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हमने खुद को ही शर्मसार किया

 ( 2122  1212  22/112 )

मैंने उसपर ही ऐतबार किया

बारहा जिसने मुझपे वार किया

मैं समझता रहा उसे अपना

उसने जड़ पर ही मेरे वार किया 

तुमने अपने लिये तो फूल चुने

मेरे हिस्से में सिर्फ खार किया 

फिर खुशी लौट कर नहीं आयी

हमने बस तेरा  इन्तिज़ार किया

वो जो बुनियाद थी भरोसे की

शक ने रिश्ता वो तार तार किया

लौ खुदा से अभी लगाई थी

किसकी यादों ने बेकरार किया 

गर यकीं तुम दिल नहीं सकते

कैसे कहते हो तुमने प्यार किया

ऐब हम हम ढूंढते रहे सबके

हमने खुद को ही शर्मसार किया 

तुमको नादिर बना के भेजा है

तुमने क्यूँ खुद को खाकसार किया 

 (मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 6, 2016 at 5:59pm
बेहतरीन . बढ़िया गजल .
Comment by नादिर ख़ान on May 6, 2016 at 11:49am

हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय मिथिलेश जी। .....
आभार

Comment by नादिर ख़ान on May 6, 2016 at 11:48am

आदरणीय तस्दीक साहब आपने अपना कीमती वक़्त और उपयोगी जानकारी साझा की मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ आपने बहुत अच्छा शेर दिया मगर मैं जो कहना चाह रहा हूँ शेर में के
"गर यकीं मैं तुम्हें दिला न सकूँ
कैसे कह दूँ के तुमसे प्यार किया"
अगर मैं तुम्हें अपने प्यार का यकीं /भरोसा नहीं दिल सकता तो मैं ये दावा कैसे कर सकता हूँ के मैंने तुमसे प्यार किया ।ये प्यार दो दोस्तों या दो भाइयों या पति पत्नी के बीच का है और गलतफहमियाँ तभी पैदा होती हैं जब यकीन कमजोर हो (एतमाद की कमी हो ) अगर यकीन /भरोसा नहीं आ रहा तो कहीं न कहीं कमी है जिसे मैं अपनी कमि बताना चाह रहा हूँ । शायद मैं अपनी बात समझा पाया ?

Comment by नादिर ख़ान on May 6, 2016 at 11:29am

जनाब समर साहब जारेहाना अंदाज़ में विस्तार से आपने तक़ाबुल-ए-रदीफ़ को समझाया बहुत शुक्रिया आपका यही ओ बी ओ की खासियत है यहाँ हर दिन कुछ  सीखने को मिलता है बस आँखें खुली रहें पुनः आपका बहुत शुक्रिया। ... 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2016 at 12:14am

आदरणीय नादिर खान सर जी, इस ग़ज़ल पर बढ़िया चर्चा हुई है. आपने इस्लाह अनुसार सुधार भी कर लिए है. आपको हार्दिक बधाई 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 5, 2016 at 8:04pm

मोहतरम जनाब नादिर साहिब आदाब ,  मान रखने का बहुत बहुत शुक्रिया। .... शेर 7 अगर सही लगे तो इस तरह किया जासकता है

तुमने मुझ पर यक़ीं किया न मगर

मैं ने बेलौस तुम से प्यार किया । सादर

Comment by Samar kabeer on May 5, 2016 at 2:50pm
जनाब नादिर खान साहिब आदाब,अछि ग़ज़ल कही है आपने , दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ।

काफ़ी चर्चा हो चुकी आपकी ग़ज़ल पर , तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष मान्य होते हुए भी बहर हाल दोष तो है।

'अनुज' जी ने तक़ाबुल-ए-रदीफ़ की मिसाल में मीर साहब का शैर लिखा है इस तअल्लुक़ से मैं यहाँ यह अर्ज़ करना चाहता हूँ कि तक़ाबुल-ए-रदीफ़,शुतरगुर्बा,ऐब-ए-तनाफ़ुर, यह सभी दोष मीर साहिब के ज़माने में राइज नहीं थे,मीर साहिब का एक मतला देखिये :-

"जाए है जी निजात के ग़म में
ऐसी जन्नत गई जहन्नम में"

इस मतले में ऐब-ए-तनाफ़ुर का दोष साफ़ नज़र आ रहा है।

मीर साहिब का एक और मतला देखिये :-

"क़त्ल किये पर ग़ुस्सा क्या है,लाश मेरी उठवाने दो
जान से तो हम जाते रहे हैं, तुम भी आओ जाने दो"

इस मतले में शुतरगुर्बा का दोष साफ़ नज़र आरहा है यही कारण है कि मीर को दुनियाए अदब में सनद का दर्जा हासिल नहीं है, कहने का तात्पर्य यह है कि यह सारे दोष हज़रत-ए-'दाग़' के दौर में राइज हुए है।
Comment by नादिर ख़ान on May 5, 2016 at 11:29am

आदरणीय अनुज जी हमलोग सीखने की प्रक्रिया में हैं, इस लिए जितना हो सके ऐब से बचना ज़रूरी है , ऐसा हमारा मानना है कीमती वक़्त और इस्लाह का बहुत बहुत शुक्रिया। 

Comment by नादिर ख़ान on May 5, 2016 at 11:24am

जनाब शिज्जु साहब कीमती वक़्त देने और मशवरा का शुक्रिया ऐब दूर कर लेने में ही भलाई है । 

Comment by नादिर ख़ान on May 5, 2016 at 11:18am

आदरणीय तस्दीक साहब इस्लाह का बहुत शुक्रिया ध्यान देने के बावजूद गलतियां रह जाती हैं
एकाग्रता (concentration) की कमी है मुझमें हड़बड़ी ज्यादा रहती है ।

दूसरे शेर को इस तरह किया है तवज्जो चाहूँगा 

मैं तो अपना समझ रहा था जिसे
उसने जड़ पर ही मेरे वार किया

या जो आपने कहा है

जिसको अपना समझ रहा था मैं
उसने ही मेरी जड़ पे वार किया ।


मूल प्रति में चेंज कर लेंगे ...
७ वें शेर को क्या इस प्रकार किया जा सकता है

गर यकीं मैं तुम्हें दिला न सकूँ
कैसे कह दूँ के तुमसे प्यार किया ... सुधीजनों से इस्लाह की दरख्वास्त है।

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