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Nilesh Shevgaonkar's Blog (189)

ग़ज़ल: नूर: गोया सस्ती शराब हो बैठे.

२१२२/१२१२/२२ (सभी संभावित कॉम्बिनेशन्स)



तुम तो सचमुच सराब हो बैठे.

यानी आँखों का ख़्वाब हो बैठे

.

साथ सच का दिया गुनाह किया   

ख्वाहमखाह हम ख़राब हो बैठे.   

.

फ़िक्र को चाटने लगी दीमक

हम पुरानी क़िताब हो बैठे.

.

उनकी नज़रों में थे गुहर की तरह  

गिर गए!!! हम भी आब हो बैठे.

.

अब हवाओं का कोई खौफ़ नहीं

कुछ चिराग़ आफ़्ताब हो बैठे.

.

ऐरे ग़ैरों के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 19, 2015 at 12:18pm — 26 Comments

ग़ज़ल-नूर

१२२२/ १२२२ / १२२ 

न जानें क्या से क्या जोड़ा करेंगे

तुम्हारे ग़म में दिल थोडा करेंगे.

.

तुम्हारे साथ हम पीते रहे हैं  

तुम्हारी नाम की छोड़ा करेंगे.

.

तुम्हारी आँख का हर एक आँसू

हम अपनी आँख में मोड़ा करेंगे.

.

घरौंदे रेत के क्यूँ ग़ैर तोड़े

बनाएंगे, हमीं तोडा करेंगे.  

.

नपेंगे आज सारे चाँद तारे

हम अपनी फ़िक्र को घोडा करेंगे.

.

ख़ुदा को…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 18, 2015 at 11:12am — 14 Comments

ग़ज़ल नूर- बातों को ज़हरीला होते देखा है.

२२२२/२२२२/२२२ 

.

आँखों को सपनीला होते देखा है

ख़्वाबों को रंगीला होते देखा है.

.

क़िस्मत ने भी खेल अजब दिखलाए हैं

पत्थर भी चमकीला होते देखा है.

.

सादापन ही कौम की थी पहचान जहाँ

पहनावा भड़कीला होते देखा है.

.

मुफ़्त में ये तहज़ीब नहीं हमनें पायी

शहरों को भी टीला होते देखा है.

.

कुर्सी की ताक़त है जाने कुछ ऐसी

बूढा, छैल-छबीला होते देखा है.    

.

आज…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2015 at 2:50pm — 17 Comments

ग़ज़ल-नूर -आँख से उतरा नहीं है

२१२२/२१२२ 

आँख से उतरा नहीं है 

बस!! कोई रिश्ता नहीं है. 



हम पुराने हो चले हैं 

आईना रूठा नहीं है.



मुस्कुराहट भी पहन ली  

ग़म मगर छुपता नहीं है.



साथ ख़ुशबू है तुम्हारी …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 16, 2015 at 10:42pm — 20 Comments

ग़ज़ल-नूर-ख़ुदा का ख़ौफ़ करो

१२१२/ ११२२/ १२१२/ २२ (सभी संभव कॉम्बिनेशन्स)



हमें न ऐसे सताओ ख़ुदा
का ख़ौफ़ करो

ज़रा क़रीब तो आओ ख़ुदा का
ख़ौफ़ करो. …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 2, 2015 at 2:00pm — 26 Comments

ग़ज़ल- निलेश 'नूर' रुसवाइयों से रोज़ मुलाक़ात काटिये

गागा लगा लगा लल गागा लगा लगा 



रुसवाइयों से रोज़ मुलाक़ात काटिये

जबतक है जान जिस्म में, दिनरात काटिये.

.

है आप में अना तो अना मुझ में भी है कुछ 

यूँ बात बात पे न मेरी बात काटिये.  

.

ये कामयाबियों के सफ़र के पड़ाव हैं  

अय्यारियाँ भी सीखिए जज़्बात काटिये.

.

अगली फसल कटे तो करें इंतज़ाम कुछ

तब तक टपकती छत में ही बरसात काटिये.

.

ये इल्तिज़ा है आपसे इस मुल्क के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 1, 2015 at 7:57am — 28 Comments

ग़ज़ल -नूर -मुश्किल सवाल ज़ीस्त के आसान हो गए

22 12 12 11 22 12 12

मुश्किल सवाल ज़ीस्त के आसान हो गए,

ता-हश्र हम जो कब्र के मेहमान हो गए.

.


जब से कमाई बंद हुई सब बदल गया

अपनों पे बोझ हो गए सामान हो गए.

.

मेरे ये हर्फ़ बन न सके गीत और ग़ज़ल

उनके तो वेद हो गए कुर’आन हो गए.

.

उसने बना के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 30, 2015 at 1:50pm — 28 Comments

ग़ज़ल -नूर -मेरे यार तराज़ू निकले.

