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Ram shiromani pathak's Blog – August 2014 Archive (10)

क्षणिकाएँ

वो मेरा कुछ नहीं लगता

और मैं कोई महान व्यक्ति भी नहीं

फिर भी बार बार वो

मेरे पैर पकड़ रहा था  

पता है क्यों ?

मैंने सिर्फ दो रोटी दी उसे

**************************

बहुत दुश्मन है उसके

गलती ?

बहुत अच्छा आदमी है वो

*******************************

सिसकियाँ मत लो ग़म-गीं हवाओ

चुप हो जाओ

पता है क्यों?

वो आ रहीं है

*********************************

लोग कहते है उनकी आँखों में

प्यार का समंदर है

फिर भी मैं क्यों ?

प्यासा…

Continue

Added by ram shiromani pathak on August 24, 2014 at 6:00pm — 14 Comments

खुद का भी अहसास लिखो

खुद का भी अहसास लिखो!
एक मुकम्मल प्यास लिखो!!

उससे इतनी दूरी क्यों !
उसको खुद के पास लिखो !!

खाली गर बैठे हो तुम!
खुद का ही इतिहास लिखो !!

 गलती उसकी बतलाना !
खुद का भी उपहास लिखो!!

हे ईश्वर ऊब गया हूँ!
मेरा भी अवकाश लिखो!!
***************************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित
 

Added by ram shiromani pathak on August 24, 2014 at 1:11am — 28 Comments

मैंने चुप की आवाज़ सुनी !

मैंने चुप की आवाज़ सुनी !
जबसे गूँगे से बात करी !!

वर्षों तक देखा है उनको !
तब जाके ये तस्वीर बनी!!

चोर-चोर मौसेरे भाई!
उनकी आपस में खूब छनी!!

कोई कैसे घायल ना हो!
वो थी ही मृग सावक नयनी !!

बीवी साड़ी माँग रही थी!
मेरी तो तनख़्वाह कटनी!!
**************************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on August 17, 2014 at 11:25am — 8 Comments

अपना फ़र्ज़ निभाने दे!

अपना फ़र्ज़ निभाने दे!
फिर से वही बहाने दे !!

तेरा भी हो जाऊँगा !
खुद का तो हो जाने दे !!

गैरों के घर खूब रहा!
अपने घर भी आनें दे !!

मूर्ख दोस्त से अच्छा है !
दुश्मन मगर सयाने दे!!

कागज़ की फिर नाव बनें !
बचपन वही पुराने दे !!
*****************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on August 17, 2014 at 11:00am — 15 Comments

ग़ज़ल (ख़्वाबों पे उसका पहरा है)

ख़्वाबों पे उसका पहरा है!

यादों का सागर गहरा है !!

चीखें वो फिर सुनाता कैसे!

मुझको तो लगता बहरा है !!

आईने में भी देखा कर !

क्या ये तेरा ही चेहरा है !!

बातें उसनें कर दी ऐसी !

दिल में सन्नाटा ठहरा है !!

कतरा -कतरा जीता हूँ मैं!

मेरे अन्दर भी सहरा है !!

*************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक/अप्रकाशित 

Added by ram shiromani pathak on August 12, 2014 at 1:00pm — 7 Comments

इक दिन अपना नाम बताकर !

इक दिन अपना नाम बताकर !
हँसती है वो आँख चुराकर!!

पत्थर का है शहर जानलो!
घर से निकलना सर बचाकर !!

तेरी गर मासूका ना हो !
खुद को ही खत रोज़ लिखाकर!!

मुझको खुद से दूर कर दिया!
इतना अपने पास बुलाकर !!

इक दिन वो सुन लेगा तेरी !
बस तू जाके रोज़ कहाकर!!
********************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on August 12, 2014 at 12:30am — 4 Comments

"इक ऐसा भी घर बनवाना"

इक ऐसा भी घर बनवाना!
जिसमे रह ले एक ज़माना !!

खुद से खुद की बातें करना !
जब खुद के ही हिस्से आना !!

वो मरा है तू भी मरेगा !
लगा रहेगा आना जाना !!

कुछ ऐसा भी कर ले पगले !
जो बन जाए एक फ़साना !!

खुद से ही भागेगा कब तक !!
खुद से चलता नहीं बहाना !!

भूल गया हो गर वो मुझको !
उसको मेरी याद दिलाना !!
***************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on August 11, 2014 at 11:21am — 8 Comments

"मैं अपने ही साथ रहूँगा"

मैं अपने ही साथ रहूँगा!
खुद में तुझसे बात करूँगा!!

अब चाहे  जिससे मिलना हो!
दर्पण अपने साथ रखूँगा!!

मेरे कद को ढाँक सके जो !
ऐसी चादर साथ रखूँगा!!

उनको हँसकर मिलने तो दो!
मैं भी दिल की बात करूँगा!!

बातें बहुत ज़बानी कर लीं!
मैं भी खत इक बार लिखूँगा!!
*****************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on August 11, 2014 at 11:00am — 12 Comments

क्षणिकाएँ

१-ये कैसा दर्पण

जिसमे सबकुछ

मुझसा ही दिखता है



२-मेरी मर्ज़ी

उनके लम्हे भर का क़र्ज़

जीवन भर लौटाऊँ  



३-वो सबकी नज़रों में था

लेकिन खुद को ही नहीं देख पाया



४- पहले मुझे ज़िंदा करो

फिर मरने की बात करना



५-उन्हें हँसी तो आयी

 बहाना

मेरा रोना ही सही



६-देखते है

ज़िंदा रहने की धुन में

खुद को कितनी बार मारता है वो



७-मैं

मैख़ाने का रास्ता भूल जाऊँ

इसलिए आज

वो आँखों से पिला रही…

Continue

Added by ram shiromani pathak on August 8, 2014 at 3:16pm — 4 Comments

घनाक्षरी (राम शिरोमणि पाठक"दीपक")

वीर हैं सपूत सारे, भारती के नैन-तारे!
युद्धभूमि में सदैव झंडा गाड़ देते हैं!!

प्रचंड तेज भाल पे,चाहे हो द्व्ंद्व काल से!
भारती के शत्रुओं का,सीना फाड़ देतेहै!!

विश्व धाक मानता है,वीरता को देख देख !
बड़े बड़ों को भी सदा,ये पछाड़ देते है!!

वज़्र के समान देह,नैनों में प्रचंड आग!!
काँप जाता शत्रु जब ,ये दहाड़ देते है!

***************************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on August 8, 2014 at 1:30pm — 13 Comments

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