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नाथ सोनांचली's Blog (118)

ग़ज़ल- हाँ में हाँ लोग जो होते हैं मिलने वाले

2122  1122  1122  22

हाँ में हाँ लोग जो होते हैं मिलाने वाले

हैं पस-ए पुश्त मियाँ ज़ुल्म वो ढाने वाले

अपने चहरे के उन्हें दाग़ नज़र आ जाते

देखते ख़ुद को जो आईना दिखाने वाले

पाप धुलते नहीं इस तरह बता दो उनको

हैं जो कुछ लोग ये गंगा में नहाने वाले

हो क़फ़स लाख वो फ़ौलाद का लेकिन यारो

रोक सकता नहीं उनको जो हैं जाने वाले

आपसे वादा निभाएँगे भला वो कैसे

वादा ख़ुद का न कभी ख़ुद से निभाने वाले

आप…

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Added by नाथ सोनांचली on July 18, 2020 at 4:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल- रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर

रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर

कोई अंकुश नहीं लगाता इन सरमाया दारों पर।

मजदूरों का जीवन देखो कितना मुश्किल होता है

बिस्तर पास नहीं जब होता सो जाते अख़बारों पर।

भूक ग़रीबी ज्यों की त्यों क्यों तख़्त नशीं कुछ तो बोलो

दोष मढ़ोगे कब तक आख़िर पिछली ही सरकारों पर।

वक़्त नहीं है पास किसी के सबको अपनी आज पड़ी

दौर पुराना ख़्वाब लगे जब भीड़ जुटे चौबारों पर।

बच्चे झुककर बात करेंगे घर के सारे लोगों से

आईने जब लग जाएँगे घर…

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Added by नाथ सोनांचली on July 12, 2020 at 12:59pm — 10 Comments

ग़ज़ल -पुराने गाँव की अब भी कहानी याद है हमको

था सब आँखों में मर्यादा का पानी याद है हमको

पुराने गाँव की अब भी कहानी याद है हमको।

भले खपरैल छप्पर बाँस का घर था हमारा पर

वहीं पर थी सुखों की राजधानी याद है हमको

वो भूके रहके ख़ुद महमान को खाना खिलाते थे

ग़रीबों के घरों की मेज़बानी याद है हमको

हमारे गाँव की बैठक में क़िस्सा गो सुनाता था

वही हामिद के चिमटे की कहानी याद है हमको

सलोना और मनभावन शरारत से भरा बचपन

अभी तक मस्त अल्हड़ ज़िंदगानी याद है…

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Added by नाथ सोनांचली on July 11, 2020 at 12:00pm — 14 Comments

गीत- मैं पुरुष हूँ! मात्र इस हित, मत करो अपमान मेरा

भूल कर सब प्रेम करुणा त्याग तप बलिदान मेरा

मैं पुरुष हूँ! मात्र इस हित, मत करो अपमान मेरा

राम सा आदर्श मानव औ' भरत सा भ्रात मैं हूँ

दुश्मनों के वक्ष पर करता रहा आघात मैं हूँ

मैं प्रतिज्ञा भीष्म की हूँ, मैं युधिष्ठिर धर्मकारी

पार्थ का गांडीव मैं हूँ, मैं सुदर्शन चक्र-धारी

शौर्य है श्रृंगार मेरा, रण-विजय ही गान मेरा

मैं पुरुष हूँ! मात्र इस हित, मत करो अपमान मेरा।।

भूमिका मेरी यहाँ बेटा, पिता, पति, भ्रात की है

माप रखता जो हमेशा…

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Added by नाथ सोनांचली on June 15, 2020 at 11:30am — 13 Comments

गीत -आचरण आदर्श के गायब हुए, विपदा बड़ी है

क्रोध तम मद-लोभ ईर्ष्या में पड़ा संसार सारा

आचरण आदर्श के गायब हुए, विपदा बड़ी है।।

छोड़ अन्तस का शिवालय भ्रम मनुज लाने चला है

शोर के गहरे तमस में मौन को पाने चला है

पास उसके आत्म दर्पण है नहीं जो राह रोके

जी रहा है वह स्वयं की जिन्दगी में कण्ट बोके

सत्य है नेपथ्य में बस मूर्खता मन में अड़ी है

आचरण आदर्श के गायब हुए, विपदा बड़ी है।।

मस्त सब हैं छोड़कर सिद्धांत सारे सभ्यता के

मन अपाहिज वस्त्र चिथड़े किंतु साधक भव्यता के

जब पलट के…

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Added by नाथ सोनांचली on June 12, 2020 at 7:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल- हर कोई अनजान सी परछाइयों में क़ैद है

