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February 2020 Blog Posts (42)

कोई हो ही नहीं सकता (ग़ज़ल)

बह्र हज़ज मुसम्मन सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 1222

सियासत में शरीफ़ इन्साँ कोई हो ही नहीं सकता

सियासतदान सा शैताँ कोई हो ही नहीं सकता

जो नफ़रत की दुकानों में है शफ़क़त ढूँढता फिरता

उस इन्साँ से बड़ा नादाँ कोई हो ही नहीं सकता

निकाला जा रहा है जो जनाज़ा ये सदाक़त का

तबाही का सिवा सामाँ कोई हो ही नहीं सकता

बिरादर को बिरादर से रफ़ाक़त अब नहीं बाक़ी

ये नुक़साँ से बड़ा नुक़साँ कोई हो ही नहीं…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 29, 2020 at 10:30pm — 6 Comments

किसी को कुछ नहीं होता

किसी को कुछ नहीं होता

तोता पंखी किरणों में

घिर कर

गिर कर

फिर से उठ कर

जो दिवाकर से दृष्ष्टि मिलाई

तो पलक को स्थिती समझ नहीं आयी

ऐसा ही होता है प्राय

मन ही खोता है प्राय

बाकी किसी को कुछ नहीं होता

किसी को भी



प्रचंड की आँख में झांकना

कोई दृष्टता है क्या

केवल मन उठता है

प्रश्न प्रश्न उठाता है

लावे की लावे से

मुलाकात…

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Added by amita tiwari on February 29, 2020 at 1:30am — 2 Comments

दिल्ली जलती है जलने दे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

**

कब कहता हूँ आम आदमी मुझको अपने पैसे दे

हो सकता है तुझ से  कुछ  तो क़ुर्बानी में रिश्ते दे।१।

**

दिल्ली जलती है जलने दे मुझे सियासत करने दे

हर नेता का ये कहना  है  कुछ तो कुर्सी फलने दे।२।

**

ये  लाशों  के  ढेर  हमेशा  सीढ़ी  बन  कर  उभरे  हैं

इनको मत रो इन पर मुझको पद की खातिर चढ़ने दे।३।

**

खूब सुरक्षा मुझे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 28, 2020 at 8:30am — 13 Comments

माइल नहीं हुआ (ग़ज़ल)

मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

2 2 1 / 2 1 2 1 / 1 2 2 1 / 2 1 2

ये दिल इबादतों पे तो माइल नहीं हुआ

मुनकिर न था मगर कभी क़ाइल नहीं हुआ

इसको बचा बचा के यूँ कब तक रखेंगे आप

वो दिल ही क्या जो इश्क़ में घाइल नहीं हुआ

ग़ैरत थी कुछ अना थी किया ज़ब्त उम्र भर

मैं तिश्नगी में जाम का साइल नहीं हुआ

दर्जा अदब का ऊँचा है मज़हब से जान लो

शाइर कभी भी वज्ह-ए-मसाइल नहीं हुआ

क्या क्या…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 27, 2020 at 11:12pm — 6 Comments


मुख्य प्रबंधक
दो शब्द दृश्य (गणेश जी बाग़ी)

प्रथम दृश्य : शांति

===========

माँ ने लगाया

चांटा...

मैं सह गयी,

पापा ने लगाया

थप्पड़..

मैं सह गयी,

भाई ने मारा

घूंसा..

मैं सह गयी,

घर से बाहर छेड़ते थे

आवारा लड़के

मैं चुप रही,

पति पीटता रहा

दारू पीकर

मैं चुप रही,

सास ससुर

अपने बेटे की

करते रहे तरफ़दारी

उसकी गलतियों पर भी

मैं चुप रही,

मैं सदैव चुप रही

ताकि बनी रहे

घर मे…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 26, 2020 at 10:57pm — 3 Comments

मुझे आज तुमसे कुछ कहना है

प्रिय, मुझे आज तुमसे कुछ कहना है ...

जानता है उल्लसित मन, मानता है मन

तुम बहुत, बहुत प्यार करती हो मुझसे

गोधूली-संध्या समय तुम्हारा अक्सर चले आना, 

गलें में बाहें, गालों पर चुम्बन, अपनत्व जताना

झंकृत हो उठता है मधुरतम पुरस्कृत मन-प्राण

मैं बैठा सोचता, सपने में भी कोई इतना अपना

आत्म-मंदिर में अपरिसीम मधुर संगीत बना

निज का साक्षात प्रतिबिम्ब बन सकता है कैसे

पलता है मेरी आँखों में प्रिय, यह प्यार…

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Added by vijay nikore on February 26, 2020 at 6:30pm — 4 Comments

आख़िर नुक़सान हमारा है

है करता कौन समाज ध्वस्त?

किसने माहौल बिगाड़ा है?

