For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Blog (233)

प्रेम (पाँच छोटी कविताएँ)

(१)

 

जिनमें प्रेम करने की क्षमता नहीं होती

वो नफ़रत करते हैं

बेइंतेहाँ नफ़रत

 

जिनमें प्रेम करने की बेइंतेहाँ क्षमता होती है

उनके पास नफ़रत करने का समय नहीं होता

 

जिनमें प्रेम करने की क्षमता नहीं होती

वो अपने पूर्वजों के आखिरी वंशज होते हैं

 

(२)

 

तुम्हारी आँखों के कब्जों ने

मेरे मन के दरवाजे को

तुम्हारे प्यार की चौखट से जोड़ दिया है

 

इस तरह हमने जाति और धर्म की दीवार…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 3, 2016 at 3:01pm — 18 Comments

जब जब तुम्हारे पाँव ने रस्ता बदल दिया (ग़ज़ल)

बह्र : २२१२ १२११ २२१२ १२

 

जब जब तुम्हारे पाँव ने रस्ता बदल दिया

हमने तो दिल के शहर का नक्शा बदल दिया

 

इसकी रगों में बह रही नफ़रत ही बूँद बूँद

देखो किसी ने धर्म का बच्चा बदल दिया

 

अंतर गरीब अमीर का बढ़ने लगा है क्यूँ

किसने समाजवाद का ढाँचा बदल दिया

 

ठंडी लगे है धूप जलाती है चाँदनी

देखो हमारे प्यार ने क्या क्या बदल दिया

 

छींटे लहू के बस उन्हें इतना बदल सके

साहब ने जा के ओट में कपड़ा बदल…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 31, 2016 at 11:36pm — 20 Comments

जहाँ हो मुहब्बत वहीं डूब जाना (ग़ज़ल)

१२२ १२२ १२२ १२२

 

मेरी नाव का बस यही है फ़साना

जहाँ हो मुहब्बत वहीं डूब जाना

 

सनम को जिताना तो आसान है पर

बड़ा ही कठिन है स्वयं को हराना

 

न दिल चाहता नाचना तो सुनो जी

था मुश्किल मुझे उँगलियों पर नचाना

 

बढ़ा ताप दुनिया का पहले ही काफ़ी

न तुम अपने चेहरे से जुल्फ़ें हटाना

 

कहीं तोड़ लाऊँ न सचमुच सितारे

सनम इश्क़ मेरा न तुम आजमाना

 

ये बेहतर बनाने की तरकीब उसकी

बनाकर मिटाना…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 28, 2016 at 9:49am — 16 Comments

इससे अच्छा है मर जाना (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२

 

जीवन भर ख़ुद को दुहराना

इससे अच्छा है मर जाना

 

मैं मदिरा में खेल रहा हूँ

टूट गया जब से पैमाना

 

भीड़ उसे नायक समझेगी

जिसको आता हो चिल्लाना

 

यादों के विषधर डस लेंगे

मत खोलो दिल का तहखाना

 

सीने में दिल रखना ‘सज्जन’

अपना हो या हो बेगाना

---------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 24, 2016 at 10:19pm — 10 Comments

झूठ मिटता गया देखते देखते (ग़ज़ल)

२१२ २१२ २१२ २१२

 

झूठ मिटता गया देखते देखते

सच नुमायाँ हुआ देखते देखते

 

तेरी तस्वीर तुझ से भी बेहतर लगी

कैसा जादू हुआ देखते देखते

 

तार दाँतों में कल तक लगाती थी जो

बन गई अप्सरा देखते देखते

 

झुर्रियाँ मेरे चेहरे की बढने लगीं

ये मुआँ आईना देखते देखते

 

वो दिखाने पे आए जो अपनी अदा

हो गया रतजगा देखते देखते

 

शे’र उनपर हुआ तो मैं माँ बन गया

बन गईं वो पिता देखते…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 16, 2016 at 7:45pm — 20 Comments

सूर्य से जो लड़ा नहीं करता (ग़ज़ल)

२१२२ १२१२ २२

 

सूर्य से जो लड़ा नहीं करता

वक़्त उसको हरा नहीं करता

 

सड़ ही जाता है वो समर आख़िर

वक्त पर जो गिरा नहीं करता

 