जानकर औक़ात अपनी वो हदों में क़ैद है

हर परिंदा आज अपने घोंंसलों में क़ैद है।।

जीत लेगा मौत को भी आदमी यूँ एक दिन

इस तरह की सोच सबकी हसरतों में क़ैद है।।

क्रोध लालच दम्भ नफ़रत ज़ात मजहब को लिए

हर कोई अनजान सी परछाइयों में क़ैद है।।

कब कहाँ किस को दग़ा दें रहनुमा इस देश के

झूठ मक्कारी तो उनकी आदतों में क़ैद है।।

जिस शजर की छाँव में बारात सजती थी कभी

आज वो वीरान बनके रतजगों में क़ैद है।।

टूट कर ख़ामोश जो…

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Added by नाथ सोनांचली on June 5, 2020 at 3:00pm — 15 Comments

कह मुकरियाँ

आकर वह आँचल में सोये

प्रेम दिखाए नैन भिगोये

मेरा है वह आज्ञापालक

क्या सखि साजन? ना सखि बालक।।1

समझो उसको ज्ञान प्रदाता

जो चाहो वह ढूँढ़ के लाता

बहुत चलन में आज और कल

क्या सखि शिक्षक? ना सखि गूगल।।2

नई बहू पर डाले फन्दा

सास ननद को रखे सुनन्दा

हर पत्नी का वो सहजीवी

क्या सखि गहना? ना सखि टीवी।।3

आता है वह स्वेद बहाने

ओंठ छुवन से प्यास बढ़ाने

बरते तनिक नहीं वह नरमी

क्या सखि साजन? ना सखि…

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Added by नाथ सोनांचली on May 9, 2020 at 7:00am — 7 Comments

कोरोना काल पर छन्न पकैया

छन्न पकैया छन्न पकैया, दूषित है हर कोना

जिसको दुनिया बोल रही है कोरोना -कोरोना।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, हिम्मत तनिक न खोना

यह केवल इक असुर शक्ति है, चीनी जादू टोना।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, सबको यह समझाएँ

अपने-अपने घर रह कर ही, आओ इसे हराएँ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, हो सामाजिक दूरी

मास्क लगाकर घर से निकलें, जब हो बहुत जरूरी।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, सबको बात बताना

हाथ जोड़कर करें नमस्ते, हाथ न कभी…

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Added by नाथ सोनांचली on May 8, 2020 at 11:18am — 7 Comments

मजदूर को समर्पित एक रचना

पास उसके शक्ति श्रम की, पास उसके नूर है

वह जगत निर्माण करता अलहदा मजदूर है।।

घर खुला आकाश उसका औ शयन को है धरा

अस्थि पंजर शेष काया देख लगता अधमरा।।

भूख पीड़ित वो, नहीं कुछ और बातें सोचता

क्लेश चिन्ता दीनता तन रुग्ण यौवन नोचता।।

पास उसके पेट, भोजन चाहिए हर हाल में

ढूंढता जिसको फिरे वो ज़िन्दगी जंजाल में।।

वो बनाया ताज लेकिन नृप हुआ मशहूर है

जात क्या औ धर्म क्या मजदूर तो मजदूर है।।

पाँव…

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Added by नाथ सोनांचली on May 2, 2020 at 7:30pm — 16 Comments

कोरोना पर छप्पय छंद में कुछ रचनाएँ

(सूत्र रोला + उल्लाला = छप्पय छंद)



