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PHOOL SINGH
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PHOOL SINGH posted a blog post

पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी

तरीफे उनकी क्यूँ लगतीजहर से भरी मीठी बातेंहर पिशुन/चुगलखोर कीझूठी बातें भी सच्ची लगती|| स्वार्थ की तह तक गिरऔछी हरकते करते रहतेभलाई का दामन औढकर  सहकर्मियों की बुराई वो करते|| दूसरों के काम में टांग अड़ानाआदतों में शुमार उनकीसहकर्मियों को आपस में भिड़ाकरफिर निश्छल होने का ढोंग रचाते|| लाभ ना हो जाए कहीं किसी कोबुगले के जैसा ध्यान लगातेएडी चोटी का ज़ोर लगाअडचने पैदा खूब कराते आने-जाने और खाने-पीने पर भीगिद्ध की तरह वो नजरे रखतेमौका मिले उन्हे जब कुछ कहने काना समय गवाए सभी का दोष बताते|| अपने पन का…See More
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vijay nikore commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"इस सुन्दर रचना के लिए बधाई, मित्र फूल सिंह जी"
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बाल साहित्य

यहाँ पर बाल साहित्य लिखा जा सकता है |
Nov 14
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post आगे बढ़, बस बढ़ता चल
"कबीर सर, मेरी रचनाओ को आपकी टिप्पणी का सदा इंतज़ार रहता इसके लिए मै बहुत शुक्र गुज़र हूँ "
Nov 13
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"कबीर सर, मेरी रचनाओ को आपकी टिप्पणी का सदा इंतज़ार रहता इसके लिए मै बहुत शुक्र गुज़र हूँ "
Nov 13
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"भाई लक्ष्मण को मेरी रचना के लिए आपने समय निकाला इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद "
Nov 13
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"आ. भाई फूलसिंह जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Nov 10
Samar kabeer commented on PHOOL SINGH's blog post मुक्ति का द्वार
"जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 9
Samar kabeer commented on PHOOL SINGH's blog post आगे बढ़, बस बढ़ता चल
"जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 9
PHOOL SINGH posted a blog post

मुक्ति का द्वार

एक फूल दो है, मालीधर्म-कर्म की यही कहानीआत्मा-परमात्मा में भेद करादुनियांदारी में हमे फसा-फसाकर, जन्म-मरण का चक्कर कटवाती || अहंकार रूपी ये पुत्र हमारा, धन रूपी सा भाई,मोह रूपी ये पुत्रवधू, आशा रूपी ये स्त्री प्यारीआसक्ति लगा के इनमेकर्म बंधन से ना मुक्ति पाई|| ममतामयी माँ रूप बना ये, हम पर खूब ये, प्यार लुटाताबहन बन ये जब भी आता, रक्षा का ये फर्ज़ सिखाताज्ञान का मार्ग दिखा हमे येँगुरु-पिता का भाव जताता,|| शरीर को अपनी आत्मा, समझ हमचाह-चाह कर इससे, प्रेम जतातेकर्तव्यों में ही खोये रखते,पर मोक्ष…See More
Nov 9
PHOOL SINGH commented on vijay nikore's blog post धूल का परदा
"एक सुंदर रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई "
Nov 8
PHOOL SINGH commented on Dr. Vijai Shanker's blog post अकेलापन —डॉo विजय शंकर
"डॉ साहब बहुत सुंदर रचना बधाई स्वीकारे"
Nov 8
PHOOL SINGH commented on Sushil Sarna's blog post कुछ हाइकु :
"सर आप इतने कम शब्दो में एक बहुत भाव कैसे प्रस्तुत कर देते है आपको बहुत बहुत बधाई"
Nov 8
PHOOL SINGH commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post कुण्डलिया छंद
"एक बहतरीन प्रस्तुति के लिए बधाई "
Nov 8
PHOOL SINGH posted a blog post

आगे बढ़, बस बढ़ता चल

चहेरे पर मुस्कान को रखकुछ नया करने की चाहत रखस्वयं पर दृढ़ विश्वास को रखआगे बढ़ बस आगे बढ़ता चल || सहयोग बलिदान की भावना रखजिम्मेदारियों ना तू डरटीम वर्क पर विश्वास जताहौंसले संग तू आगे बढ़ || नामुमकिन कुछ नहीं है जग मेंमन में थोड़ा धैर्य रखअसफलताओ से सीख लेमुकाम को अपने हासिल कर || कहने वाले कहते हैंउनकी बातों पर ध्यान ना धरकठिन पर अडचने आतीजीवन के इस मंत्र को पढ़ || कर्तव्य पथ कदम बढ़ानिश्चित अपना लक्ष्य करलग्न से कड़ी तू मेहनत करलक्ष्य अपना फतेह तो कर || "मौलिक व अप्रकाशित"See More
Nov 8
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post कहाँ हूँ, कौन हूँ मैं
"भाई छोटेलाल मेरी रचना के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद "
Nov 4