जा के विस्फोट कीजिए उस पर

यूँ ही पर्वत झुका नहीं करता

 

लाख कोशिश करे दिमाग मगर

दिल किसी का बुरा नहीं करता

 

प्यार धरती का खींचता इसको

यूँ ही आँसू गिरा नहीं करता

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2016 at 11:22pm — 8 Comments

नमक में हींग में हल्दी में आ गई हो तुम (ग़ज़ल)

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

 

नमक में हींग में हल्दी में आ गई हो तुम

उदर की राह से धमनी में आ गई हो तुम

 

मेरे दिमाग से दिल में उतर तो आई हो

महल को छोड़ के झुग्गी में आ गई हो तुम

 

ज़रा सी पी के ही तन मन नशे में झूम उठा

कसम से आज तो पानी में आ गई हो तुम

 

हरे पहाड़, ढलानें, ये घाटियाँ गहरी

लगा शिफॉन की साड़ी में आ गई हो तुम

 

बदन पिघल के मेरा बह रहा सनम ऐसे

ज्यूँ अब के बार की गर्मी में आ गई हो…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 5, 2016 at 11:30pm — 10 Comments

वक्त आ रहा दुःस्वप्नों के सच होने का (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२

वक्त आ रहा दुःस्वप्नों के सच होने का

जागो साथी समय नहीं है ये सोने का

 

बेहद मेहनतकश है पूँजी का सेवक अब

जागो वरना वक्त न पाओगे रोने का

 

मज़लूमों की ख़ातिर लड़े न सत्ता से यदि

अर्थ क्या रहा हम सब के इंसाँ होने का

 

अपने पापों का प्रायश्चित करते हम सब

ठेका अगर न देते गंगा को धोने का

 

‘सज्जन’ की मत मानो पढ़ लो भगत सिंह को

वक्त आ गया फिर से बंदूकें बोने…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 1, 2016 at 6:00pm — 14 Comments

तेरे इश्क़ में जब नहा कर चले (ग़ज़ल)

बह्र : १२२ १२२ १२२ १२

 

सभी पैरहन हम भुला कर चले

तेरे इश्क़ में जब नहा कर चले

 

न फिर उम्र भर वो अघा कर चले

जो मज़लूम का हक पचा कर चले

गये खर्चने हम मुहब्बत जहाँ

वहीं से मुहब्बत कमा कर चले

 

अकेले कभी अब से होंगे न हम

वो हमको हमीं से मिला कर चले

 

न जाने क्या हाथी का घट जाएगा

अगर चींटियों को बचा कर चले

 

तरस जाएगा एक बोसे को भी

वो पत्थर जिसे तुम ख़ुदा कर…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 23, 2016 at 5:57pm — 10 Comments

काले काले घोड़े (नवगीत)

पहुँच रहे मंजिल तक

झटपट

काले काले घोड़े

 

भगवा घोड़े खुरच रहे हैं

दीवारें मस्जिद की

हरे रंग के घोड़े खुरचें

दीवारें मंदिर की

 

जो सफ़ेद हैं

उन्हें सियासत

मार रही है कोड़े

 

गधे और खच्चर की हालत

मुझसे मत पूछो तुम

लटक रहा है बैल कुँएँ में

क्यों? खुद ही सोचो तुम

 

गाय बिचारी

दूध बेचकर

खाने भर को जोड़े

 

है दिन रात सुनाई देती

इनकी टाप सभी…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 14, 2016 at 11:03am — 4 Comments

रुक गई बहती नदी (नवगीत)

काम सारे

ख़त्म करके

रुक गई बहती नदी

ओढ़ कर

कुहरे की चादर

देर तक सोती रही

 

सूर्य बाबा

उठ सवेरे

हाथ मुँह धो आ गये

जो दिखा उनको

उसी से

चाय माँगे जा रहे

 

धूप कमरे में घुसी

तो हड़बड़ाकर

उठ गई

 

गर्म होते

सूर्य बाबा ने

कहा कुछ धूप से

धूप तो

सब जानती थी

गुदगुदा आई उसे

 

उठ गई

झटपट नहाकर

वो रसोई में…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 2, 2016 at 3:44pm — 12 Comments

बात वही गंदी जो सब पर थोपी जाती है (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