22/22/22/22 (सभी संभव कॉम्बीनेशंस)



यादो के जब पहलू निकले

जंगल जंगल आहू निकले.     आहू-हिरण

.

काजल रात घटाएँ गेसू

उसके काले जादू निकले.

.

जज़्बातों को रोक रखा था

देख तुझे, बे-काबू निकले.

.

चाँद मेरी पलकों से फिसला   

आँखों से जब आँसू निकले.

.

तेरे ग़म में जब भी डूबा, 

मयखानों के टापू निकले. 

.

भीग गया धरती का आँचल  

अब मिट्टी से ख़ुशबू…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 29, 2015 at 8:30am — 22 Comments

ग़ज़ल -नूर 'मैं काफ़िर हूँ प् ना-शुक्रा नहीं हूँ'

१२२२/१२२२/१२२ 



किसी की आँख का क़तरा नहीं हूँ

ग़ज़ल में हूँ मगर मिसरा नहीं हूँ.

.

न जाने क्या करूँगा ज़िन्दगी भर  

तेरे सदमे से मैं उबरा नहीं हूँ.

.

अना से आपकी टकरा गया था

मैं टूटा हूँ मगर बिखरा नहीं हूँ.

.

खुदाया हश्र पर नरमी दिखाना

मैं काफ़िर हूँ प् ना-शुक्रा नहीं हूँ.

.

सफ़र में हूँ, कोई सूरज हो जैसे

कहीं भी एक पल ठहरा नहीं हूँ.

.

तराशेगी…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 28, 2015 at 10:08am — 12 Comments

ग़ज़ल -नूर



कहते हैं इल्ज़ाम छुपाकर रक्खा है

मैंने तेरा नाम छुपाकर रक्खा है.

.

झाँक के देखो मेरी इन आँखों में तुम

अनबूझा पैग़ाम छुपाकर रक्खा है.

.

शायद वो हो मुझ से भी ज़्यादा प्यासा

उसकी ख़ातिर जाम छुपाकर रक्खा है.

.

जिसको तुम सब कहते हो ईमाँ वाला,

उसने अपना दाम छुपाकर रक्खा है.

.  

आया है वो आज जुबां पर गुड लेकर

शायद कोई काम छुपाकर रक्खा है.

.

मस्जिद की…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 25, 2015 at 11:21pm — 24 Comments

ग़ज़ल-निलेश "नूर"

२१२२/ २१२२/ २१२२/२१२२ 



हादसा टूटा जो मुझ पे हादसा वो कम नहीं है

ग़म ज़माने का मुझे है इक तेरा ही ग़म नहीं है.  

.

या ख़ुदा! तेरे जहाँ का राज़ मैं भी जानता हूँ,

हैं ख़ुदा हर मोड़ पर लेकिन कहीं आदम नहीं है.

.

तेरे वादे की क़सम मर जाएँ हम वादे पे तेरे,

क्या करें वादे पे तेरे तू ही ख़ुद क़ायम नहीं है. 

.

ज़ख्म वो तलवार का हो वार हो चाहे जुबां का

वक़्त से बढकर जहाँ में कोई भी मरहम…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 25, 2015 at 8:00am — 24 Comments

शामिल न हुए अब तक हम उनकी दुआओं में,

(दोस्तों मतला लिखा था तरही मुशायरे के लिए ...लेकिन कल पेशावर की घटना ने इतना भाव विह्वल कर दिया कि जो कुछ बन पड़ा है,   बच्चो को श्रद्धांजली के रूप में आज ही पेश कर रहा हूँ .)



शामिल न हुए अब तक हम उनकी दुआओं में,

पर आज भी रखते हैं हम उनको ख़ुदाओं में.



हैवान हुए जाते हो अपनी…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on December 17, 2014 at 9:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल -निलेश "नूर"

मेरे दिल से ये भी न पूछिए, कि जला कहाँ ये बुझा कहाँ,

जो शरर था आग़ था ख़ाक है लगी इसको ऐसी हवा कहाँ.

.

कई संग उठे हैं मेरी तरफ़, कई उँगलियाँ मेरी ओर हैं,  

जो सज़ा मिली है गुनाह की वो गुनाह मैंने किया कहाँ.

.

मेरे लडखडाने की देर है, मुझे मयपरस्त कहेंगे सब,

उन्हें क्या पता मुझे इश्क़ है, कभी जाम मैंने छुआ कहाँ.     

.  

जो ख़ुदा कहे यहीं जम रहूँ, जो इशारा हो अभी चल पडूँ,

ये जो वक़्त है ये घड़ी का है, ये कभी किसी का हुआ कहाँ.   

.

