो होता है ...



समय समय से रूठ जाता है

प्यार रूठता नहीं

प्यार सूख जाता है

वह पहचाना नहीं जाता तब

पतझड़ में पत्तों की तरह

पीला, सूखा ... कुम्लाहया



एक असहनीय दर्द

शब्द गले में अटके

अधरों तक आए, भारी

और भारी

कुछ भी कहने में असमर्थ

रिश्ते के मुड़े पन्नों पर कुछ आँसू

बह-बह जाती है शब्दों की स्याही

व्यथा का मूल स्रोत खोजती



कितनी तीव्र… Continue

Added by vijay nikore on April 14, 2026 at 8:19am — 1 Comment

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्र



ठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।

कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।



यादों में ही रह गए , हसीं उम्र के साल ।

करें अधूरी हसरतें , मन में बड़ा मलाल ।।



मुड़ - मुड़ देखे उम्र जो, पीछे छूटे मोड़ ।

क्या है अपने पास अब, क्या आए हम छोड़ ।।



रही शिकायत वक्त से, गया उम्र जो छीन ।

कहाँ वक्त की धुंध में, लम्हे गए हसीन ।।



उम्र ढली रहने लगे, दूर - दूर सब लोग ।

तनहा बैठे भोगते , तनहाई का रोग ।।



घटता… Continue

Added by Sushil Sarna on April 6, 2026 at 12:48pm — 3 Comments

कुंडलिया

दरियादिल हो बाप जब, करता कन्यादान।

दयावान भगवान हो, रखता उसका मान।

रखता उसका मान, भात नरसी-सा भरता।

आठ पहर धन-धान्य, वस्त्र की वर्षा करता।

कहते कवि 'कल्याण', मिले तब जीवन साहिल।

करके कन्यादान, दिखाए जब दरियादिल।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on March 31, 2026 at 8:30pm — 2 Comments

प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर

प्यादे : एक संख्या भर

प्यादे— बेकसूर, बेख़बर, नियति और नीति से अनजान—

अक्सर मान लिये जाते हैं

मात्र एक संख्या भर।

तैनात कर दिये जाते हैं महाराज-महारानी के गिर्द रक्षा-कवच बनकर,

और उसी क्षण

उनकी पहचान सिमट जाती है—

एक संख्या भर।

वे मात खाते हैं, कभी मात दिलाते भी हैं, गिरते हैं, उठते हैं,

और फिर गिरा दिये जाते हैं—

इतनी सहजता से

कि किसी को

कोई फ़र्क नहीं…

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Added by amita tiwari on March 30, 2026 at 10:31pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . .विविध

दोहा सप्तक. . . . . . विविध



कभी- कभी तो कीजिए, खुद से खुद की बात ।

सुलझेंगे उलझे हुए,  अंतस के हालात ।।



खामोशी से पूछिए, क्या है उसका दर्द ।

किन राहों की है भरी, उसमें इतनी गर्द ।।



लफ्ज अकेले हो गए, ठहर गए जज्बात ।

कोई अपना दे गया, दिल को वह आघात ।।



हुई उम्र तो सामने, उभरी हर तस्वीर ।

रुखसारों पर दर्द की, शेष रही तहरीर ।।



रेजा - रेजा हो गए, जीवन के सब ख्वाब ।

चश्मे साहिल पर रहे, यादों के सैलाब ।।



लहरों सी… Continue

Added by Sushil Sarna on March 23, 2026 at 1:53pm — 1 Comment

दोहा पंचक. . . . .अधर

दोहा पंचक. . . . . अधर

अधरों को अभिसार का, मत देना  इल्जाम ।

मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम ।।

उन्मादी आवेग में , कब कुछ रहता ध्यान ।

अधरों की शैतानियाँ, कहते सुर्ख निशान ।।

अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल शाम ।

जज्बातों के वेग में, बंध हुए बदनाम ।।

अधर समागम जब हुआ, खूब हुआ संग्राम ।

स्पर्शों के दौर में , बिखर गये सब जाम ।।

अधर दलों पर डोलता, जब दिल का ईमान ।

बेशर्मी के पार सब, दिल करता सोपान ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on March 17, 2026 at 2:29pm — 1 Comment

आत्म मुग्ध मदारी

Continue

Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:07am — No Comments

भ्रम सिर्फ बारी का है

भ्रम सिर्फ बारी का है

************************************



बरसों बरस लगे

बीज को बहलाने में

भरपूर दरखत बनाने में





बरसात नहलाती रही

धूप सहलाती रही

हवा आती रही

हवा जाती रही

बरसों बरस लगे धरा को

जड़ो की जगह बनाने में

बीज को दरख्जत बनाने में







और…
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Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:05am — 2 Comments

निर्वाण नहीं हीं चाहिए

निर्वाण नहीं हीं चाहिए
---------------------------
कैसा लगता होगा
ऊपर से देखते होंगे जब
माँ -बाबा
कि जिस
मुकाम मकान दुकान
खानदान के नाम को
कमाने में
सारी उम्र लगाई
पाई पाई बचाई
खुली खुशी
संतति को थमाई…
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Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:00am — No Comments

दोहा सप्तक. . . .युद्ध

दोहा सप्तक. . . . . युद्ध

हरदम होता युद्ध का, विध्वंसक परिणाम ।

बेबस जनता भोगती ,  इसका हर  अंजाम ।।

दो देशों के मध्य जब, होता है संग्राम ।

जाने कितने चेहरे , हो जाते गुमनाम ।।

कौन करेगा आकलन , कितना हुआ विनाश ।

मौन भयंकर छा गया, काला हुआ प्रकाश ।।

जंग चलेगी जब तलक, होगा बस संहार ।

खण्डहरों के ढेर पर, सब होंगे लाचार ।।

जन-धन का हर युद्ध में, होता है नुकसान ।

हार- जीत के द्वन्द्व में, हारे बस  इंसान ।।

देख विदारक दृश्य को,…

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Added by Sushil Sarna on March 13, 2026 at 2:49pm — No Comments

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है

कितने दुःख दर्द से भरा दिल है

ये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बाती

पास उनके जो सुनहरा दिल है

ताज इक सब के मन के अंदर भी

और ये शह्र आगरा दिल है

दिल लगी दिल्लगी नहीं होती

इक ग़ज़ब का मुहावरा दिल है

देखकर उनकी मदभरी आँखें

खो गया मेरा मदभरा दिल है

याद मुद्दत से वो नहीं है 'जय'

आज फिर क्यूँ भरा भरा दिल है

मौलिक एवं…

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Added by Jaihind Raipuri on March 4, 2026 at 10:00pm — 2 Comments

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