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कापुरुष है, जता रही गाली// सौरभ

२१२२ १२१२ २२/११२

तमतमा कर बकी हुई गाली

कापुरुष है, जता रही गाली

 

भूल कर माँ-बहन व रिश्तों को

कोई देता है बेतुकी गाली

 

कुछ नहीं कर सका बुरा मेरा

खीझ उसने उछाल दी गाली 

 

ढंग-व्यवहार के बदलने से

हो गयी विष बुझी वही गाली

 

कब मुलायम लगी कठिन कब ये

सोचना कब दुलारती गाली

 

कौन कहिए यहाँ जमाने में

अदबदा कर न दी कभी गाली

 

नाज से तुम सहेज कर रखना

संस्कारों पली-बढ़ी…

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Added by Saurabh Pandey on August 29, 2025 at 5:30pm — 2 Comments

भादों की बारिश

भादों की बारिश
(लघु कविता)
***************

लाँघ कर पर्वतमालाएं
पार कर
सागर की सर्पीली लहरें
मैदानों में दौड़ लगा
थकी हुई-सी
धीरे-धीरे कदम बढ़ाती
आ जाती है
बिना आहट किए
यह बूढ़ी
भादों की बारिश।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 25, 2025 at 7:36pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - चली आयी है मिलने फिर किधर से ( गिरिराज भंडारी )

चली आयी है मिलने फिर किधर से

१२२२   १२२२    १२२

जो बच्चे दूर हैं माँ –बाप – घर से

वो पत्ते गिर चुके समझो, शज़र से

 

शिखर पर जो मिला तनहा मिला है

मरासिम हो अहम, तो बच शिखर से

 

रसोई  में  मिला  वो स्वाद  आख़िर

गुमा था जो किचन में  उम्र  भर से  

 

तू बाहर बन सँवर के आये जितना

मैं भीतर झाँक सकता हूँ , नज़र से

 

छिपी  है ज़िंदगी  में  मौत  हरदम

वो छू  लेगी  अगर  भागेगा डर…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 22, 2025 at 7:15pm — 7 Comments

कुंडलिया. . . . .

कुंडलिया. . .

चमकी चाँदी  केश  में, कहे उम्र  का खेल ।
स्याह केश  लौटें  नहीं, खूब   लगाओ  तेल ।
खूब  लगाओ  तेल , वक्त  कब  लौटे  बीता ।
भला उम्र की दौड़ , कौन है आखिर जीता ।
चौंकी बढ़ती  उम्र , जरा जो बिजली दमकी ।
व्यग्र  करें  वो  केश , जहाँ पर चाँदी चमकी ।

सुशील सरना / 22-8-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on August 22, 2025 at 1:30pm — 2 Comments

तरही ग़ज़ल: इस 'अदालत में ये क़ातिल सच ही फ़रमावेंगे क्या

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

इस 'अदालत में ये क़ातिल सच ही फ़रमावेंगे क्या

वैसे भी इस गुफ़्तगू से ज़ख़्म भर जावेंगे क्या

आप आ'ला हैं तो हमको हक़ हमारा दीजिये

आपके रहम-ओ-करम पे जीस्त जी पावेंगे क्या

इल्म का अब हाल…

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Added by Aazi Tamaam on August 19, 2025 at 11:30pm — 7 Comments

दोहा सप्तक. . . . . विविध

मंजिल हर सोपान की, केवल है  अवसान ।

मुश्किल है पहचानना, जीवन के सोपान ।।

 

छोटी-छोटी बात पर, होने लगे तलाक ।

पल में टूटें आजकल, रिश्ते सारे पाक ।।

 

छोटे से परिवार में, सीमित  है औलाद ।

उस पर भी होते नहीं, आपस में संवाद ।।

 

पति-पत्नी के प्रेम का, अजब हुआ है हाल ।

प्रेम जाल में गैर के, दोनों हुए हलाल ।।

 

कत्ल प्रेम में आजकल, हर दिन  होते आम ।

नाता जोड़ें गैर से, फिर होते बदनाम ।।

 

धोखा…

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Added by Sushil Sarna on August 19, 2025 at 3:00pm — 6 Comments

छन्न पकैया (सार छंद)

छन्न पकैया (सार छंद)

-----------------------------

छन्न पकैया - छन्न पकैया, तीन रंग का झंडा।

लहराता अब धरा - चाँद पर, करता मन को ठंडा।।

छन्न पकैया - छन्न पकैया, देश जान से प्यारा।

हम सबके ही मन में बहती, देश प्रेम की धारा।।

छन्न पकैया- छन्न पकैया, दुर्गम अपनी राहें।

मन में है कोमलता बसती, फ़ौलादी हैं बाँहें।।

छन्न पकैया- छन्न पकैया, हम भारत के फौजी।

तन पर सहते कष्ट हज़ारों, फिर भी मन के…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 19, 2025 at 1:00pm — 3 Comments