Profile Information

Gender
Male
City State
DELHI
Native Place
DELHI
Profession
KALSHANIA CONSULTANCY
About me
NOTHING MUCH

जीवन संगिनी

हार हार का टूट चुका जब

तुमसे ही आश बाँधी है

मैं नहीं तो तुम सही

समर्थ जीवन की ठानी है||

 

मजबूर नहीं मगरूर नहीं मैं 

मोह माया में चूर नहीं मैं

साथ तुम्हारा मिल जाए तो

लक्ष्य से भी दूर नहीं मैं ||

 

सुख दुःख की घटना तो

जीवन में घटती रहती है

छोटी छोटी नोक झोंक भी

हर रिश्ते में होती है 

छोड़ न देना साथ निभाना

तुमसे, प्रेम की डोर जो बाँधी है||

 

गलत किये थे कुछ निर्णय

ये बात भी स्वीकारी है

मैं  गलत और तुम सही

गलती मैंने मानी है

मझधार में फसीं जिंदगी की

नैया पार लगानी है||

 

जीवन संगिनी बनकर,

मेरी जिंदगी, सँवारी है

घर नहीं मेरे दिल में रहना

बस ख़्वाहिश ये हमारी है

मैं नहीं तो तुम सही

समर्थ जीवन की ठानी है||

 

PHOOL SINGH's Blog

पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी

तरीफे उनकी क्यूँ लगती

जहर से भरी मीठी बातें

हर पिशुन/चुगलखोर की

झूठी बातें भी सच्ची लगती||

 

स्वार्थ की तह तक गिर

औछी हरकते करते रहते

भलाई का दामन औढकर  

सहकर्मियों की बुराई वो करते||

 

दूसरों के काम में टांग अड़ाना

आदतों में शुमार उनकी

सहकर्मियों को आपस में भिड़ाकर

फिर निश्छल होने का ढोंग रचाते||

 

लाभ ना हो जाए कहीं किसी को

बुगले के जैसा ध्यान लगाते

एडी चोटी का ज़ोर…

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Posted on November 19, 2019 at 2:56pm

मुक्ति का द्वार

एक फूल दो है, माली

धर्म-कर्म की यही कहानी

आत्मा-परमात्मा में भेद करा

दुनियांदारी में हमे फसा-फसाकर, जन्म-मरण का चक्कर कटवाती ||

 

अहंकार रूपी ये पुत्र हमारा, धन रूपी सा भाई,

मोह रूपी ये पुत्रवधू, आशा रूपी ये स्त्री प्यारी

आसक्ति लगा के इनमे

कर्म बंधन से ना मुक्ति पाई||

 

ममतामयी माँ रूप बना ये, हम पर खूब ये, प्यार लुटाता

बहन बन ये जब भी…

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Posted on November 8, 2019 at 11:52am — 5 Comments

आगे बढ़, बस बढ़ता चल

चहेरे पर मुस्कान को रख

कुछ नया करने की चाहत रख

स्वयं पर दृढ़ विश्वास को रख

आगे बढ़ बस आगे बढ़ता चल ||



सहयोग बलिदान की भावना रख

जिम्मेदारियों ना तू डर

टीम वर्क पर विश्वास जता

हौंसले संग तू आगे बढ़ ||

 

नामुमकिन कुछ नहीं है जग में

मन में थोड़ा धैर्य रख

असफलताओ से सीख ले

मुकाम को अपने हासिल कर ||

 

कहने वाले कहते हैं

उनकी बातों पर ध्यान ना धर

कठिन पर अडचने…

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Posted on November 6, 2019 at 5:00pm — 2 Comments

बारिश की एक बूंद

 

घने-काले बादलों से निकल बूंद, जब

सपनों में, अनगिनत खो जाती है

कहाँ गिरूंगी कैसे गिरूंगी

सोच-सोच घबराती है ||

 

क्या गिरूंगी, फूल पराग में

या धुल संग मिल जाऊँगी

कहीं बनूँगी, ओस का मोती

और मनमोहकबन जाऊँगी ||

 

कहीं बनूँ, जीवन आधार मैं

जीव की प्यास बुझाऊंगी

या जा गिरूंगी धधकती ज्वाला

क्षणभर में ही जल जाऊँगी…

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Posted on October 31, 2019 at 4:55pm — 6 Comments

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