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Hari Prakash Dubey
  • Male
  • Haridwar,Uttarakhand
  • India
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Hari Prakash Dubey's blog post एक बोझ भरी गठरी: लघुकथा
"आ. हरिप्रकाश जी, अच्छी कथा हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Jan 23
Samar kabeer commented on Hari Prakash Dubey's blog post एक बोझ भरी गठरी: लघुकथा
"जनाब हरिप्रकाश दुबे जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Jan 21
Sheikh Shahzad Usmani commented on Hari Prakash Dubey's blog post एक बोझ भरी गठरी: लघुकथा
"आदाब। कड़वा सत्य, किंतु नकारात्मक संदेश देती विचारोत्तेजक रचना। हार्दिक बधाई आदरणीय हरिप्रकाश दुबे साहिब।"
Jan 20
Hari Prakash Dubey posted a blog post

एक बोझ भरी गठरी: लघुकथा

एक तो पिछला कर्ज ही अभी तक माफ नहीं हुआ था उस पर इस बार फिर फसल के चौपट होने और साहूकार के ब्याज की दोहरी मार उसके लिए असहनीय थी, घर में सभी को कुपोषण और बीमारी ने घेर रखा था। इस बार ना तो मदद को सरकार थी, ना ही लोग।आखिरकार उसने शहर जाकर मजदूरी या कुछ और कर कमाने का फैसला लिया और जब वह लगभग नग्न बदन, एक बोझ भरी गठरी जिसमें कुछ सुखी रोटी और प्याज थी, लेकर , शहर के चौराहे नुमा पुल पर पहुंचा तो उसने पाया की उसके लिए सभी रास्ते बंद हैं और अवसाद ग्रस्त होकर उसने उसी पुल से नीचे खाई में छलांग लगाकर…See More
Jan 19
Samar kabeer commented on Hari Prakash Dubey's blog post अंतिम संस्कार :लघुकथा:हरि प्रकाश दुबे
"जनाब हरि प्रकाश दुबे जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Dec 27, 2018
विनय कुमार commented on Hari Prakash Dubey's blog post अंतिम संस्कार :लघुकथा:हरि प्रकाश दुबे
"बढ़िया रचना है आ हरी प्रकाश दुबे जी, बहुत बहुत बधाई आपको"
Dec 27, 2018
babitagupta commented on Hari Prakash Dubey's blog post अंतिम संस्कार :लघुकथा:हरि प्रकाश दुबे
" व्यक्ति का  चन्द समय के ऐशोआराम के लिए गलत तरीके  से मजबूरी  में किया गया फैसले के दुष्परिणाम को दर्शाती बेहतरीन रचना ।बधाई स्वीकार कीजिएगा, आदरणीय हरिप्रकाश सरजी।"
Dec 27, 2018
Hari Prakash Dubey posted a blog post

अंतिम संस्कार :लघुकथा:हरि प्रकाश दुबे

“अरे सुनो !”“अभी अम्मा जाग रहीं है... चुप !”“बक पगली, कुछ काम की बात है, इधर तो आओ !”“हां , बोलो !”अरे ये मूँगफली का ठेला अब बेकार हो गया है, कोई कमाई नहीं रही !”“काहें, अब का हुआ?!”अरे, ससुरे सब आतें हैं , थोडा सा कुछ खरीदतें हैं बाकी सब फोड़-फोड़ चबा जातें है, जानती हो ,रोज घाटा उठा रहें हैं हम, और अब देखिये ना मंडी का पैसा भी पूरा नहीं हो पा रहा है, देने को !“तब! बुधिया के बापू अब का सोच रहें हैं ?””अरे बुधिया की अम्माँ, एक दरोगा जी अपने मित्र हैं, कह रहे थे, जगह हम दिलवा देंगे, तुम अंडे का…See More
Dec 27, 2018
Neelam Upadhyaya commented on Hari Prakash Dubey's blog post मंदिर की घंटी :हरि प्रकाश दुबे
"आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई। "
Nov 5, 2018
Samar kabeer commented on Hari Prakash Dubey's blog post मंदिर की घंटी :हरि प्रकाश दुबे
"जनाब हरिप्रकाश दुबे जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 2, 2018
TEJ VEER SINGH commented on Hari Prakash Dubey's blog post मंदिर की घंटी :हरि प्रकाश दुबे
"हार्दिक बधाई आदरणीय हरि प्रकाश जी। बेहतरीन संदेश पूर्ण रचना।"
Nov 2, 2018
Hari Prakash Dubey posted a blog post

