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Umesh katara's Blog – February 2015 Archive (7)

उलझी हुयी प्रेमकहानी

मैं एक कवि हूँ 

मुझे प्रेम है 

पहाडों से 

नदी से

सागर में उठती हुयी लहरों से

गिरते हुये झरनों से

सुन्दर सुन्दर फूलों 

की महक से

मीठी मीठी 

पंछियों की चहक से

मैं एक कवि हूँ 

मुझे प्रेम है 

बंजड हुये उस पेड से

जिसने कभी छाया दी थी 

फल दिये 

मुझे प्रेम है

उन तेज नुकीले काँटे से

जिसने खुद को सुखाकर 

फूल को खिलाया 

मुझे जितना सुख से प्रेम है 

उतना ही प्रेम दुख से है

तुम कहती हो 

मैं…

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Added by umesh katara on February 27, 2015 at 7:30am — 18 Comments

माँ हो क्या

एक स्त्री हो तुम

पत्नि नाम है तुम्हारा 

लेकिन कभी कभी 

खुद से अधिक

मेरी चिन्ता में डूब जाती हो

तुम्हारा इतना चिन्तित होना

मेरे अन्तर्मन में भ्रम पैदा करता है

कि तुम मेरी अर्धांगिनी होकर

माँ जैसा व्यवहार करती हो

कैसा बिचित्र संयोजन हो तुम

ईश्वर का 



जीवन के उस समय में 

जब कोई नहीं था सहारे के लिये 

दूर दूर तक

तब एक भाई की तरह 

मेरे साथ खडे होकर 

भाई बन गयी थीं तुम

उस दिन मुझे आश्चर्य हुआ था 

कि स्त्री होकर भी…

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Added by umesh katara on February 26, 2015 at 10:16am — 17 Comments

मिलते ही धूप का ठण्डा हो जाना

तुम्हारा मुझसे मिलना 

मिलते ही धूप का ठण्डा हो जाना

ये बडा ही अनौखा विज्ञान था मेरे लिये 

जिसे मैं आज तक नहीं समझा हूँ

.

काँटों से भरे रास्तों पर

तुम्हारे साथ साथ दूर तक चले जाना

तलवों में बने काँटों के निशान

एक असीम आनन्द देते थे

ये कैसा विज्ञान था पता नहीं 

.

क्या तुम्हें याद है 

जब साथ साथ की थी हमने नदी की सैर

छेद हुयी टूटी नौका में बैठकर

और लिया था डूबने का आनन्द

ये कैसे सम्भव हुआ था 

इस विज्ञान से भी…

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Added by umesh katara on February 24, 2015 at 6:00am — 10 Comments

घास उगने लगी है मेरी कब्र पर

212 212 212 212

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जिन्दगी थी बहुत ही सुहानी मेरी

मौज मस्ती कभी थी निशानी मेरी

------

एक ज़लसा हुआ था मेरे गाँव में

मिल गयी उसमें परियों की रानी मेरी

------

सिलसिला चल पडा फिर मुलाकात का

मुझको लगने लगी जिन्दगानी मेरी

------

बात अबकी नहीं है मेरे दोस्तो

ये कहानी बहुत ही पुरानी मेरी

------

एक साज़िश रची थी रक़ीबों ने फिर

और साज़िश में शामिल दिवानी मेरी

------

मैं तो मरने लगा…

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Added by umesh katara on February 22, 2015 at 10:30am — 16 Comments

अतुकांत कविता

क्या तुम्हें मालूम है

मुझे हरवक्त तुम्हें ,मेरे साथ होने का

अहसास रहता है

कि कहीं दूर से ही तुम मुझे कोई सहारा दे रही हो

मगर अबकी बार तुमसे मिलकर

मेरा वह अहसासों भरा विश्वास टूटता नजर आया

क्या तुम खुदको मुझसे दूर ले जाना चाहती हो

या दूर ले जा चुकी हो

बहुत दूर

मुझे तुम्हारी हर राहे मुकाम पर

जरूरत होगी

उस वक्त एक सूनापन

मेरे चेतन को अवचेतन करेगा

मेरे सोचने की शक्ति क्षीण हो जायेगी

मेरा शरीर सुन्न होने लगेगा

मेरी…

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Added by umesh katara on February 14, 2015 at 7:30am — 12 Comments

गज़ल-मैं सीसा हूँ मुझे अफसोस क्या होगा बिखरने से

1222 1222 1222 1222

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ठसक तेरी मेरी गैरत के आपस में उलझने से

मुहब्बत लुट गयी अपनी दिलों में जह्र पलने से

..........

दगाबाजी से अच्छा तो अलग होना मुनासिब था

बफाओं के बिना क्या है सफर में साथ चलने से

...........

मेरा घर अपने हाथों से कभी मैंने जलाया था

नहीं लगता मुझे अब डर किसी का घर भी जलने से

----------

तू पत्थर है मुझे हरबार चकनाचूर करता है 

मैं सीसा हूँ मुझे अफसोस क्या होगा बिखरने…

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Added by umesh katara on February 12, 2015 at 10:48am — 16 Comments

तेरी बेव़फाई मेरी बेव़फाई

तेरी बेव़फाई मेरी बेव़फाई
कहानी समझ में अभी तक न आई
..........
मेरे इश्क़ में तू उधर ज़ल रहा है 
इधर मैंने ज़ल कर मुहब्बत निभाई
..........
बहाने बनाकर ज़ुदा हो गये हम
यूँ दोनों ने मिलके ही दुनिया हँसाई
..........
तुझे मैंने मारा क़भी खंजरों से 
क़भी सेज काँटों की तूने बिछाई
..........
जलाये जो तूने मेरे प्यार के ख़त
तो तस्वीर तेरी भी मैंने ज़लाई

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित



Added by umesh katara on February 8, 2015 at 9:05am — 22 Comments

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