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Sanjiv verma 'salil''s Blog – January 2013 Archive (14)

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: संजीव 'सलिल'

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:

लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर

संजीव 'सलिल'

*

लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर

भारत माता का वंदन...



हम सब माता की संतानें,

नभ पर ध्वज फहराएंगे.

कोटि-कोटि कंठों से मिलकर

'जन गण मन' गुन्जायेंगे.

'झंडा ऊंचा रहे हमारा',

'वन्दे मातरम' गायेंगे.

वीर शहीदों के माथे पर

शोभित हो अक्षत-चन्दन...



नेता नहीं, नागरिक बनकर

करें देश का नव निर्माण.

लगन-परिश्रम, त्याग-समर्पण,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 26, 2013 at 8:00am — 12 Comments

षटपदियाँ

सामयिक षटपदियाँ:

संजीव 'सलिल'

*

मानव के आचार का स्वामी मात्र विचार.

सद्विचार से पाइए, सुख-संतोष अपार..

सुख-संतोष अपार, रहे दुःख दूर आपसे.

जीवन होगा मुक्त, मोहमय महाताप से..

कहे 'सलिल' कुविचार, नाश करते दानव के.

भाग्य जागते निर्बल होकर भी मानव के..

***

हार न सकती मनीषा, पशुपति दें आशीष.

अपराजेय जिजीविषा, सदा साथ हों ईश..

सदा साथ हों ईश, कैंसर बाजी हारे.

आया है युवराज जीत, फिर ध्वज फहरा रे.

दुआ 'सलिल' की, मौत इस तरह मार न…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 24, 2013 at 3:00pm — 6 Comments

मत्त गयंद (सवैया): संजीव 'सलिल'

मत्त गयंद (सवैया):
संजीव 'सलिल'
*
मत्त गयन्द सुछन्द  मनोहर, ज्यों गुलकंद मधुर मन भाया
आत्मज सम यश-कीर्ति बढ़ा, कवि-तात का लाड़ निरंतर पाया
झूम उठे थे शेष न शेष रहा धीरज, जब छंद सुनाया.
घबराये नर-नार कहें, क्यों इंद्र ने भू पर वज्र चलाया..
*

Added by sanjiv verma 'salil' on January 21, 2013 at 5:00pm — 3 Comments

सामयिक गीत: पंच फैसला... संजीव 'सलिल'

सामयिक गीत:

पंच फैसला...

संजीव 'सलिल'

*

पंच फैसला सर-आँखों,

पर यहीं गड़ेगा लट्ठा...

*

नाना-नानी, पिता और माँ सबकी थी ठकुराई.

मिली बपौती में कुर्सी, क्यों तुम्हें जलन है भाई?

रोजगार है पुश्तों का, नेता बन भाषण देना-

फर्ज़ तुम्हारा हाथ जोड़, सर झुका करो पहुनाई.

सबको अवसर? सब समान??

सुन-कह लो, करो न ठट्ठा...

*

लोकतंत्र है लोभतन्त्र, दल दाम लगाना जाने,

भौंक तन्त्र को ठोंकतन्त्र ने दिया कुचल…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 21, 2013 at 4:00pm — 3 Comments

मुक्तक : रूप की आरती (संजीव 'सलिल')

मुक्तक

रूप की आरती

संजीव 'सलिल'

*

रूप की आरती उतारा कर.

हुस्न को इश्क से पुकारा कर.

चुम्बनी तिल लगा दे गालों पर-

तब 'सलिल' मौन हो निहारा कर..

*

रूप होता अरूप मानो भी..

झील में गगन देख जानो भी.

देख पाओगे झलक ईश्वर की-

मन में संकल्प 'सलिल' ठानो भी..

*

नैन ने रूप जब निहारा है,

सारी दुनिया को तब बिसारा है.

जग कहे वन्दना तुम्हारी थी-

मैंने परमात्म को गुहारा है..

*

झील में कमल खिल रहा कैसे.

रूप…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 21, 2013 at 9:30am — 3 Comments

गीत : भूल जा / संजीव 'सलिल'

भूल जा

संजीव 'सलिल'

*

आईने ने कहा: 'सत्य-शिव' ही रचो,

यदि नहीं, कौन 'सुन्दर' कहाँ है कहो?

लिख रहे, कह रहे, व्यर्थ दिन-रात जो-

ढाई आखर ही उनमें तनिक तुम तहो..'



ज़िन्दगी ने तरेरीं निगाहें तुरत,

कह उठी 'जो हकीकत नहीं भूलना.

स्वप्न तो स्वप्न हैं, सच समझकर उन्हें-

गिर पड़ोगे, निराधार मत झूलना.'



बन्दगी थी समर्पण रही चाहती,

शेष कुछ भी न बाकी अहम् हो कहीं.

