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September 2016 Blog Posts

ग़ज़ल ( अंजाम तक न पहुंचे )

ग़ज़ल ( अंजाम तक न पहुंचे )

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मफऊल-फ़ाइलातुन -मफऊल-फ़ाइलातुन

आग़ाज़े इश्क़ कर के अंजाम तक न पहुंचे ।

कूचे में सिर्फ पहुंचे हम बाम तक न पहुंचे ।

फ़ेहरिस्त आशिक़ों की देखी उन्होंने लेकिन

हैरत है वह हमारे ही नाम तक न पहुंचे ।

उसको ही यह ज़माना भूला हुआ कहेगा

जो सुब्ह निकले लेकिन घर शाम तक न पहुंचे ।

बद किस्मती हमारी देखो ज़माने वालो

बाज़ी भी जीत कर हम इनआम तक न…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 1, 2016 at 10:17pm — 12 Comments

गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल- इश्क़ की राहों में

2122 2122 212



इश्क़ की राहों में हैं रुसवाईयाँ।

हैं खड़ी हर मोड़ पर तन्हाईयाँ।।

क्या करे तन्हा बशर फिर धूप में।

साथ उसके गर न हो परछाइयाँ।।

ऐ खवातीनों सुनों मेरा कहा।

क्यूँ जलाती हो दिखा अँगड़ाइयाँ।।

चाहता हूं डूबना आगोश में।

ऐ समंदर तू दिखा गहराइयाँ।।

दिल दिवाने का दुखा, किसको ख़बर ?

रात भर बजती रही शहनाइयाँ।।

तुम गये तो जिंदगी तारीक है।

हो गयी दुश्मन सी अब रानाइयाँ।।

दूर…

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Added by डॉ पवन मिश्र on September 1, 2016 at 9:54pm — 6 Comments

रिश्तों के सीनों में ......

रिश्तों के सीनों में ......

कितनी सीलन है

रिश्तों की इन क़बाओं में

सिसकियाँ

अपने दर्द के साथ

बेनूर बियाबाँ में

कहकहों के लिबासों में

रक़्स करती हैं

न जाने

कितने समझौतों के पैबंदों से

सांसें अपने तन को सजाये

जीने की

नाकाम कोशिश करती हैं

ये कैसी लहद है

जहां रिश्ते

ज़िस्म के साथ

ज़मीदोज़ होकर भी

धुंआ धुंआ होती ज़िन्दगी के साथ

अपने ज़िन्दा होने का

अहसास…

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Added by Sushil Sarna on September 1, 2016 at 9:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल: शूलियों पर चढ़ चुकी सम्वेदनायें

212 22 12 22122



शूलियों पर चढ़ चुकी सम्वेदनायें ।

बाप के कन्धों पे बेटे छटपटाएं ।।



लाश अपनों की उठाये फिर रहा है ।

दे रही सरकार कैसी यातनाएं ।।



है यही किस्मत में बस विषपान कर लें ।

दर्द की गहराइयां कैसे छुपाएँ ।।



सिर्फ खामोशी का हक अदने को हासिल ।

डूबती हैं रोज मानव चेतनाएं ।।



हम गरीबों का खुदा कोई कहाँ है ।

मुफलिसी पर हुक्मरां भी मुस्कुराएं।।



वो करेंगे जुर्म का अब फैसला क्या ।

जो नचाते सैफई में…

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Added by Naveen Mani Tripathi on September 1, 2016 at 9:30pm — 6 Comments

एक नज़्म: सूनापन

सूनापन



एक ख़ला है, ख़ामोशी है,

जिधर देखो उदासी है,

समय सिफ़र हो गया,

आंसू निडर हो गए,

घेरे हैं लोग,पर कोई साथ नहीं,

सर पर किसी का हाथ नहीं,

शाम खाली गिलास सा,

टेबल पर औंधे मुंह पड़ा है,

मन में चिंता दीमक की तरह,

मन को खाये जा रही  है,

दिल की गली ऐसी सूनी है,

मानो दंगे के बाद कर्फ़्यू लगा हो,

शरीर सूखे पेड़ की तरह खड़ा तो है पर,

पीसा के मीनार सा, झुक सा गया है,

कब तक और कहाँ तक

इस सूनेपन, इस अकेलेपन का

बोझ…

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Added by आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' on September 1, 2016 at 6:30pm — 8 Comments

