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Sushil Sarna's Blog – October 2016 Archive (12)

इक दिया ....

इक दिया ....

थे कुछ दिए

तेरे नाम के 
जो बुझ के भी
जलते रहे

थे कुछ दिए
मेरे नाम के भी
जो जले
मगर
बे नूर से

बस इक दिया
देर तक
जलता रहा
जो था
हमारे
अबोले

प्यार का

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 29, 2016 at 4:22pm — 8 Comments

नफरत न करना ..

नफरत न करना ..

प्यार

कितनी पावन

अनुभूति है

ये

पात्रानुसार

स्वयं को

हर रिश्ते

के चरित्र में

अपनी पावनता के साथ

ढाल लेता है

ये

आदि है

अनंत है

ये जीवन का

पावन बसंत है

प्यार

तर्क वितरक से

परे है

प्यार तो

हर किसी से

बेख़ौफ़

किया जा सकता है

मगर

नफ़रत !

ये प्यार सी

पावन नहीं होती

ये वो अगन है

जो ख़ुद…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 26, 2016 at 8:30pm — 4 Comments

उपहार.....

उपहार.....

मौसम बदलेगा
तो
कुछ तो नया होगा

गुलों के झुरमट में
मैं तुम्हें
छुप छुप के
निहारता होऊंगा

तुम भी होगी
कहीं
प्रकृति के शृंगार की
अप्रतिम नयी कोपल में
छिपी यौवन की
नयी आभा सी

क्या
दृष्टिभाव की
ये अनुभूति
बदले मौसम का
उपहार न होगी

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 26, 2016 at 1:21pm — 8 Comments

कल का जंगल ......

कल  का  जंगल  ...

खामोश चेहरा

जाने

कितने तूफ़ानों की

हलचल

अपने ज़हन में समेटे है

दिल के निहां खाने में

आज भी

एक अजब सा

कोलाहल है

एक अरसा हो गया

इस सभ्य मानव को

जंगल छोड़े

फिर भी

उसके मन की

गहन कंदराओं में

एक जंगल

आज भी जीवित है

जीवन जीता है

मगर

कल ,आज और कल के

टुकड़ों में

एक बिखरी

इंसानी फितरत के साथ

मूक जंगल का

वहशीपन…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 25, 2016 at 3:04pm — 8 Comments

माँ ...

माँ ...

दर्द का
मंथन हुआ तो
एक सागर
बूँद बन
लहद पर
ऐसा गिरा
कि
गर्म लावे से पिघल

माँ
लहद से बाहर
आ गयी
ले के दर्द बेटे का
फिर
लहद में
समा गयी

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 19, 2016 at 1:00pm — 4 Comments

लम्हा ...

लम्हा ...

ख़ामोश था
मैं जब तलक
हर तरफ़
इक शोर था

खोली जुबाँ
जो मैंने ज़रा
तो
हर शोर
ख़ामोश हो गया

इक लम्हा
ज़लज़ले में सो गया
इक लम्हा
ज़लज़ला हो गया

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 18, 2016 at 1:44pm — 4 Comments

अनबोले लम्स ....

अनबोले लम्स ....

आज मेरे

दिल के आईने में

मुझे

तुम नज़र आये थे

तन्हाई थी

मैं थी

और

तुम थे

अपने लम्स के साथ

मेरे ज़िस्म पर

बे-आवाज़

हौले हौले

रेंगते हुए

मेरी

हर

न को

तुम कुचलते रहे

खामोशियाँ

सरगोशियां करती रहीं

लौ भी

कहीं तारीक में

खो गयी

बस

शेष रही

मैं

और

मेरे ज़िस्म के

हर मोड़ पर

तुम्हारे…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 17, 2016 at 7:51pm — 2 Comments

हार ...

हार ...

ये इश्क-ओ-मुहब्बत के
बड़े अज़ब नज़ारे हैं
उनके दिए दर्दों से
हमने
तन्हा लम्हे सँवारे हैं
लोग
डरते होंगे ज़ख्मों से
मगर
सच कहते हैं
ये ज़ख्म
हमें बहुत प्यारे हैं
रिस्ते ज़ख्मों की
हर टीस पे
हमने सनम पुकारे हैं
अंगार बन के उठती हैं
यादें उनकी
तन्हाई में
कैसे बताएं ज़माने को
हम क्या जीते
क्या हारे हैं

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 12, 2016 at 1:13pm — 6 Comments

विष - एक क्षणिका

विष  - एक क्षणिका :

मानव
तुम तो
सभ्य हो
फिर
विषधर का विष
कहां से
पाया तुमने
क्या
सभ्य वेश में
विषधर भी
रहने लगे

सुशील सरना

मौलिक एवम अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on October 10, 2016 at 8:59pm — 8 Comments

प्रेमाभिव्यक्ति ......

प्रेमाभिव्यक्ति ......

प्रेम आस है

प्रेम श्वास है

प्रेम जीवन की अमिट प्यास है

प्रेम आदि है

प्रेम अन्त है

प्रेम जीवन का अमिट बसंत है

प्रेम चुभन है

प्रेम लग्न है

प्रेम जीवन की अमिट अगन है

प्रेम चंदन है

प्रेम बंधन है

प्रेम जीवन की अमिट गुंजन है

प्रेम रीत है

प्रेम जीत है

प्रेम जीवन की अमिट प्रीत है

प्रेम नीर है

प्रेम पीर है

प्रेम जीवन की प्रेम हीर…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 7, 2016 at 1:15pm — 2 Comments

वादा .....

वादा .....

मेरे ग़मगुसार ने

इक वादा किया था

कि वो हर लम्हा

मेरा ज़िस्म होगा

मेरा हर ग़म

उस पे आशकार होगा

फ़ना की तारीक वादियों में भी

वो मेरे साथ होगा

क्या सच में उसने

इस जहां से

उस जहां तक

साथ निभाने का

वादा किया था

लम्हा दर लम्हा

दूरी का अज़ाब बढ़ता गया

अकेलेपन की शाखाओं पे

यादों का शबाब

बढ़ता गया



साये गुफ़्तगू करने लगे

मेरी अफ़सुर्दा निगाहें

जाने ख़ला में…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 6, 2016 at 2:02pm — 10 Comments

खामोश मौसम ....

खामोश मौसम ....

अपनी ही आवाज़ों के साथ

बैसाखियाँ

आग में जलने लगी

समय

और सुईयों की रफ़्तार

अपनी बेख़ौफ़ चाल के साथ

ज़िन्दा होने का

सबूत देती रही

जज़्बात

हड्डियों की बैसाखियों पर

खामोशियों के लिबास पहने

खुद को ढोते रहे

एक बैसाखी दिल की

किसी शरर की उम्मीद में

तारीकियों से लिपटी

पल पल जलती हुई

ज़ख्मों की तलाशी लेती रही

जलते हुए ख़्वाब

शायद अपनी बैसाखियाँ…

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Added by Sushil Sarna on October 1, 2016 at 8:54pm — 14 Comments

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