ये…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 28, 2014 at 11:09am — 12 Comments

एक ग़ज़ल आपके हवाले

उल्टा सीधा बोल रही है दुनिया मेरे बारे में,

अखबारों ने छापा क्या कुछ, पढना मेरे बारे में.  

.

इस दुनिया में मिल न सकेंगे अगली बार मिलेंगे हम,

अर्श को जो भी अर्ज़ी भेजो, लिखना मेरे बारे में.

.

उनकी ज़ात से वाक़िफ़ हूँ, वो बाज़ नहीं आने वाले,

सर पर लेकर घूम रहे हैं फ़ित्ना मेरे बारे में.     

.

अपने दिल में एक दीया तुम मेरे नाम जला रखना, 

आँधी जाने सोच रही है क्या क्या मेरे बारे में.

.

मज्लिस से बाहर कर बैठे, उनकी जान में जाँ…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 22, 2014 at 1:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल -निलेश "नूर"

२१२२/ २१२२/२१२२/२१२ 

.

जाने कितने ग़म उठाता हूँ ख़ुशी के नाम पर,

ज़हर मै पीता रहा हूँ तिश्नगी के नाम पर.

.

ऐ सिकंदर!! जंग तूने जो लड़ी, कुछ भी नहीं,

जंग तो मै लड़ रहा हूँ ज़िन्दगी के नाम पर.

.

अधखिली कलियों की बू ख़ुद लूटता है बागबाँ,

शर्म सी आने लगी है आदमी के नाम पर.

.

शुक्रिया उस शख्स का जिसने बना…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 6, 2014 at 5:25pm — 27 Comments

ग़ज़ल-निलेश "नूर"

२१२२/११२२/22 (११२)

.

यूँ वफ़ाओं का सिला मिलता रहा,

ज़ख्म हर बार नया मिलता रहा.

.

एक छोटी सी मुहब्बत का गुनाह,

और इल्ज़ाम बड़ा मिलता रहा.

.

मै तुझे दोस्त मेरा कैसे कहूँ,

तू भी तो बन के ख़ुदा मिलता रहा..

.

कोई मंज़िल न मिली मंज़िल पर,

सिर्फ मंज़िल का पता मिलता रहा.

.…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 4, 2014 at 4:30pm — 27 Comments

ग़ज़ल ..तालीम-ओ-तरबीयत ने यूँ ख़ुद्दार कर दिया

गागा लगा लगा /लल /गागा लगा लगा 



तालीम-ओ-तरबीयत ने यूँ ख़ुद्दार कर दिया,

चलने से राह-ए-कुफ़्र पे इनकार कर दिया.

.

मै ज़ीस्त के सफर में गलत मोड़ जब मुड़ा,

मेरी ख़ुदी ने मुझको ख़बरदार कर दिया.

.

इज़हार-ए-इश्क़ में वो नज़ाकत नहीं रही, …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on August 25, 2014 at 6:00pm — 33 Comments

ग़ज़ल -ख़ताएँ कुछ रही होंगी, सज़ाए ज़िन्दगी लायक

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२ 

.

इरादे मैं यकीनन आज भी छोटे नहीं रखता,

मगर आँखों में अब अपनी तेरे सपने नहीं रखता.  

.

बड़ी शिद्दत से अपने इश्क़-ओ-रंजिश मै निभाता हूँ 

ख़बर रखता तो हूँ सबकी मगर फ़ि
तने नहीं रखता.

.

दिखाएगा वही सबको जो होंगे सामने उसके,

छुपाकर आईना कोई कभी चेहरे…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on August 17, 2014 at 9:30pm — 7 Comments

छोटी बह्र की एक ग़ज़ल-रात

जैसे जैसे बिख़री रात,

बिस्तर बिस्तर पिघली रात.

.

चाँद के साथ बदलती रँग,

काली भूरी कत्थई रात.

.

चाँद ज़मीं पर उतरा था,

हुई अमावस पिछली रात.

.

एक शम’अ थी साथ मेरे,  

फिर भी तन्हा सुलगी…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on August 12, 2014 at 10:24pm — 15 Comments

एक ग़ज़ल -जब दिल की धड़कने हों थमीं, क्यूँ जिगर चले?

22121211221212

.


जब रात ढल गई तो सितारे भी घर चले,

कुछ रिंद लड़खड़ाके चले थे, मगर चले. 

.

कुछ सोचने दो मुझ को कमाई का रास्ता. 

शेरो सुखन के दम पे भला कैसे घर चले. 

.

क्या है पड़ी मुझे कि जियूँ मै तेरे बग़ैर, 

जब दिल की धड़कने हों थमीं, क्यूँ जिगर चले? 

.

अब छोड़िये भी फ़िक्र हमारी हुज़ूर आप, …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on August 10, 2014 at 11:00pm — 4 Comments

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