अच्छी बात वही जिसको मर्जी अपनाती है

बात वही गंदी जो सब पर थोपी जाती है

 

मज़लूमों का ख़ून गिरा है, दाग न जाते हैं

चद्दर यूँ तो मुई सियासत रोज़ धुलाती है

 

रोने चिल्लाने की सब आवाज़ें दब जाएँ

राजनीति इसलिए प्रगति का ढोल बजाती है

 

फंदे से लटके तो राजा कहता है बुजदिल

हक माँगे तो, जनता बद’अमली फैलाती है

 

सारा ज्ञान मिलाकर भी इक शे’र नहीं होता

सुन, भेजे से नहीं,…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 17, 2016 at 11:24pm — 8 Comments

मेंढक और कुँआँ (कविता)

हर मेंढक अपनी पसंद का कुँआँ खोजता है

मिल जाने पर उसे ही दुनिया समझने लगता है

 

मेढक मादा को आकर्षित करने के लिए

जोर जोर से टर्राता है

पर यह पूरा सच नहीं है

वो जोर जोर से टर्राकर

बाकी मेंढकों को अपनी ताकत का अहसास भी दिलाता है

और बाकी मेंढकों तक ये संदेश पहुँचाता है

कि उसके कुँएँ में उसकी अधीनता स्वीकार करने वाले मेंढक ही आ सकते हैं

 

गिरते हुए जलस्तर के कारण

कुँओं का अस्तित्व संकट में है

और संकट में है…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 9, 2016 at 8:18pm — 6 Comments

नाम लिख मेरा हथेली पर, हुई गुमनाम तू (ग़ज़ल)

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २१२

 

जो मुझे अच्छा लगे करने दे बस वो काम तू

ज़िन्दगी सुन, ज़िन्दगी भर रख मुझे गुमनाम तू

 

जीन मेरे खोजते थे सिर्फ़ तेरे जीन को

सुन हज़ारों वर्ष की भटकन का है विश्राम तू

 

तुझसे पहले कुछ नहीं था कुछ न होगा तेरे बाद

सृष्टि का आगाज़ तू है और है अंजाम तू

 

डूबता मैं रोज़ तुझमें रोज़ पाता कुछ नया

मैं ख़यालों का शराबी और मेरा जाम तू

 

क्या करूँ, कैसे उतारूँ, जान तेरा कर्ज़ मैं

नाम…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 2, 2016 at 12:00pm — 10 Comments

हर बार उन्हें आप ने सुल्तान बनाया (ग़ज़ल)

बह्र : २२११ २२११ २२११ २२

 

ये झूठ है अल्लाह ने इंसान बनाया

सच ये है कि आदम ने ही भगवान बनाया

 

करनी है परश्तिश तो करो उनकी जिन्होंने

जीना यहाँ धरती पे है  आसान बनाया

 

जैसे वो चुनावों में हैं जनता को बनाते

पंडे ने तुम्हें वैसे ही जजमान बनाया

 

मज़लूम कहीं घोंट न दें रब की ही गर्दन

मुल्ला ने यही सोच के शैतान बनाया

 

सब आपके हाथों में है ये भ्रम नहीं टूटे

यह सोच के हुक्काम ने मतदान…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 23, 2015 at 10:00am — 32 Comments

भौंक रहे कुत्ते (नवगीत)

हर आने जाने वाले पर

भौंक रहे कुत्ते

 

निर्बल को दौड़ा लेने में

मज़ा मिले, जब तो

क्यों ये भौंक रहे हैं, इससे

क्या मतलब इनको

 

अब हल्की सी आहट पर भी

चौंक रहे कुत्ते

 

हर गाड़ी का पीछा करते

सदा बिना मतलब

कई मिसालें बनीं, न जाने

ये सुधरेंगे कब

 

राजनीति, गौ की चरबी में

छौंक रहे कुत्ते

 

गर्मी इनसे सहन न होती

फिर भी ये हरदम

करते हरे भरे पेड़ों…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 15, 2015 at 9:49pm — 4 Comments

ग़ज़ल : जिसको ताकत मिल जाती है वही लूटने लगता है

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

देख तेरे संसार की हालत सब्र छूटने लगता है

जिसको ताकत मिल जाती है वही लूटने लगता है

 