गहरी दरारें (लघु कविता)

गहरी दरारें (लघु कविता)

********************

जैसे किसी तालाब का

सारा जल सूखकर

तलहटी में फट गई हों गहरी दरारें 

कुछ वैसी ही लग रही थी

उस वृद्ध की एड़ियां 

शायद तपा होगा वह भी 

उस तालाब सा कर्त्तव्य की धूप में 

अर्पित कर दिया होगा

अपने रक्त का कतरा - कतरा

अपनों को पालने में।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 18, 2025 at 1:00pm — 3 Comments

शेष रखने कुटी हम तुले रात भर -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

212/212/212/212

****

केश जब तब घटा के खुले रात भर

ठोस पत्थर  हुए   बुलबुले  रात भर।।

*

देख सावन के आँसू छलकने लगे

और जुगनू  हुए  चुलबुले रात भर।।

*

हाल अपना मगर इसके विपरीत था

नैन  डर  से  रहे  अधखुले  रात भर।।

*

धार फूटी कहीं फोड़ पाषाण को

शेष रखने कुटी हम तुले रात भर।।

*

देख तारों को मद्धम जो इतरा गयी

दर्प उस  चाँदनी  के  घुले रात भर।।

*

खोल मन बिजलियाँ खिलखिलाती रहीं

कह गये …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 17, 2025 at 8:56pm — 4 Comments

ग़ज़ल: चार पहर कट जाएँ अगर जो मुश्किल के

२२ २२ २२ २२ २२ २

चार पहर कट जाएँ अगर जो मुश्किल के

हो जाएँ आसान रास्ते मंज़िल के

हर पल अपना जिगर जलाना पड़ता है

तब जाके अल्फाज़ महकते हैं दिल के

नफ़रत बो कर लोगों के ज़ह्न–ओ–दिल में

ख़्वाब दिखाते हैं साहिब मुस्तक़बिल के

कश्ती की हस्ती है बीच भँवर लेकिन…

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Added by Aazi Tamaam on August 13, 2025 at 3:00pm — 7 Comments

जो समझता रहा कि है रब वो।

2122 1212 22

1

देख लो महज़ ख़ाक है अब वो।

जो समझता रहा कि है रब वो।।

2

हो जरूरत तो खोलता लब वो।

बात करता है बे सबब कब वो।।

3

उठ सकेगा नहीं कभी अब वो।

बोझ भारी तले गया दब वो।।

4

ज़िन्दगी क्या है तब समझ आया।

मौत से रू ब रू हुआ जब वो।।

5

वक़्त आया हुआ बुरा जिसका।

रोकने से भला रुका कब वो।।

6

गर जरूरत पड़ी दिखाएगा।

जानता है हरेक करतब वो।

7

बात समझा नहीं मुहब्बत…

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Added by surender insan on August 12, 2025 at 3:00pm — 5 Comments

कुंडलिया. . . .

 

धोते -धोते पाप को, थकी गंग की धार ।
कैसे होगा जीव का, इस जग में उद्धार ।
इस जग में उद्धार , धर्म से रिश्ते झूठे ।
मन में भोग-विलास, आचरण दिखें अनूठे ।
कर्मों के परिणाम , देख फिर हरदम रोते ।
करें न मन को शुद्ध , गंग में बस तन धोते ।

सुशील सरना / 10-8-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on August 10, 2025 at 7:00pm — 4 Comments

अस्थिपिंजर (लघुकविता)

लूटकर लोथड़े माँस के 

पीकर बूॅंद - बूॅंद रक्त 

डकारकर कतरा - कतरा मज्जा

जब जानवर मना रहे होंगे उत्सव 

अपने आएंगे अपनेपन का जामा पहन

मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए 

नहीं बची होगी कोई बूॅंद तब तक 

निचोड़ने को अपने - पराए की

बचा होगा केवल सूखे ठूॅंठ सा

निर्जिव अस्थिपिंजर ।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 29, 2025 at 3:57pm — 3 Comments

कुंडलिया

पलभर में धनवान हों, लगी हुई यह दौड़ ।

युवा मकड़ के जाल में, घुसें समझ कर सौड़ ।

घुसें समझ कर सौड़ , सौड़ काँटों का बिस्तर ।

लालच के वश होत , स्वर्ग सा जीवन बदतर ।

खाते सब 'कल्याण', भाग्य का नभ थल जलचर ।

जब देते भगवान , नहीं फिर लगता पलभर ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 24, 2025 at 2:22pm — 3 Comments

पूनम की रात (दोहा गज़ल )

