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Khursheed khairadi's Blog – January 2015 Archive (9)

ग़ज़ल--१२२२--१२२२--१२२२........डराओ मत

१२२२—१२२२—१२२२

उमंगों के चरागों को बुझाओ मत

उजाले को अँधेरों से डराओ मत

 

न फेंको तुम इधर कंकर तगाफ़ुल का            तगाफ़ुल= उपेक्षा

परिंदे हसरतों के यूं उड़ाओ मत

 

उठाकर एड़ियाँ ऊँचे दिखो लेकिन

तुम इस कोशिश में कद मेरा घटाओ मत

 

चले आओ हर इक धड़कन दुआ देगी

सताओ मत सताओ मत सताओ मत

 

सजाओ आइने दीवार में लेकिन

हक़ीक़त से निगाहें तुम चुराओ मत

 

बजाओ तालियाँ पोशाक पर उनकी

मगर उर्यां…

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Added by khursheed khairadi on January 27, 2015 at 10:38am — 26 Comments

ग़ज़ल १२२२--१२२ \ १२२२--१२२ ..तो सो गये हम

थकन से चूर होकर , गिरे तो सो गये हम

जो चलते चलते गाफ़िल , हुये तो सो गये हम

 

हमारी भूख का क्या , हमारी प्यास का क्या

ये अहसासात दिल में , जगे तो सो गये हम

 

शनासा भी न कोई , तो अपना भी न कोई

अकेले थे अकेले , रहे तो सो गये हम

 

हमारी नींद सपने , सजाती ही नहीं है

हक़ीक़त से जहाँ की , डरे तो सो गये हम

 

मनाओ शुक्र तुम हो , गमों से दूर साथी

हमें तुम मुस्कुराते , मिले तो सो गये हम

 

हमारा दर्द…

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Added by khursheed khairadi on January 26, 2015 at 2:00pm — 22 Comments

ग़ज़ल -८-८-८ दुनिया

दादीसा के भजनों जैसी मीठी दुनिया 

पहले जैसी कहाँ रही अब अच्छी दुनिया 

प्यार मुहब्बत , भाईचारे  ,मानवता की

नहीं समझती बातें सीधी सादी ,दुनिया

दिन सी उजली रातें भी हो  जाये यारों

अँधियारे में रहे भला क्यूं आधी दुनिया

घर से ऑफिस ऑफिस से घर  फिर कुछ ग़ज़लें  

सिमट गई है इतने में ही मेरी दुनिया 

नटखट बच्चे घर की खटपट मेरी बाँहें 

कितनी छोटी सी है यारों उसकी दुनिया 

शहरों में है झूठे दर्पण…

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Added by khursheed khairadi on January 14, 2015 at 1:26pm — 13 Comments

ग़ज़ल --2122-212-2122-212

आप मेरे पाँव के आबलों को देखिये

फिर मेरी तै की हुई दूरियों को देखिये

 

गोद में वादी लिए हो कोई खरगोश ज्यूं

घाटियों में आप इन बादलों को देखिये

 

रो रहा है फूटकर आसमां किस बात पर

आँसुओं की है झड़ी बारिशों को देखिये

 

दुश्मनों की चाल से बाख़बर हरदम रहे

दोस्तों की भी ज़रा साज़िशों को देखिये

 

रहजनों से रास्ता पूछते हैं बारहा

मंज़िलों से बेख़बर रहबरों को देखिये

 

आपके सर पर चलो एक छत है तो…

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Added by khursheed khairadi on January 13, 2015 at 9:30am — 18 Comments

ग़ज़ल --२१२२--२१२२--२१२ समझा चलो

२१२२--२१२२--२१२

आपके किरदार को समझा चलो

नाग की फुफकार को समझा चलो

 

हार कर संसार से हर दौड़ में

वक़्त की रफ़्तार को समझा चलो

 

मोल कुछ पाया नहीं अख़्लाक़ का

ख़ुद ग़रज़ बाज़ार को समझा चलो

 