किसकी काली करतूतों से

यह देश धधकता सारा है?



चिल्लाते जो जनतन्त्र-तन्त्र

"जन" को ही बढ़कर मारा है

बरगला "अशिक्षित" लोगों को

शिक्षा से किया किनारा है



है अकरणीय कर्मों के वश

अब शहर सुलगता सारा है

विद्यालय की पवित्र धरण

बनती जा रही अखाड़ा है



विद्वेष भरें अपनों में ही

जनता की दौलत नष्ट करें

लेते बापू का नाम मगर, 

हिंसा का बजे नगाड़ा है



वह नहीं…

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Added by Usha Awasthi on February 26, 2020 at 8:30am — 2 Comments

मेरे ज़रूरी काम / अतुकांत कविता / चंद्रेश कुमार छतलानी

जिस रास्ते जाना नहीं

हर राही से उस रास्ते के बारे में पूछता जाता हूँ।

मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता हूँ।

 

जिस घर का स्थापत्य पसंद नहीं

उस घर के दरवाज़े की घंटी बजाता हूँ।

मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता हूँ।

 

कभी जो मैं करता हूं वह बेहतरीन है

वही कोई और करे - मूर्ख है - कह देता हूँ।

मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता हूँ।

 

मुझे गर्व है अपने पर और अपने ही साथियों पर

कोई और हो उसे तो नीचा ही दिखाता…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on February 25, 2020 at 12:40pm — 2 Comments

जानता हूँ मैं (ग़ज़ल)

221 2121 1221 212

मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

.

तेरे फ़रेब-ओ-मक्र सभी जानता हूँ मैं

'शाहिद' हूँ ज़िन्दगी तुझे पहचानता हूँ मैं

काफ़िर न जानिए है ये कुछ अस्र-ए-बद-दुआ

शह्र-ए-बुतां की धूल जो अब छानता हूँ मैं

जी भर के ज़िन्दगी न जिया ख़ुद से है गिला

जीने की रोज़ सुब्ह यूँ तो ठानता हूँ मैं

इक़बाल-ए-जुर्म मेरा मुसव्विर भी तो करे

ख़ुद की तो ख़ामियाँ सभी गर्दानता हूँ…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 25, 2020 at 1:00am — 5 Comments

तरही ग़ज़ल

 शख्स उसको भी तो दीवाना समझ बैठे थे हम l

जो था अच्छा उस को बेचारा समझ बैठे थे हम l



अब न जीतेगा ज़माना भी हमेशा की तरह,

जिस तरह का था उसे वैसा समझ बैठे थे हम l



गीत गाया था बहारों पर सुनाया था कहाँ,

जब ख़िज़ाँ को भी अगर अपना समझ बैठे थे हम l



फूल ये बिखरा तो खुशबू सा शजर बनता मिला,

"इस ज़मीन ओ आसमां को क्या समझ बैठे थे हम l"



ये जहाँ बदला मगर ये जिंदगानी क्यूँ नहीं,

झूठ दुनिया जिस कहे सच्चा समझ बैठे थे हम…

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Added by मोहन बेगोवाल on February 25, 2020 at 12:00am — 1 Comment

जीवन्तता

जीवन्तता

माँ

कहाँ हो तुम ?

अभी भी थपकियों में तुम्हारी

मैं मुँह दुबका सकता हूँ क्या

तुम्हारा चेहरा सलवटों भरा

मन शाँत स्वच्छ निर्मल

पथरीले…

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Added by vijay nikore on February 24, 2020 at 5:30am — 4 Comments

तरही गजल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122 / 2122 / 2122 /  212

**

उनका वादा राम का  वादा  समझ बैठे थे हम

हर सियासतदान को सच्चा समझ बैठे थे हम।१।

**

कह रहे थे सब  यहाँ  जम्हूरियत है इसलिए

देश में हर फैसला अपना समझ बैठे थे हम।२।

**

गढ़ गये पुरखे हमारे  बीच  मजहब नाम की

क्यों उसी दीवार को रस्ता समझ बैठे थे हम।३।

**

आस्तीनों  में  छिपे  विषधर  लगे  फुफकारने

यूँ जिन्हें जाँ से अधिक प्यारा समझ बैठे थे हम।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 22, 2020 at 8:28am — 9 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : भीड़ (गणेश जी बाग़ी)

मारो रे स्साले को, जब हम लोगो का पर्व होता है तभी ये सूअर बिजली काट देता है, दूसरों के पर्व पर तो बिजली नही काटता !

संबंधित बिजली कर्मी जब तक कुछ कहता, तब तक भीड़ से कुछ उत्साहित युवा उस कर्मचारी को पीट चुके थे । बेचारा कर्मचारी गिड़गिड़ाते हुए बस इतना ही कह पाया...