स्वर्गीय माँ की स्मृति में(ताटंक छंद)-रामबली गुप्ता

जीवनदात्री माता जब भी, याद तुम्हारी आती है।

हरि-सम निर्मल छवि माँ! तेरी मानस-पट पर छाती है।।

याद सदा आती हैं मइया! प्यार भरी तेरी बातें।

गाकर लोरी मुझे सुलाया, जागी तू कितनी रातें।।1।।



दूध-भात के कौर मधुर वो, मुझे न विस्मृत हो पाते।

जब आँचल में सो कर तेरे, हम सपनों में खो जाते।।

धूल-धूसरित तन ले जब आ बैठ गोद में जाता था।

हर भय से हर संशय से माँ! सहज-सुरक्षा पाता था।।2।।



बनी प्रथम गुरु-गुरुकुल तुम ही, नित नव बात बताती थी।

छोटों को दूं… Continue

Added by रामबली गुप्ता on September 1, 2016 at 5:30pm — 7 Comments

गीत,दिग्पाल छ्न्द-सतविन्द्र

गीत



मापनी :2212 122 2212 122

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मुझको सता रही हैं,यादें सभी तुम्हारी

दिलकश अदा तुम्हारी,मोहक हँसी तुम्हारी



चुपचाप पास आना,आकर मुझे सताना

वो पास बैठ जाना, हर बात को बताना

कब भूल पा रहा हूँ,वो दिल्लगी तुम्हारी

दिलकश.....





मैं भूलता जहां को,नजदीक तुम अगर थे

इस प्रेम की डगर पर,ऐ जान हमसफ़र थे

महसूस कर रहा हूँ,हर साँस भी तुम्हारी

दिलकश.....



नज़रें करें शरारत,अच्छी मुझे लगी थी

जब देख… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 1, 2016 at 5:01pm — 6 Comments

ग़ज़ल : मेरी ग़ज़लों का मंज़र

मेरी ग़ज़लों का मंज़र खुरदुरा है,
शज़र उम्म्मीद का लेकिन हरा है।

बढ़ाओ हाथ हम आज़ाद होंगे,
कलम भी जोश से देखो भरा है।

हमारे शेर में हैं अर्थ कितने,
बज़ाहिर दिख रहा जो इकहरा है।

चटानो को नहीं छूना कि मौसम,
हिदायत दे गया सब भुरभुरा है।

ग़ज़ल पढ़ना सुनाना ठीक है पर,
अगर गाने लगे तो सुर बुरा है।

निरुत्तर कर दिया मुझको ख़ुशी ने,
ग़मो को देख कर मुझ पर मरा है।


मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Ravi Shukla on September 1, 2016 at 12:21pm — 9 Comments


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'बेवकूफ औरत' (लघु कथा 'राज ')

  

मई जून का महीना आग बरसाता हुआ सूरज ऊपर से सामर्थ्य से ज्यादा भरी हुई खचाखच बस, पसीने से बेहाल लोग रास्ता भी ऐसा कहीं छाया या हवा का नाम निशान  नहीं बस भी मानों रेंगती हुई चल रही हो| एक को गोदी में एक को बगल में बिठाए बच्चों को लेकर रेवती सवारियों के बीच में भिंची हुई बैठी थी| मुन्नी ने पानी माँगा तो रेवती ने बैग से गिलास निकाल कर पैरों के पास रक्खे हुए केंपर से बर्फ मिला ठंडा ठंडा पानी दोनों बच्चों को पिला दिया |पानी देखकर न जाने कितने अपने होंठों को जीभ से गीला करने…

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Added by rajesh kumari on September 1, 2016 at 12:17pm — 14 Comments

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