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रविकर's Blog – June 2013 Archive (8)

होवे हृदयाघात यदि, नाड़ी में अवरोध-

होवे हृदयाघात यदि, नाड़ी में अवरोध ।

पर नदियाँ बाँधी गईं, बिना यथोचित शोध ।

बिना यथोचित शोध, इड़ा पिंगला सुषुम्ना ।

रहे त्रिसोता बाँध, होय क्यों जीवन गुम ना ।

अंधाधुंध विकास, खड़ी प्रायश्चित रोवे ।

भौतिक सुख की ललक, तबाही निश्चित होवे ।।

त्रिसोता = गंगा जी

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on June 29, 2013 at 10:50am — 9 Comments

नेता रह मत भूल में, मत-रहमत अनमोल

मत की कीमत मत लगा, जब विपदा आसन्न ।

आहत राहत चाहते, दे मुट्ठी भर अन्न ॥

आहत राहत-नीति से, रह रह रहा कराह |

अधिकारी सत्ता-तहत, रिश्वत रहे उगाह ॥

घोर-विपत आसन्न है, सकल देश है सन्न ।

सहमत क्यूँ नेता नहीं, सारा क्षेत्र विपन्न ॥

नेता रह मत भूल में, मत-रहमत अनमोल |

ले जहमत मतलब बिना, मत शामत से तोल ॥

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on June 28, 2013 at 4:44pm — 8 Comments

धारिणि धारि महाकलिका कर धारण खप्पर मारत यूँ

सवैया -

(1)

बाँध बनावत हैं सरकार वहाँ पर मूर्ति हटावत त्यूँ |

गान्धि सरोवर हिंसक हो मलबा-जल ढेर बहावत क्यूँ |

शंकर नेत्र खुला तिसरा करते धरती पर तांडव ज्यूँ |

धारिणि धारि महाकलिका कर धारण खप्पर मारत यूँ |

(2)

सवैया -

नष्ट हुवा घर-ग्राम कुटी जब क्रोध करे दल बादल देवा |



कष्ट बढ़ा गतिमान नदी करती कलिका किलकार कलेवा |



दूर रहे सरकार जहाँ बस खाय रही कुरसी-कर-मेवा |



हिम्मत से तब फौज…

Continue

Added by रविकर on June 28, 2013 at 9:30am — 4 Comments

कैसे होंय प्रसन्न, सन्न हैं भक्त भगीरथ-

रथ-वाहन हन हन बहे, बहे वेग से देह । 

सड़क मार्ग अवरुद्ध कुल, बरसी घातक मेह । 

बरसी घातक मेह, अवतरण गंगा फिर से । 

कंकड़ मलबा संग, हिले नहिं शिव मंदिर से । 

 करें नहीं विषपान, देखते मरता तीरथ ।

कैसे होंय प्रसन्न, सन्न हैं भक्त भगीरथ ॥

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on June 26, 2013 at 3:58pm — 6 Comments

शिव गंगा का रार, झेल के जग यह रोता-

रुष्ट-त्रिसोता त्रास दी, खोले नेत्र त्रिनेत्र |
बदी सदी से कर गए, सोता पर्वत क्षेत्र |


सोता पर्वत क्षेत्र, बहाना कुचल डालना |
मरघट बनते घाट, शांत पर महाकाल ना |


शिव गंगा का रार, झेल के जग यह रोता |
नहीं किसी की खैर, त्रिलोचन रुष्ट त्रिसोता ||

त्रिसोता= गंगा जी

मौलिक/ अप्रकाशित

Added by रविकर on June 26, 2013 at 12:00pm — 6 Comments

ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई

खानापूरी हो चुकी, गई रसद की खेप ।

खेप गए नेता सकल, बेशर्मी भी झेंप ।

बेशर्मी भी झेंप, उचक्कों की बन आई ।

ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई ।…

Continue

Added by रविकर on June 25, 2013 at 3:30pm — 13 Comments

जेठ को दोषी पाया-

तपत तलैया तल तरल, तक सुर ताल मलाल ।

ताल-मेल बिन तमतमा, ताल ठोकता ताल ।

ताल ठोकता ताल, तनिक पड़-ताल कराया ।

अश्रु तली तक सूख, जेठ को दोषी पाया ।…

Continue

Added by रविकर on June 24, 2013 at 9:30am — 6 Comments

ओ बी ओ आभार

छपती नहिं कविता कभी, करे ताक कवि-ताक

कविता-संग्रह पर ग्रहण, अवसर-ग्रहण तपाक ।…

Continue

Added by रविकर on June 6, 2013 at 8:30am — 8 Comments

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