लेकर लाखों पाँव, एक आया संहारी

चुप सारे दरवेश, पादरी सन्त पुजारी

जीवन गति अवरूद्ध, क्रुद्ध हों ईश्वर जैसे

नहीं किसी को ज्ञान, कटे यह विपदा कैसे

दिखे नहीं उम्मीद अब, मंदिर मस्जिद धाम से

आज सभी भयभीत हैं, कोरोना के नाम से।।1



जिव्हा का कुछ स्वाद, पड़ा हम सब पर भारी

खाया जो आहार, उसी ने दी बीमारी

पर अपना क्या दोष, चीन यह समझ न पाया

खाकर कुत्ता गिद्ध, भयंकर रोग बुलाया।।

जिससे जग गति थम गई, डर फैला… Continue

Added by नाथ सोनांचली on April 27, 2020 at 6:24am — 6 Comments

विरोध पर पञ्चचामर छंद में रचना

पञ्चचामर छंद

सूत्र : जगण + रगण + जगण + रगण + गुरु

शरीर लोकतन्त्र तो विरोध एक वस्त्र है

विरोध एक नाम है विरोध अस्त्र शस्त्र है

न अंधकार हो कहीं विरोध वो मशाल है

विरोध एक आग है विरोध क्रांति भाल है।।1

विरोध कीजिए भले, विकास को न रोकिये

विपक्ष पक्ष साथ हो, तुरन्त आप टोकिये

कभी विरोध नाम से यहाँ न तोड़ फोड़ हो

विरोध हो विरोध सा, विरोध में न होड़ हो।।2

अनीति या कुरीति का सदा विरोध कीजिए

भविष्य…

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Added by नाथ सोनांचली on April 25, 2020 at 11:05am — 4 Comments

पिता पर मत्त गयंद छंद में एक रचना

मत्त गयंद छंद

हाथ रखा जिसने सिर पे वह जीवन सम्बल शक्ति पिता है

प्रेम प्रशासन औ अनुशासन प्यार दुलार विभक्ति पिता है

रीढ़ झुकी उसके तन की पर वज्र दधीचि प्रसक्ति पिता है

तीर्थ बसें जग के जिसमें सब पूजित वो इक व्यक्ति पिता है।।1

खार बिछावन हो अपना सुत सेज रखे पर फूल पिता है

पुत्र हजार करे गलती पर माफ़ करे सब भूल पिता है

होकर आज बड़ा सुत जो कुछ है उसका सब मूल पिता है

पूत कपूत सपूत बने, बनता न कभी प्रतिकूल पिता है।।2

शौक सभी…

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Added by नाथ सोनांचली on April 23, 2020 at 8:30am — 7 Comments

ग़ज़ल (चाहा था हमने जिसको हमें वो मिला नहीं)

सम्मान हम किसी का करें कुछ बुरा नहीं

पर आदमी को आदमी समझें, ख़ुदा नहीं।।1

ये सोच कर ही ख़ुद को तसल्ली दिया करें

दुनिया में ऐसा कौन है जो ग़म ज़दा नहीं।।2

बस मौत ही तो आख़री मंज़िल है दोस्तो

इससे बड़ा जहान में सच दूसरा नहीं।।3

हमको तमाम उम्र यही इक़ गिला रहा

चाहा था हमने जिसको हमें वो मिला नहीं।।4

इसको सुनो दिमाग़ से तब आएगा मज़ा

ये शाइरी है यार कोई चुटकुला नहीं।।5

लेती है हर क़दम पे नया इम्तिहान ये…

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Added by नाथ सोनांचली on January 20, 2020 at 2:30pm — 10 Comments

भारत दर्शन (द्वितीय कड़ी) मत्त गयंद छंद

वैभव औ सुख साधन थे उनको पर चैन नही मिल पाया

कारण और निवारण का हर प्रश्न तथागत ने दुहराया

घोष हुआ दिवि घोष हुआ भ्रम का लघु बंधन भी अकुलाया

गौतम से फिर बुद्ध बने जग विप्लव शंशय पास न आया।।1

गौतम बुद्ध जहाँ तप से हिय दिव्य अलौकिक दीप जलाए

मध्यम मार्ग चुना अनुशीलन राह यहीं जग को बतलाये

रीति कुरीति सही न लगे यदि क्यों फिर मानव वो अपनाए

तर्क वितर्क करो निज से, धर जीवन संयम को समझाये।।2

गाँव जहाँ ब्रज गोकुल से हिय में अपने जन प्रेम…

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Added by नाथ सोनांचली on January 7, 2020 at 5:30pm — 6 Comments

भारत दर्शन (प्रथम कड़ी) मत्त गयंद छंद

जन्म लिया जिस देश धरा पर वो हमको लगता अति प्यारा

वैर न आपस में रखते वसुधैव कुटुम्ब लगे जग सारा

पूजन कीर्तन साथ जहाँ सम मन्दिर मस्जिद या गुरुद्वारा

लोग निरोग रहे जग में नित पावन सा इक ध्येय हमारा।।1

पूरब में जिसके नित बारिश, हो हर दृश्य मनोरम वाला

लेकर व्योम चले रथ को रवि वो अरुणाचल राज्य निराला

गूढ़ रहस्य अनन्त छिपा पहने उर पादप औषधि माला

जो मकरन्द बहे घन पुष्पित कानन को कर दे मधुशाला।।2

उत्तर में जिसके प्रहरी सम पर्वत राज हिमालय…

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Added by नाथ सोनांचली on January 3, 2020 at 5:00pm — 9 Comments