मंदिर की घंटी :हरि प्रकाश दुबे

सुदूर पहाड़ी पर एक प्रसिध्द ‘माँ दुर्गा’ का एक मन्दिर था, जिसका संचालन एक ट्रस्ट के हाथ में था। उसमे पुजारी, आरती करने वाला, प्रसाद वितरण करने वाला, मंदिर की सफाई करने वाला, मंदिर की आरती के समय घंटी बजाने वाला आदि सभी लोग ट्रस्ट द्वारा दी जाने वाली दक्षिणा एवम भोजन पर रखे गए थे।आरती खत्म हो जाने के बाद जहाँ अन्य लोग चढ़ावे को इक्कठा कर कोष में जमा कराने में तत्पर रहते थे वही घंटी बजाने वाला ‘घनश्याम’ आरती के समय भाव के साथ इतना भावविभोर हो जाता था कि होश में ही नही रहता था।मन्दिर में आने वाले…See More
Nov 1, 2018
Hari Prakash Dubey commented on Hari Prakash Dubey's blog post रिश्तों का सच
"आदरणीय  Samar kabeer सर , आदरणीय विनय कुमार भाईसाहब ,आदरणीय TEJ VEER SINGH जी ,आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी ,आदरणीय  narendrasinh chauhan जी आप सभी का हृदय की अतल …"
Nov 1, 2018
narendrasinh chauhan commented on Hari Prakash Dubey's blog post रिश्तों का सच
"बहोत खूब सुन्दर रचना । हार्दिक बधाई ।"
Sep 12, 2018
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Hari Prakash Dubey's blog post रिश्तों का सच
"आ. भाई हरि प्रकाश जी, अच्छी कथा हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Sep 12, 2018
TEJ VEER SINGH commented on Hari Prakash Dubey's blog post रिश्तों का सच
"हार्दिक बधाई आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी।बेहतरीन लघुकथा।विवाहित जीवन की सच्चाई थोड़ी कड़वी है क्योंकि आदमी को शादी के बाद बीवी और माँ के बीच तालमेल बिठाने में बहुत कशमकश का सामना करना पड़ता है।"
Sep 11, 2018

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City State
Haridwar Uttarakhand
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Haridwar
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एक बोझ भरी गठरी: लघुकथा

एक तो पिछला कर्ज ही अभी तक माफ नहीं हुआ था उस पर इस बार फिर फसल के चौपट होने और साहूकार के ब्याज की दोहरी मार उसके लिए असहनीय थी, घर में सभी को कुपोषण और बीमारी ने घेर रखा था। इस बार ना तो मदद को सरकार थी, ना ही लोग।

आखिरकार उसने शहर जाकर मजदूरी या कुछ और कर कमाने का फैसला लिया और जब वह लगभग नग्न बदन, एक बोझ भरी गठरी जिसमें कुछ सुखी रोटी और प्याज थी, लेकर , शहर के चौराहे नुमा पुल पर पहुंचा तो उसने पाया की उसके लिए सभी रास्ते बंद हैं और अवसाद ग्रस्त होकर उसने उसी पुल से नीचे…

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Posted on January 19, 2019 at 12:30pm — 3 Comments

अंतिम संस्कार :लघुकथा:हरि प्रकाश दुबे

“अरे सुनो !”

“अभी अम्मा जाग रहीं है... चुप !”

“बक पगली, कुछ काम की बात है, इधर तो आओ !”

“हां , बोलो !”

अरे ये मूँगफली का ठेला अब बेकार हो गया है, कोई कमाई नहीं रही !”

“काहें, अब का हुआ?!”