सरकारी खाते से फ़ौरन बड़े घड़े आ जाते हैं

मंत्री जी के पापों का जब घड़ा फूटने लगता है

 

मार्क्सवाद की बातें कर के जो हथियाता है सत्ता

कुर्सी मिलते ही वो फौरन माल कूटने लगता है

 

जिसे लूटना हो कानूनन मज़लूमों को वो झटपट

ऋण लेकर कंपनी खोलता और लूटने लगता है

 

बेघर होते जाते मुफ़लिस, तेरे…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2015 at 2:49pm — 10 Comments

जीवन नमकीन पानी से बनता है (कविता)

भावनाएँ साफ पानी से बनती हैं

तर्क पौष्टिक भोजन से

 

भूखे प्यासे इंसान के पास

न भावनाएँ होती हैं न तर्क

 

कहते हैं जल ही जीवन है

क्योंकि जीवन भावनाओं से बनता है

तर्क से किताबें बनती हैं

 

पत्थर भी पानी पीता है

लेकिन पत्थर रोता बहुत कम है

किन्तु जब पत्थर रोता है तो मीठे पानी के सोते फूट पड़ते हैं

 

प्लास्टिक पानी नहीं पीता

इसलिए प्लास्टिक रो नहीं पाता

हाँ वो ठहाका मारकर हँसता जरूर…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2015 at 10:07pm — 12 Comments

लहरों के सँग बह जाने के अपने ख़तरे हैं (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

लहरों के सँग बह जाने के अपने ख़तरे हैं

तट से चिपके रह जाने के अपने ख़तरे हैं

 

जो आवाज़ उठाएँगे वो कुचले जाएँगे

लेकिन सबकुछ सह जाने के अपने ख़तरे हैं

 

सबसे आगे हो जो सबसे पहले खेत रहे

सबसे पीछे रह जाने के अपने ख़तरे हैं

 

रोने पर कमज़ोर समझ लेती है ये दुनिया

आँसू पीकर रह जाने के अपने ख़तरे हैं

 

धीरे धीरे सबका झूठ खुलेगा, पर ‘सज्जन’

सबकुछ सच-सच कह जाने के अपने ख़तरे…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 15, 2015 at 9:31am — 14 Comments

पूँजी के बंदर (नवगीत)

खिसिया जाते, बात बात पर

दिखलाते ख़ंजर

पूँजी के बंदर

 

अभिनेता ही नायक है अब

और वही खलनायक

जनता के सारे सेवक हैं

पूँजी के अभिभावक

 

चमकीले पर्दे पर लगता

नाला भी सागर

 

सबसे ज़्यादा पैसा जिसमें

वही खेल है मज़हब

बिक जाये जो, कालजयी है

उसका लेखक है रब

 

बिछड़ गये सूखी रोटी से

प्याज और अरहर

 

जीना है तो ताला मारो

कलम और जिह्वा पर

गली मुहल्ले साँड़…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 12, 2015 at 10:51am — 4 Comments

Monthly Archives

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
8 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"जी बहुत शुक्रिया आदरणीय चेतन प्रकाश जी "
9 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आदरणीय मिथलेश वामनकर जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
11 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ.लक्ष्मण सिंह मुसाफिर साहब,  अच्छी ग़ज़ल हुई, और बेहतर निखार सकते आप । लेकिन  आ.श्री…"
13 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ.मिथिलेश वामनकर साहब,  अतिशय आभार आपका, प्रोत्साहन हेतु !"
13 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"देर आयद दुरुस्त आयद,  आ.नीलेश नूर साहब,  मुशायर की रौनक  लौट आयी। बहुत अच्छी ग़ज़ल…"
13 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
" ,आ, नीलेशजी कुल मिलाकर बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई,  जनाब!"
13 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई मिथिलेश जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।"
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन।  गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार। भाई तिलकराज जी द्वार…"
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई तिलकराज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए आभार।…"
14 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"तितलियों पर अपने खूब पकड़ा है। इस पर मेरा ध्यान नहीं गया। "
15 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी नमस्कार बहुत- बहुत शुक्रिया आपका आपने वक़्त निकाला विशेष बधाई के लिए भी…"
16 hours ago

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service