नववर्ष की शुभकामनाएं (मत्तगयंद छंद)

स्वागत हेतु सजी धरती उर में बहु सौख्य-समृद्धि पसारे

राग विराग हुआ सुर सज्जित हर्षित अम्बर चाँद सितारे

भव्य करो अभिनन्दन वन्दन लेकर चन्दन अक्षत प्यारे

स्नेह लिए नव अंकुर का अब द्वार खड़ा नव वर्ष तुम्हारे।।1

नूतन भाव विचार पले जड़ चेतन में निरखे छवि प्यारी

एक नया दिन जीवन का यह, हो जग स्वप्निल मंगलकारी

ओज अनन्त बसे सबके हिय राह नई निरखें नर नारी

दैविक दैहिक कष्ट न हो वरदान सुमंगल दें त्रिपुरारी।।2

प्यार दुलार करें सबसे नित, दुश्मन को हम…

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Added by नाथ सोनांचली on December 31, 2019 at 6:00pm — 12 Comments

कुछ ज्वलन्त विषयों पर कुण्डलिया

नशाख़ोरी

करते हैं जन जो नशा, होता उनका नाश

तिल-तिल गिरते पंक में, बनते हैं अय्याश

बनते हैं अय्याश, नष्ट कर कंचन काया

रिश्तों को कर ख़ाक बनें लगभग चौपाया

छपती खबरें रोज न जाने कितने मरते

युवा वर्ग गुमराह नशा जो हर दिन करते।।1

जरदा गुटखा पान सँग, बीड़ी औ' सिगरेट

अब यह कैसे बन्द हो, इस पर करें डिबेट

इस पर करें डिबेट, किया क्या हमने अब तक

आसानी से नित्य पहुँचता क्यों यह सब तक

बालक, वृद्ध, जवान न करते इनसे…

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Added by नाथ सोनांचली on November 28, 2019 at 7:30pm — 8 Comments

कुण्डलिया छंद

घर में किसी बुजुर्ग ने, दिया आप को नाम

नाम बड़ा अब कीजिये, करके अच्छे काम

करके अच्छे काम, बढ़े कद जिससे अपना

जग हित हो हर श्वांस, बड़ा ही देखें सपना

पद वैभव सम्मान, ख्याति हो दुनिया भर में

उत्तम जन कुलश्रेष्ठ, आप ही हों हर घर में।।

जह्र फिजा में है घुला, नगर शहर या गाँव

बाग बगीचे काट कर, खोजे मानव छाँव

खोजे मानव छाँव, भला अब कैसे पाए

जब खुद गड्ढा खोद, उसी में गिरता जाए

धुन्ध धुँआ बारूद, बहें मिल खूब हवा में

कैसे लें अब साँस, घुला जब…

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Added by नाथ सोनांचली on November 7, 2019 at 10:30pm — 8 Comments

कुण्डलिया (लोक पर्व "छठ पूजा")

अर्चन करने सूर्य का, चले व्रती सब घाट

छठ माँ के वरदान से, दमके खूब ललाट

दमके खूब ललाट, प्रकृति से ऊर्जा मिलती

हो निर्जल उपवास, मगर मुख आभा खिलती

शाम सुबह देें अर्घ्य, करें यश बल का अर्जन

चार दिनों का पर्व, करें सब मन से अर्चन।।

पूजा दीनानाथ की, डाला छठ के नाम

अस्त-उदय जब सूर्य हों, करते सभी प्रणाम

करते सभी प्रणाम, पहुँच कर नदी किनारे

भरकर दउरा सूप, अर्घ्य दें हर्षित सारे

प्रकृति प्रेम का पर्व, नहीं है जग में दूजा

अन्न…

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Added by नाथ सोनांचली on November 2, 2019 at 10:00pm — 6 Comments

कुण्डलिया (रख आश्रम माँ बाप को)

आता है जब न्यूज़ में, होता कष्ट अपार

रख आश्रम माँ बाप को, बेटा हुआ फरार

बेटा हुआ फरार, तनिक भी क्षोभ न जिसका

होगा वह भी वृद्ध, कभी पर भान न इसका

रिश्तों का इतिहास, स्वयम् को दुहराता है

ख़ुद पे गिरती गाज़, समझ में तब आता है।।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by नाथ सोनांचली on November 1, 2019 at 11:11am — 9 Comments

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