अरे, ससुरे सब आतें हैं , थोडा सा कुछ खरीदतें हैं बाकी सब फोड़-फोड़ चबा जातें है, जानती…

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Posted on December 26, 2018 at 8:30pm — 3 Comments

मंदिर की घंटी :हरि प्रकाश दुबे

सुदूर पहाड़ी पर एक प्रसिध्द ‘माँ दुर्गा’ का एक मन्दिर था, जिसका संचालन एक ट्रस्ट के हाथ में था। उसमे पुजारी, आरती करने वाला, प्रसाद वितरण करने वाला, मंदिर की सफाई करने वाला, मंदिर की आरती के समय घंटी बजाने वाला आदि सभी लोग ट्रस्ट द्वारा दी जाने वाली दक्षिणा एवम भोजन पर रखे गए थे।

आरती खत्म हो जाने के बाद जहाँ अन्य लोग चढ़ावे को इक्कठा कर कोष में जमा कराने में तत्पर रहते थे वही घंटी बजाने वाला ‘घनश्याम’ आरती के समय भाव के साथ इतना भावविभोर हो जाता था कि होश में ही नही…

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Posted on November 1, 2018 at 10:09pm — 3 Comments

रिश्तों का सच

आज उसे अपने वादे के मुताबिक अपनी पत्नी के साथ पास के एक माॅल में ही फिल्म देखने जाना था। कुछ ज्यादा उत्साहित तो नहीं था, लेकिन फिर भी अपनी पत्नी के लिए कुछ 'खास' करने की खुशी उसके चेहरे पर दिखाई दे रही थी। आॅफिस की नोंक झोंक और रास्ते में ट्रैफिक की रोक टोक जैसी बाधाओं को पार कर, जब वो घर पहुंचा तो अत्याधिक शांति पाकर थोड़ा ठिठक सा गया। हाॅल में घुसते ही, एक जाना पहचाना चेहरा जो शायद…

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Posted on September 10, 2018 at 3:00pm — 6 Comments

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At 10:17pm on November 16, 2017, Manoj kumar shrivastava said…

क्षमा चाहता हूॅं आदरणीय मैं इस मंच पर सतत नहीं था।

At 7:01pm on January 3, 2016, Sushil Sarna said…

नूतन वर्ष 2016 आपको सपरिवार मंगलमय हो। मैं प्रभु से आपकी हर मनोकामना पूर्ण करने की कामना करता हूँ।

सुशील सरना

At 10:39am on January 23, 2015, Dr. Vijai Shanker said…
स्वागत है आपका आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी. आपकी मित्रता एक सम्मान है मेरे लिए।
सादर।
At 4:56pm on January 9, 2015, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय हरिप्रकाश जी ..आपका मित्र होना मेरे लिए सुखद है ..आपकी रचना को माह की श्रेष्ठ  रचना का सम्मान मिला इस सफलता के लिए आपको ढेर सारी बधाई सादर 

At 7:52pm on January 7, 2015, harivallabh sharma said…

आदरणीय Hari Prakash Dubey साहब स्वागत आपका, एवं माह की श्रेष्ठ आपकी रचना हेतु चयनित होने पर हार्दिक बधाई स्वीकारें..सादर.

At 5:11pm on January 3, 2015, vikram singh saini said…

आपकी मित्रता का ह्रदय से स्वागत है आदरणीय हरि प्रकाश जी

At 9:55pm on December 29, 2014,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय  हरी प्रकाश दुबे  जी .... नमस्कार .... क्षमा चाहता हूँ लाइव चैट पर आपका मेसेज देख नहीं पाया तब मैं राहुल दांगी जी की ग़ज़ल पढ़ कर उस पर टीप लिख रहा था ... सादर 

At 11:51pm on December 15, 2014,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय  हरी प्रकाश दुबे  जी,
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी रचना " कविता : तुम्हारा घोंसला" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 5:34pm on November 20, 2014, Rita Gupta said…

धन्यवाद ,आभार आपका। 

At 5:57pm on November 10, 2014, vijay nikore said…

मित्रता का हाथ बढ़ाने के लिए आभार।

सादर,

विजय निकोर

 
 
 

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