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रविकर's Blog – July 2013 Archive (6)

पर परिवर्तन नहीं सुहाए -

नकारात्मक ग्रोथ से, होवे बेडा गर्क । 

सकल घरेलू मस्तियाँ, इन्हें पड़े नहिं फर्क-

आम जिंदगी नर्क बनाए  । 

पर परिवर्तन नहीं सुहाए ॥ 

रोटी थाली की छिने, चाहे रोजी जाय । 

छद्म धर्म निरपेक्षता, मौला-ना मन भाय -

फिर भी फिर सरकार बनाये । 

पर परिवर्तन नहीं सुहाए ॥ 

पाक बांग्लादेश से, दुश्मन की घुसपैठ । 

सीमा में घुस चाइना, रहा रोज ही ऐंठ -

अन्दर वह सीमा सरकाए । 

पर परिवर्तन नहीं सुहाए ॥   

चला…

Continue

Added by रविकर on July 14, 2013 at 8:00pm — 4 Comments

बोध गया / प्रेस कांफ्रेंस

हम ले दे के चार मन, दिग्गी मम्मी पूत ।

हमले रो के रोक लें, पर कैसे यमदूत ।

पर कैसे यमदूत, नस्ल कुत्ते की इनकी ।

मार काट का पाठ, पढ़े ये कातिल सनकी ।

मन्दिर मस्जिद हाट, पहुँच जाते हैं बम ले ।

पुलिस जोहती बाट,  भाग जाते कर हमले ॥

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on July 11, 2013 at 11:01am — 12 Comments

पाये अध्यादेश से, भोजन जन गन देश -

पाये अध्यादेश से, भोजन जन गन देश |
चारो पाये तंत्र के, दिये हमें पर क्लेश |


दिये हमें पर क्लेश, दिये टिमटिमा रहे हैं |
हुआ तैल्य नि:शेष, काल ने प्राण गहे हैं |


है आश्वासन झूठ, मूठ हल की जब आये |
पाये हल हर हाल, जियें मानव चौपाये ||

मौलिक/अप्रकाशित

Added by रविकर on July 5, 2013 at 9:01pm — 4 Comments

बिपदा बढ़ती बहु-गुणा, बा-शिंदे बेहाल -

 बिपदा बढ़ती बहु-गुणा, बा-शिंदे बेहाल |
बस-बेबस बहते बहे, बज-बंशी भूपाल |  
बज बंशी भूपाल, बहर बंदिशें सुरीली |
मनमोहन मदमस्त, मगन मीरा शर्मीली |
चले अचल छल-चाल, भयंकर नदी बिगडती  |   
चारो तरफ बवाल, हमारी बिपदा बढ़ती ||  

मौलिक / अप्रकाशित
 

Added by रविकर on July 4, 2013 at 11:00pm — 7 Comments

धिक्कारो ऐसा नेता-

हो जाती कुदरत खफा, देती मिटा वजूद ।

उलथ उत्तराखंड ज्यों, होय नेस्तनाबूद ।।

क्या मूरख मानव चेता ।।

विस्फोटों से तोड़ते, ऊंचे खड़े पहाड़ ।

हाड़ कुचलते शैलखंड, अपना मौका ताड़ ।।

ऐसे ही बदला लेता ।।

सरिता-झरना का करे, मनुज मार्ग अवरुद्ध ।

कुछ वर्षों में ही मगर, कर दे वर्षा शुद्ध ।।

जीव-जंतु घर बार समेता ॥

विजय होय बहु-गुणों से, किन्तु चेतना सून।

मार जाय लाखों मनुज, ज्यों तेरह का जून ॥

धिक्कारो ऐसा…

Continue

Added by रविकर on July 2, 2013 at 11:11am — 11 Comments

विपत-प्रबंधन ढील, बहे घर-ग्राम-कबीला-

थोथी-थूल दलील दे, भाँजे लापरवाह |
लीला लाखों जिंदगी, कातिल है नरनाह |
कातिल है नरनाह, दिखाए दुर्गति-लीला |
विपत-प्रबंधन ढील, बहे घर-ग्राम-कबीला |
धरे हाथ पर हाथ, मजे में बाँचे पोथी |
छी छी सत्ता स्वार्थ, थुड़ी थू थोथा-थोथी ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on July 1, 2013 at 7:33pm — 12 Comments

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