जोड़ मत छोड़ सब, हाथ रीते रहें-

जान ले, साथ जाता कहीं कुछ…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 20, 2013 at 2:00pm — 6 Comments

पाठक नामा- मेरी आपबीती: बेनज़ीर भुट्टो 2

पाठक नामा- मेरी आपबीती: बेनज़ीर भुट्टो 2  

संजीव 'सलिल'

*

१९७१ के बंगला देश समर पर बेनजीर :



==''...मैं नहीं देख पाई कि लोकतान्त्रिक जनादेश की…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 17, 2013 at 6:54pm — 3 Comments

राजनैतिक षड्यंत्र का शिकार हिंदी...संजीव वर्मा 'सलिल'

विशेष आलेख

      राजनैतिक षड्यंत्र का शिकार हिंदी …

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 14, 2013 at 12:00pm — 10 Comments

पाठक नामा- मेरी आपबीती: बेनज़ीर भुट्टो पर संजीव 'सलिल'

पाठकनामा:

संजीव 'सलिल'

*

गत दिनों बेनजीर भुट्टो की लिखी पुस्तक मेरी आपबीती पढ़ी. मेरे पिता की हत्या, अपने ही घर में बंदी, लोकतंत्र का मेरा पहला अनुभव, बुलंदी के शिखर छूते ऑक्सफ़ोर्ड के सपने, जिया उल हक का विश्वासघात, मार्शल लॉ को लोकतंत्र की चुनौती, सक्खर जेल में एकाकी कैद, करचे जेल में- अपनी माँ की पुरानी कोठारी में बंद, सब जेल में अकेले और २ वर्ष, निर्वासन के वर्ष, मेरे भाई की मौत, लाहौर वापसी और १९८६ का कत्ले-आम, मेरी शादी, लोकतंत्र की नयी उम्मीद, जनता की जीत,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 12, 2013 at 8:00pm — 6 Comments

हाइकु मुक्तिका: संजीव 'सलिल'

हाइकु मुक्तिका:संजीव 'सलिल'

*

जग माटी का

एक खिलौना, फेंका

बिखरा-खोया.

फल सबने

चाहे पापों को नहीं

किसी ने ढोया.

*

गठरी लादे

संबंधों-अनुबंधों

की, थक-हारा.

मैं ढोता, चुप

रहा- किसी ने नहीं

मुझे क्यों ढोया?

*

करें भरोसा

किस पर कितना,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 10, 2013 at 7:30pm — 10 Comments

मुक्तिका: क्या कहूँ?... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

संजीव 'सलिल'

*

क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाता.

बिन कहे भी रहा नहीं जाता..



काट गर्दन कभी सियासत की

मौन हो अब दहा नहीं जाता..



ऐ ख़ुदा! अश्क ये पत्थर कर दे,

ऐसे बेबस बहा नहीं जाता.



सब्र की चादरें जला दो सब.

ज़ुल्म को अब तहा नहीं जाता..



हाय! मुँह में जुबान रखता हूँ.

सत्य फिर भी कहा नहीं जाता..



देख नापाक हरकतें जड़ हूँ.

कैसे कह दूं ढहा नहीं जाता??



सर न हद से अधिक उठाना तुम…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 10, 2013 at 10:30am — 5 Comments

मुक्तिका : संजीव 'सलिल'

मुक्तिका :

नया आज इतिहास लिखें हम

संजीव 'सलिल'


*

नया आज इतिहास लिखें हम.

गम में लब पर हास लिखें हम..



दुराचार के कारक हैं जो

उनकी किस्मत त्रास लिखें हम..



अनुशासन को मालिक मानें

मनमानी को दास लिखें हम..



ना देवी, ना भोग्या मानें

नर-नारी सम, लास लिखें हम..



कल की कल को आज धरोहर

कल न बनें, कल आस लिखें हम..

(कल = गत / आगत / यंत्र / शांति)



नेता-अफसर सेवक…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 10, 2013 at 10:00am — 4 Comments

दोहा सलिला: गले मिले दोहा यमक

दोहा सलिला:

गले मिले दोहा यमक

संजीव 'सलिल'

*

मनहर ने मन हर लिया, दिलवर दिल वर मौन.

पूछ रहा चितचोर! चित, चोर कहाँ है कौन??

*

देख रही थी मछलियाँ, मगर मगर था दूर.

रखा कलेजा पेड़ पर, कह भागा लंगूर..

*

कर वट को सादर नमन, वट सावित्री पर्व.

करवट ले फिर सो रहे, थामे हाथ सगर्व..

*

शतदल के शत दल खुले, भ्रमर करे रस-पान.

बंद हुए शतदल भ्रमर, मग्न करे गुण-गान..

*

सर हद के भीतर रखें, सरहद करें न पार.

नत सर गम की गाइये,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 9, 2013 at 11:30am — 6 Comments

नीरज के ८९ वें जन्म दिन पर काव्यांजलि: संजीव 'सलिल'

कालजयी गीतकार नीरज के ८९ वें जन्म दिन पर काव्यांजलि:

संजीव 'सलिल'

*

गीतों के सम्राट तुम्हारा अभिनन्दन,

रस अक्षत, लय रोली, छंदों का चन्दन...

*

नवम दशक में कर प्रवेश मन-प्राण तरुण .

जग आलोकित करता शब्दित भाव अरुण..

कथ्य कलम के भूषण, बिम्ब सखा प्यारे.

गुप्त चित्त में अलंकार अनुपम न्यारे..

चित्र गुप्त देखे लेखे रचनाओं में-

अक्षर-अक्षर में मानवता का वंदन

गीतों के सम्राट तुम्हारा अभिनन्दन,

रस अक्षत, लय रोली, छंदों का…

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Added by sanjiv verma 'salil' on January 5, 2013 at 11:01am — 10 Comments

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