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Atendra Kumar Singh "Ravi"'s Blog – August 2011 Archive (6)

शौक (झलकी) भाग-3 एवं अंतिम

शौक (झलकी) भाग-3 एवं अंतिम
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रंजना-     हाँ , पता नहीं कक्षा ८ से ही क्या हो गया इसे. ये बस कहता है कि हम गायक बनेंगे.
               गाँव में एक श्यामू जी का बेटा है ,वो कितना अच्छा है पढने में और एस साल उसका एडमिशन आई.आई. टी में हुआ है.           मैं भी चाहती हूँ कि...
विनोद जी-   समझ गया. आओ…
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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 16, 2011 at 11:00am — 3 Comments

शौक (झलकी) भाग-२

गतांक से आगे ...
शौक (झलकी) भाग-२
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सोनू प्रवेश कर विनोदजी को नमस्ते कर अपने कमरे में प्रवेश कर जाता है.
रंजना-          आप तो इंजिनियर बन गए हैं, वो भी एक बड़ी कम्पनी में.
विनोदजी-     यह सब आप सभी के आशीर्वाद का फल है भाभी जी. वही तो अभी बात हो रही थी कि रामदीन भी तो…
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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 12, 2011 at 9:00am — 1 Comment

शौक (झलकी) भाग-१

शौक (झलकी) भाग-१
  • लेखक :-अतेन्द्र कुमार सिंह"रवि"
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रामदीन-    अजी सुनती हो ,सोनू कहाँ है ? जरा उसे आवाज़ तो देना ---
रंजना-       (घर के अन्दर से आवाज़ आती है )
                 घर में तो नहीं है ........
रामदीन-   (घर में जाकर)
                शहर से हमारे सहपाठी श्री विनोद जी , जो एक बड़ी कम्पनी में इंजिनियर है आज वो…
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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 10, 2011 at 10:30am — 4 Comments

एक अश्क गिरा--ग़ज़ल

एक अश्क गिरा और फूट गया छन से

न हुई आवाज़ कोई रूठ गया तन से 
निकल पड़ा था सहर-ए-रौशनी  लिए हुए 
हो रही क्यूँ शाम कौंध रहा मन से 
पास थी बाज़ी एक हाँथ में यूँ  ज़रा 
पत्ते उलट गए हैं अपनीं ही रन से …
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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 4, 2011 at 10:30am — 1 Comment

कहलाते 'किसान'

हम करते रहे खेतों में अनवरत काम 

सबका पेट भरते, कहलाते 'किसान'

 

भोर हुई कि चल पड़े डूबके अपने रंग 

ले हल कांधो पे और दो बैलों के संग 

बहते खून पसीना तज कर अपने मान 

सबका पेट भरते, कहलाते 'किसान'          ---१

 

हैं उपजाते अन्न सब मिलकर खेतों में हम 

फिर भी मालियत पे इसके हैं अधिकार खतम

सबकुछ समझ कर भी हम बनते है नादान 

सबका पेट भरते, कहलाते 'किसान'         ---२

 

भूखे हैं हमसब या अपना  है पेट…

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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 4, 2011 at 9:29am — 2 Comments

पुरवा ने ली अंगड़ाई

हे पिया, तू अब तो आजा 

पुरवा ने ली अंगड़ाई l

सिहर उठा ये तन मन मोरा 

है बरखा बहार आई ||

 

काँप रहा तन ये अपना

बज रहा यूँ ही कंगना |

तनहा तनहा जीते जीते 

अब आँख है भर आई ||

 

हे पिया, तू अब तो आजा 

पुरवा ने ली अंगड़ाई ll

 

सज गए सभी नज़ारे 

तन पे गिर रही फुहारें |

धीरे धीरे रुक रुक के 

अब तो चल रही पुरवाई ||

 

हे पिया, तू अब तो आजा 

पुरवा ने ली अंगड़ाई…

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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 3, 2011 at 6:00pm — 2 Comments

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