"बड़े साहब के आदेश से बिजली कटी है ।"

"चलो रे....आज उ बड़े साहब को भी देख लेते हैं, बड़ा आया आदेश देने वाला"

भीड़ बड़े साहब के चेम्बर की तरफ बढ़ गयी ।

"क्यों जी, आज हम लोगो का पर्व का दिन है, जुलूस…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 21, 2020 at 2:00pm — 2 Comments

प्यार का प्रपात

प्यार का प्रपात

प्यार में समर्पण

समर्पण में प्यार

समर्पण ही प्यार

नाता शब्दों का शब्दों से मौन छायाओं में 

आँखों और बाहों का हो महत्व विशाल

बह जाए उस उच्च समर्पण में पल भर…

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Added by vijay nikore on February 21, 2020 at 3:30am — 4 Comments

"मै" इक  समंदर में तब्दील हो जाता हूँ

एक 
--------
रात 
होते ही 
"मै" इक  समंदर में तब्दील हो जाता हूँ 
और मेरे सीने के
ठीक ऊपर 
इक चाँद उग आता…
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Added by MUKESH SRIVASTAVA on February 20, 2020 at 5:30pm — 1 Comment

झूठी बातें कह कर दिनभर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



झूठी बातें कह कर दिनभर जब झूठे इठलाते हैं

हम सच के झण्डावरदारी क्यों इतना शर्माते हैं।१।

***

अफवाहों के जंगल यारो सभ्य नगर तक फैल गये

क्या होगा अब विश्वासों  का  सोच सभी घबराते हैं।२।

***

कैसे सूरज चाँद सितारे  अब तक चुनते आये हम

बात उजाले की कर के  जो  नित्य  अँधेरा लाते हैं।३।

***

नित्य हादसे  होते  हैं  या  उन में  साजिश होती है

छोटा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2020 at 11:00am — 8 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

2122   2122   2122   22

जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल 'अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको' जिसे जगजीत सिंह साहब ने गाया है उसी ग़ज़ल को गुनगुनाते हुए ये ग़ज़ल हुई है बहर थोड़ी परिवर्तित हुई है

तमाम दोस्तों को सादर समर्पित

स्वीकारें

कुछ हसीं फूलों से जीवन को सजा ले अब तो,

खुद को गुमनामी के पतझड़ से बचा ले अब तो.

मेरे जख्मों पे बड़ी तेरी इनायत होगी,

संग हाथों में कोई तू भी उठा ले अब तो.

अपनी गुल्लक को दिखा माँ को…

Continue

Added by मनोज अहसास on February 16, 2020 at 10:00pm — 4 Comments

ये कैसी बहार है (ग़ज़ल)

मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

2 2 1 / 2 1 2 1 / 1 2 2 1 / 2 1 2

फूलों के सीने चाक हैं बुलबुल फ़रार है

सब दाग़ जल उठे हैं ये कैसी बहार है

कैसी बहार शहर में क्या मौसम-ए-ख़िज़ाँ

कारें इमारतें हैं दिलों में ग़ुबार है

कुछ बस नहीं बशर का क़ज़ा पर हयात पर

लेकिन ग़ुरूर ये है कि ख़ुद-इख़्तियार है

हाकिम है ख़ूब ख़्वाब-फ़रोशों पे मेहरबां

भाता नहीं उसे जो हक़ीक़त-निगार है

क्या ख़ूब है…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on February 16, 2020 at 7:41pm — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : मैं भी लिखूंगा एक कविता (गणेश बाग़ी)

अतुकांत कविता : मैं भी लिखूंगा एक कविता

मैं भी लिखूंगा

एक कविता

चार पांच सालों बाद..

जब मेरे हाथों द्वारा लगाया हुआ

पलास का पौधा

बन जायेगा पेड़

उसपर लगेंगे

बसंती फूल

आयेंगी रंग बिरंगी तितलियाँ

चिड़िया बनायेंगी घोंसला...

मैं भी लिखूंगा

एक कविता

चार पांच सालों बाद..

जब मेरे घर आयेगी

नन्ही सी गुड़िया

जायेगी स्कूल

मेरी उँगली पकड़

और पढ़ेगी

क ल आ म .. कलम

गायेगी…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 15, 2020 at 11:30pm — 3 Comments

जायदाद के हकदार

अम्मा का जाना

जैसे पर्दों का हट जाना

एक- एक कर सारे के सारे तार- तार हो गए

जिगर के सब टुकड़े जायदाद के हकदार हो गए


छोटे छोटे पुर्जे तक बांटे गए

सारे कागज़ पत्र तक छांटे गए

जिगर के टुकड़े थे वो सारी जायदाद के हकदार हो गए
 
कुछ…
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Added by amita tiwari on February 15, 2020 at 7:30pm — 5 Comments

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