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Somesh kumar's Blog – March 2018 Archive (11)

रातरानी और भौरा(कहानी )

 “ रात महके तेरे तस्सवुर में

 दीद हो जाए तो फिर सहर महके “

“अमित अब बंद भी करो !बोर नहीं होते |कितनी बार सुनोगे वही गजल |” सुनिधि ने चिढ़ते हुए कहा

प्रतिक्रिया में अमित ने ईयरफोन लगाया और आँखें बंद कर लीं |

कुछ देर बाद सुनिधि ने करवट बदली और अपना हाथ अमित की छाती पर रख दिया |पर अमित अपने ही अहसासों में खोया रहा और उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी |

“ऐसा लगता है तुम मुझे प्यार नहीं करते |” सुनिधि ने हाथ हटाते हुए कहा पर अमित अभी भी अपने ख्यालों में खोया…

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Added by somesh kumar on March 30, 2018 at 12:00am — 2 Comments

इश्क ने हाल पूछा

रात भर महकती रही यादें

लुत्फ़ आया बहुत जुदाई का

विरह से उठा रोग दबा हुआ

पता लेता हूँ अब दवाई का |

 

सिक्के जेब को काटने लगे

खर्च ने हाल पूछा कमाई का

नमक-मिर्च से मुँह जलाकर

पूछा भाव फिर से मिठाई का |

 

हर रात सिराहन से शिकायतें

ढिंढोरा कब तलक ढिठाई का

हथेलियाँ-हथेलियों के लिए तड़पी

इश्क ने हाल पूछा रुसवाई का  |

 

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अमुद्रित )

 

 

Added by somesh kumar on March 25, 2018 at 2:30pm — No Comments

शुतरमुर्ग(लघुकथा )

तीसरे माले पर वो करवट बदलते हैं तो खटिया चर्र-चर्र बोलती है |अंगोछा उठाकर पहले पसीना पोंछते है फिर उस से हवा करने लगते हैं |

“साsला पंखा भी ---“ बड़बड़ा कर बैठ जाते हैं और एक साँस में बोतल का शेष पानी गटक जाते हैं

“अब क्या ? अभी तो पूरी रात है |”

भिनभिनाते मच्छर को तड़ाक से मसल देते हैं |

दूसरे माले का टी.वी. सुनाई देता है – “तू मेरा मैं तेरी जाने सारा हिंदुस्तान |”

“बुढ़िया को क्या पड़ी थी पहले जाने की ---“

गला फिर सूखने लगा तो जोर–जोर से खाँसना…

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Added by somesh kumar on March 20, 2018 at 8:00pm — 9 Comments

घुटनें एवं छड़ी(कहानी )

रामदीन |” अख़बार एक तरफ रखते हुए और चाय का घूंट भरते  हुए पासवान बाबू ने आवाज़ लगाई

“जी बाबू जी |”

“मन बहुत भारी हो रहा है |दीपावली गुजरे भी छह महीने हो गए | सोचता हूँ दोनों बेटे बहुओं से मिल लिया जाए|---- ज़िन्दगी का क्या भरोसा !”

“ऐसा क्यों कहते हैं बाबूजी !हम तो रोज़ रामजी से यही प्रार्थना करते हैं की बाबूजी को लंबा और सुखी जीवन दे |”

“ये दुआ नहीं मुसीबत है |बुढ़ापा ---अकेलापन----तेरे माई जिंदा थी तब अलग बात थी पर अब ---“ वो गहरी साँस भरते हुए कहते हैं

“हम क्या…

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Added by somesh kumar on March 18, 2018 at 11:00pm — 8 Comments

दोनों हाथ (नए ढंग से पुनःप्रस्तुति का प्रयास )

आदित्य और नियति(शादी के पहले छह महीने )

खाना लगा दूँ ?” घर लौटे आदित्य से नियति ने पूछा

“दोस्तों के साथ बाहर खा लिया |”

“बता तो देते |” नियति ने मुँह गिराते हुए कहा

“कई बार तो कह चुका हूँ कि जब दोस्तों के साथ बाहर जाता हूँ तो खाने पर इंतजार मत किया करो |”आदित्य ने तेज़ आवाज़ में कहा

नियति की आँखों में आँसू आ गए आदित्य

“अच्छा बाबा सॉरी !अब प्लीज़ ये इमोशनल ड्रामा बंद करो |” आदित्य ने कान पकड़ते हुए कहा और नियति अपने आँसू पोछने लगी

रात को…

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Added by somesh kumar on March 17, 2018 at 11:25am — 4 Comments

आखिरी मुलाकात(कविता )

आखिरी मुलाकात

आखिरी लम्हा

आखिरी मुलाकात का

अथाह प्यास

जमी हुई आवाज़

उबलते अहसास

और दोनों चुप्प !