कहता है कोई शिफ़ा मेरी नहीं

वो मेरे आज़ार को समझा चलो

 

सर गँवा कर भी बचा ली आबरू

क़ीमती दस्तार को समझा चलो

 

दोस्त था लेकिन अदू से जा मिला

मैं भी इक अय्यार को समझा चलो

 

ख़ामोशी…

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Added by khursheed khairadi on January 11, 2015 at 7:47pm — 15 Comments

ग़ज़ल --१२२२--१२२२--१२२२--१२२२

१२२२-१२२२-१२२२-१२२२

अना के ज़ोर से कमज़ोर रिश्ते टूट जाते हैं

ज़रा सी बाहमी टक्कर से शीशे टूट जाते हैं

 

गले मिलकर बनाते हैं यही मज़बूत इक रस्सी

गर आपस में उलझ जायें तो धागे टूट जाते हैं

 

बहारों में शजर की डालियों पर झूमते हैं जो

ख़ज़ाँ के एक झोंके से वो पत्ते टूट जाते हैं

 

किसी दर पर झुकाना सिर नहीं मंजूर हमको भी

करें क्या पेट की खिदमत में काँधें टूट जाते हैं

 

तू चढ़कर पीठ पर आँधी की इतराता है क्यूं…

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Added by khursheed khairadi on January 9, 2015 at 10:59am — 20 Comments

कुछ नये काफ़िये --- ग़ज़ल धार समय की --३

किस सागर में जान मिलेगी धार समय की

कौन पकड़ पाया जग में रफ़्तार समय की

तेरी यादों की बूबास घुलेगी ज्यूं ज्यूं

बढ़ती जाएगी त्यूं त्यूं महकार समय की

वक़्त कहाँ मिलता है दुनियावी पचड़ों से

मेरी ग़ज़लें सारी है बेकार समय की

वक़्त सिकंदर विश्व-विजेता सदियों से है

सुल्तानी लाफ़ानी है सरदार समय की

चंदा-सूरज गगन-पवन सब मौन खड़े हैं

आयु कौन बतलायेगा सुकुमार समय की

बैर भूलकर मीत बनें  सब  एक…

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Added by khursheed khairadi on January 2, 2015 at 2:43pm — 18 Comments

ग़ज़ल- भाग २ धार समय की 8 + 8 + 8 (रोला मात्रिक)

किस सागर में  जान मिलेगी  धार  समय की 

कौन पकड़ पाया जग में रफ़्तार समय की 

युगों युगों तक फैला है कुहसार  वसन  का                       कुहसार =पर्वतांचल 

कौन अज़ल से  बाँध रहा  दस्तार  समय की                    दस्तार = पगड़ी 

नोक कलम की  पर रखते हैं  काल तीन हम 

केवल हमने  स्वीकारी  ललकार  समय की 

ख़ार दर्द के  चुनकर गीत  उगायेंगे  हम 

कर जायेंगे  वादी  हम गुलज़ार  समय की 

तू  ऊषा की लाली   मैं संध्या  का…

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Added by khursheed khairadi on January 2, 2015 at 1:28am — 11 Comments

ग़ज़ल- 8 + 8 + 8 (रोला मात्रिक)

ग़ज़ल-  8 + 8 + 8   (रोला मात्रिक)

किस सागर में  जान मिलेगी  धार समय की 

कौन पकड़ पाया जग में रफ़्तार समय की 

मोल समय का  उससे जाकर  पूछो माधो 

नासमझी में  जिसने झेली  मार समय की 

जीवन नैया  पार हुई बस  उस केवट से 

कसकर थामी  जिसने  भी पतवार  समय की 

आलस छोड़ो  साहस धारो  कर्म करो तुम 

उठ जाओ अब सुनकर तुम फटकार समय की 

कद्र तुम्हारी  ये संसार करेगा उस दिन 

कद्र करोगे  जिस दिन बरखुर्दार…

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Added by khursheed khairadi on January 1, 2015 at 3:30pm — 19 Comments

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