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Sharadindu mukerji's Blog – March 2013 Archive (5)

अनुभूति

वाणी जब नयनों से छलके

दो दिल में हो एक स्पंदन,

हो केशगुच्छ के अवगुंठन में

अधरों का अधरों से मिलन –

जब अलि के नीरव गुंजन से

सिहरित हो, पुष्पित कोमल तन,

जब भाव बहे सरिता बनकर

भाषा हो मृदुल, मंद समीरण –

प्रिये तभी होता है प्राणों का

जीवन से आलिंगन.

जब पवन चले औ’ किलक उठे

कलियों का दल इठलाकर,

जब तरु की शाखों में जाग उठे

उन कोमल पत्रों का मर्मर,

जब ओस बिंदु को मिलता हो

तृण का कम्पित अवलम्बन –

बंधु तभी मुखरित होता है,

यह जग,…

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Added by sharadindu mukerji on March 25, 2013 at 8:44pm — 4 Comments

मैं, तुम और वे क्षण

वातायन निर्वाक प्रहरी था,

बाहर मस्त पवन था

अंदर तो ‘बाहर’ निश्चुप था,

अंतर में एक अगन था.

कितने ही लहरों पर पलकर,

कितने झोंके खाकर

कितने ही लहरों को लेकर,

कितने मोती पाकर –

मैं आया था शांत निकुंज में.

मैं आया था शांत निकुंज में,

एक तूफ़ाँ को पाने

एक हृदय को एक हृदय से,

एक ही कथा सुनाने.

पर निकुंज की छाया में

थी तुम बैठी उद्भासित सी,

थोड़ी सी सकुचायी सी

और थोड़ी सी घबरायी सी.

स्तब्ध रहे कुछ पल

हम दोनों, पलकों…

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Added by sharadindu mukerji on March 21, 2013 at 3:47am — 11 Comments

मैं और तुम

तुम्हारे उपवन के उपेक्षित कोने में

एक नन्हा सा घरौंदा है,

जहाँ मैं और मेरी तन्हाई

साथ-साथ रहते हैं –

क्या तुमने कभी देखा है ?

 

यहाँ तुम्हारे आंचल की सरसराहट

सुनाई नहीं देती,

तुम्हारी खुशी की खिलखिलाहट भी

मंद पड़ जाती है –

पर,

तुम्हारे गजरे का सुबास

स्वयम यहाँ आता है,

हर सुबह एक कोयल

कोई नया राग गाती है ;

हमने ओस की बूंदों को

पलकों का सेज दिया है –

क्या तुमने कभी जाना है…

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Added by sharadindu mukerji on March 17, 2013 at 2:43am — 3 Comments

आशंका

ज़िंदगी की राह के किनारे लगी

ऊंचे दरख्तों की झुकी डालें नंगी हैं.

एक बेचैन सन्नाटे को पछाडकर,

मैं, एक खामोश कोलाहल में,

परेशान भटक रहा हूँ.

शायद अकारण ही!

शायद आगे उस मोड़ पर

कोई तूफ़ान मिल जाए;

शायद उन कँटीली झाड़ियों के पीछे

कोई झुरमुट मिल जाए -

पर आह,

मेरे सपनों के गुलमोहर

इन राहों में बिखरे पड़े हैं.

उन्हें कुचल नहीं सकता, बटोर रहा हूँ -

आँसुओं की नमी में पलकर

वे अभी मुरझाए नहीं…

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Added by sharadindu mukerji on March 13, 2013 at 3:30am — 9 Comments

सावधान

बहते हुए समय के साथ

कदम मिलाकर चल सको

तो अच्छा है,

उसे रोकने की कोशिश मत करो –

तुम्हें धराशायी करके

वह निर्लिप्त, आगे ही बढता जायेगा.

 

उस धारा में उठती लहरों को

‘गर चूम सको

तो अच्छा है,

उन्हें बाँधने की कोशिश मत करो –

निर्दयी वे, तुम्हें अकेला छोड़

भँवरों में समा जायेंगी.

 

और, उन तपस्वी वृक्षों तक

यदि पहुँच सको

तो अच्छा है,

उनसे ऊँचा बनने की कोशिश मत करो –

माटी में…

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Added by sharadindu mukerji on March 8, 2013 at 12:55am — 5 Comments

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