आतूूर सूरज

पर्दा गिराने को

मंशा थी खेल

और बढ़ाने को

आखिरी दियासलाई

अँधेरा था घुप्प !

सुन्न थे पाँव

कानफोड़ू ताने

दुधिया उदासी पे

लांछन मुस्काने

आ गया सामने

 जो रहा छुप्प |

वक्त रुका नहीं

आँसू ढहे नहीं

पत्थर बहा…

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Added by somesh kumar on March 14, 2018 at 10:33pm — 6 Comments

खुशियों का बँटवारा(लघुकथा )

खुशियों का बँटवारा

“पापा,बड़े कमरे में चलों “ मनीष ने मैच देख रहे अजीत गुप्ता का हाथ खींचते हुए कहा

“अरे चल रहा हूँ मेरे लाडले,इतनी उतावली क्या है !”

और कमरे में प्रवेश करते ही- सरप्राइज !

“क्यों पापा कैसी लगी डेकोरेशन !” मझली बेटी आनंदी ने पूछा

“एक्सीलेंट!”

“अभी एक और सरप्राइज है “ मिसीज अजीत ने चॉकलेट केक आगे बढ़ाते हुए कहा

“यार ! तुम भी बच्चों के साथ बच्ची बन रही हो |क्या यह उम्र है बर्थडे मनाने की ---केक काटने…

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Added by somesh kumar on March 12, 2018 at 11:23pm — 3 Comments

अहमियत

अहमियत

“सुनते हो !” रीमा ने सहमते हुए मोबाईल पर गेम खेल रहे प्रकाश को धीरे से छूकर कहा 

“क्या यार ! तुम्हारे चक्कर में मेरा खिलाड़ी मारा गया -----बोलों क्या आफ़त आ गई |” प्रकाश ने झल्लाते हुए कहा

“मौसीं का फ़ोन आया था------नानी सीढ़ियों से गिर गईं हैं |” रीमा ने सहमते हुए कहा

“वेरी बैड ----ज़्यादा चोट तो नहीं आई ---“ प्रकाश ने बिना उसकी तरफ़ देखे गेम में लगे हुए ही कहा

“नहीं !” रीमा चुपचाप बगल में बैठ गई 

"सबकी बैंड बजा रखी है मैंने ---मुझसे अच्छा…

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Added by somesh kumar on March 11, 2018 at 9:18am — 5 Comments

प्रवासी पीड़ा(कविता )

प्रवासी पीड़ा

शहर पराया गाँव भी छूटा

चाँदी के चंद टुकड़ों ने

हमको लूटा-हमको लूटा-हमको लूटा |

भूख खड़ी थी जब चौखट पे

कदम हमारे निकल पड़े थे

मिल गई रोटी शहर में आकर

पर अपनों का अपनेपन का

हो गया टोटा-हो गया टोटा-हो गया टोटा |

माल कमाया सबने देखा

रात जगे को किसने देखा

मेहमां-गाँव से ना उनको रोका

एक कमरे की ना मुश्किल समझी

दिल का हमको 

कह दिया छोटा-कह दिया छोटा-कह दिया छोटा…

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Added by somesh kumar on March 8, 2018 at 6:07pm — 2 Comments

आदमी एवं नदी (कविता )

आदमी और नदी

पहाड़ों से निकलतीं थीं झूम-झूम कर

खो जाती थीं एक-दुसरे में घूम-घूम कर

विशद् धारा बन जाती थी

 एक नदी कहलाती थी

समुंदर में जाकर प्रेम करती सुरूप

हो जाती एकरूप |

आदमी भी कुछ ऐसा था

स्वीकारता दुसरे को

चाहे दूसरा जैसा था

आदमी होना प्रथम था

बाद में ज़मीन-पैसा था |

आदमी का मेल-मिलाप /सभ्यता रचता था

इसी तरह एक राज्य/एक देश बसता था |

बाद में नदी को जरूरत के…

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Added by somesh kumar on March 7, 2018 at 8:00pm — 3 Comments

खोया बच्चा(कविता )

खोया बच्चा

 

हिन्दू घर से खोया बच्चा

माँ मम्मी कह रोया बच्चा

गुरूद्वारे का लंगर छक कर

मस्जिद में जा सोया बच्चा |

 

गली मोहल्ला ढूंढ रहा था

उसकों घर घर थाने थाने

दीवारें सब  हाँफ  रहीं थीं 

नींव लगी थी उन्हें बचाने |

 

खुली नींद फिर वो भागा

एक पग में दस डग नापा

थक हार देखी एक बस्ती

निकली चर्च से हँसती अंटी |

 

“तुम शायद घर भूल गया है !

चलों तुम्हें घर से…

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Added by somesh kumar on March 4, 2018 at 2:00pm — 4 Comments

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