धरा चाँद गल मिल रहे, करते मन की बात।

जगमग है कण-कण यहाँ, शुभ पूनम की रात।

जर्रा - जर्रा नींद में , ऊँघ रहा मदहोश।

सन्नाटे को चीरती, सरसर बहती वात।

मेघ चाँद को ढाँपते , ज्यों पशमीना शाल।

परिवर्तन संदेश दे , चमकें तारे सात।

हूक हृदय में ऊठती, ज्यों चकवे की प्यास।

छत पर छिटकी चाँदनी, बेकाबू जज़्बात।

बिजना था हर हाथ में, सभी सुखी थे

झोल।

गलियों में ही खाट पर, सोता था देहात।

दिनभर…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 14, 2025 at 8:30pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तरही ग़ज़ल - गिरिराज भंडारी

वहाँ  मैं भी  पहुंचा  मगर  धीरे धीरे 

१२२    १२२     १२२     १२२   



बढी भी तो थी ये उमर धीरे  धीरे

तो फिर क्यूँ न आये हुनर धीरे धीरे

चमत्कार पर तुम भरोसा करो मत

बदलती  है  दुनिया मगर धीरे धीरे

हक़ीक़त पचाना न था इतना आसां

हुआ सब पे सच का असर धीरे धीरे

ज़बाँ की लड़ाई अना  का है क़िस्सा

ये समझोगे तुम भी मगर धीरे धीरे

ग़मे ज़िंदगी ने यूँ ग़फ़लत में  डाला

हुये इल्मो  फन बे असर…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 14, 2025 at 7:58pm — 8 Comments

सुखों को तराजू में मत तोल सिक्के-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२/१२२/१२२/१२२

*

कथा निर्धनों की कभी बोल सिक्के

सुखों को तराजू में मत तोल सिक्के।१।

*

महल को तिजोरी रहा खोल सिक्के

कहे झोपड़ी  का  नहीं मोल सिक्के।२।

*

लगाता है  सबके  सुखों को पलीता

बना रोज रिश्तों में क्यों होल सिक्के।३।

*

रहें दूर या फिर  निकट  जिन्दगी में

बजाता है सबको बना ढोल सिक्के।४।

*

सिधर भी गये तो न बक्शेंगे हमको

रहे जिन्दगी में  जो ये झोल सिक्के।५।

*

नहीं  पेट    ताली  …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 10, 2025 at 3:15pm — 3 Comments

घाव भले भर पीर न कोई मरने दे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

अच्छा लगता है गम को तन्हाई में

मिलना आकर तू हमको तन्हाई में।१।

*

दीप तले क्यों बैठ गया साथी आकर

क्या डर लगता है तम को तन्हाई में।२।

*

छत पर बैठा मुँह फेरे वह खेतों से

क्या सूझा है मौसम को तन्हाई में।३।

*

झील किनारे बैठा चन्दा बतियाने

देख अकेला शबनम को तन्हाई में।४।

*

घाव भले भर पीर न कोई मरने दे

जा तू समझा मरहम को तन्हाई में।५।

*

साया भी जब छोड़ गया हो तब यारो

क्या मिलना था बेदम को तन्हाई में।६।

*

बीता वक्त…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2025 at 10:49pm — 4 Comments

यथार्थवाद और जीवन

यथार्थवाद और जीवन

वास्तविक होना स्वाभाविक और प्रशंसनीय है, परंतु जरूरत से अधिक वास्तविकता अक्सर अकेलेपन और असंतोष की जड़ बन जाती है। जीवन का सार केवल सच्चाई तक सीमित नहीं, बल्कि उसमें दया, सहानुभूति और समझदारी का भी समावेश होता है। जब मुझे नई सोच और नए विचारों की आवश्यकता होती है, तो मैं उन लोगों की खोज करता हूँ जो मेरी आलोचना करें, जो मेरी बातों पर उंगली उठाएँ। क्योंकि केवल आलोचना के द्वारा ही हम अपनी सीमाओं को पहचान…

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Added by PHOOL SINGH on July 1, 2025 at 3:00pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -मुझे दूसरी का पता नहीं ( गिरिराज भंडारी )

११२१२     ११२१२       ११२१२     ११२१२  

मुझे दूसरी का पता नहीं 

***********************

तुझे है पता तो बता मुझे, मैं ये जान लूँ तो बुरा नहीं

मेरी ज़िन्दगी यही एक है, मुझे दूसरी का पता नहीं

 

मुझे है यकीं कि वो आयेगा, तो मैं रोशनी में नहाऊंगा

कहो आफताब से जा के ये, कि यक़ीन से मैं हटा नहीं

 

कहे इंतिकाम उसे मार…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 26, 2025 at 8:30pm — 8 Comments

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