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Poonam Shukla's Blog – October 2013 Archive (7)

ग़ज़ल - अँधेरा चीर दे नश्तर कहाँ है - पूनम शुक्ला

1222. 1222. 122



कहाँ है आज मेरा घर कहाँ है

नहीं मिलती कहीं चादर कहाँ है



नमी है आँख में नींदें उड़ी हैं

नहीं मालूम अब बिस्तर कहाँ है



शगूफे इस तरह मुरझा रहे हैं

खला को नाप दे मिस्तर कहाँ है



छुपाएँ किस तरह अपने बदन को

कहीं मिलता नहीं अस्तर कहाँ है



नहीं ये घर नहीं मेरा तभी वो

अँधेरा चीर दे नश्तर कहाँ है



नदी सी दौड़ती मैं तो चली थी

मुझे रोके जो वो पत्थर कहाँ है



समा जाऊँ कहीं बोलो कहाँ… Continue

Added by Poonam Shukla on October 18, 2013 at 9:37am — 8 Comments

ग़ज़ल - हँसती जाती है दहशत क्योंकर - पूनम शुक्ला

2222. 2222. 2

इतनी फैली है गीबत क्योंकर

शफ़्क़त आनें में शिद्दत क्योंकर



आबे दरिया सा रास्ता सबका

रुक ही जाती है बहजत क्योंकर



ताबो ताकत बैठी रोती है

इतनी बरकत में दौलत क्योंकर



आसाइश इतनी दरहम बरहम

हँसती जाती है दहशत क्योंकर



कितना बेकस है इंसा बेबस

तब भी शातिर ही हिकमत क्योंकर



पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित



गीबत - बदबू

बहजत - खुशी

ताबो ताकत - योग्यता

आसाइश - सुख समृद्धि

दरहम… Continue

Added by Poonam Shukla on October 15, 2013 at 11:00am — 9 Comments

ग़ज़ल - वो तो खूने हिजाब पीता है - पूनम शुक्ला

2122. 1212. 22



कब वो खाली शराब पीता है

हुस्ने ताजा शबाब पीता है



कैसे खिलती वहाँ कली अबतर

वो तो खूने हिजाब पीता है



इतनी भोली खला कि क्या जाने

फिर वो अर्के गुलाब पीता है



ऐसी तदबीर जानता है वो

दिल में उठते हुबाब पीता है



जाने तसतीर भी नहीं उसकी

तब भी सारे खिताब पीता है



ऐसी तौक़ीर दूरतक जानिब

सबकी खाली किताब पीता है



पीना फितरत बना लिया उसने

बैठे ही लाजवाब पीता है



हिजाब -…

Continue

Added by Poonam Shukla on October 13, 2013 at 12:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल - आज तू दर्द को ज़जा कहना । - पूनम शुक्ला

2122 1212 22

खत्म होती नहीं सजा कहना

बेरहम क्यों हुई रज़ा कहना



आशियाना सजा लिया हमने

तीरगी घेरती वज़ा कहना



आज फिर याद खूब आती है

मोतबर दर्द को मज़ा कहना



चाह कर भी सजा नहीं होगी

आज तू दर्द को ज़जा कहना



जान पर खेल कर कभी अपनी

जिन्दगी बाँटना क़जा़ कहना ।



दिन ब दिन बदलियाँ हटेंगी भी

जिन्दगी को न बेमज़ा कहना



कज़ा- ईश्वरीय आदेश

रज़ा - इच्छा

ज़जा - फल

मोतबर=जिसका एतबार किया… Continue

Added by Poonam Shukla on October 10, 2013 at 10:34am — 12 Comments

ग़ज़ल - रुक जाते हैं चलते रेले - पूनम शुक्ला

2222. 2222

हाँ ऊँचा अंबर होता है
पर धरती पर घर होता है

तुम हो आगे हम हैं पीछे
ऐसा तो अक्सर होता है

इक लय में गाते जब दोनों
हर इक आखर तर होता है

होती खाली तू तू मैं मैं
वो भी कोई घर होता है

बन जाता है जो रेतीला
वो भी तो पत्थर होता है

रुक जाते हैं चलते रेले
देखा तेरा दर होता है

तू ही जाने किस गरदन पर
जाने किसका सर होता है

पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on October 7, 2013 at 8:30pm — 15 Comments

ग़ज़ल- लगा दूँ आग पानी में

1222. 1222. 1222

जरा ठहरो लगा दूँ आग पानी में
कहीं गुम हो न जाए फाग पानी में

कहीं तो डोलती होगी हवा मीठी
पकड़ कर खींच लाऊँ राग पानी में

चले तो थे कदम उसके यहीं शायद
चहकता तो नहीं है काग पानी में

फिज़ाओं में कभी तो रौनकें होंगी
लहकता बोलता है बाग पानी में

न आ जाए कहीं सैलाब उठ जा भी
कहीं तू बह न जाए जाग पानी में
पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on October 7, 2013 at 1:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल - कुर्बतों की बात आखिर क्यों करें

2122 2122. 2122. 212



खो गई है प्यार की पतवार लगता है यही

नाव अपनी पास ही मझधार लगता है यही



कुर्बतों की बात आखिर क्यों करें हम बोलना

कर रहे हैं मौत का व्यापार लगता है यही



रोज ही गढ़ते कहानी बारहा बढ़ते कदम

दिख गया कोई नया बाजार लगता है यही



मौत का मंजर कहीं रस्ते न आ जाए यहाँ

देखकर तैयारियाँ खूँखार लगता है यही



जुल्मतों नें घेर ली है राह चारो ओर से

हाथ में है सो गई तलवार लगता है यही



जीत का आलम कभी दीदार था… Continue

Added by Poonam Shukla on October 3, 2013 at 3:30pm — 16 Comments

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