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Arpana Sharma's Blog – October 2016 Archive (7)

अर्पणा शर्मा -"दीपोत्सव" कविता

मंगलमय हो दीपोत्सव यह शुभ-शुचित,

झिलमिलाये अमावस यह कार्तिक,

नेह-पुष्प तोरण हर द्वार सुसज्जित

सुंदर अल्पनायें आँगन-देहरी रचित,

विकारजन्य स्वदोषों से मुक्ति समाहित,

अंतस के भावों में हो यह कामना सन्निहित,

बैर, अहिंसा, अशांति ना हो किंचित,

ऐसी ज्योति करें सर्वत्र प्रज्वलित,

जनकल्याण सुख-सौभाग्य दीप प्रकाशित,

दीपज्योति वीर-बलिदान समर्पित,

सानंद न्यौछावर हुए जो देश के हित,

तम का क्षय हो, सर्वजन हों आनंदित,

नवचेतना, जागृति हो सर्वत्र… Continue

Added by Arpana Sharma on October 29, 2016 at 6:48pm — 6 Comments

अर्पणा शर्मा : "गोलगप्पा"/हास्य कविता

रसना लपलपाये देख गोलगप्पा,

चलो हो जाये कुछ धौल धप्पा,

धनिया, पुदिना, कैरी की चटनी,

और जोरदार इमली का खट्टा,

है मिलाया इसमें गुड़ का मीठा,

हींग और जीरे का लगाया है तड़का,

हरदिल अजीज, लाजवाब शै है

ये गोलगप्पा ,

भरे बाजार,लिये दोना सबरे खड़े,

ना होता कोई हक्का-बक्का,

मुँह में घुलाया, फिर जीभ से,

दिया अंदर धक्का,

गले में यह जा अटका,

साँस आधी ऊपर आधी नीचे,

बड़ी मुश्किल से गटका,

पर तब भी मन न माना,

जल्दी से एक और… Continue

Added by Arpana Sharma on October 26, 2016 at 5:02pm — 8 Comments

अर्पणा शर्मा: कविता - "अक्षर"

अक्षर-अक्षर माला जुड़ी,

मिली मानुष मन को वाणी,

अक्षर की रचना बनी,

विश्व में प्रगतिवाहिनी,

लिखें या बोलें , संप्रेषण में,

अक्षर का ना कोई सानी,

दर्द, दर्प, दुख, प्रेम-विरह,

शंका, उल्लास या सनसनी,

अक्षरों में निहित भावों से,

हर मन की थाह जानी,

अक्षर हैं संवदिया,

महत्ता इनकी जिसने गुनी,

वश में कर ली दुनिया उसने,

बोल सच्ची-मधुर वाणी,

अक्षर-अक्षर में छिपी,

सभ्यता के उत्थान की कहानी,

रच लो सृजन का अमर संसार,

बन कर… Continue

Added by Arpana Sharma on October 25, 2016 at 3:59pm — 4 Comments

कविता :"विजयादशमी " - अर्पणा शर्मा, भोपाल

हम सब कठपुतलें हैं,

करते परंपरागत दहन,

रावण के पुतलों का,

मनाते पर्व विजय का,

पर छुपे हुए रावण,

हर जगह फैलें हैं,

ऊपर से उल्लासित हम,

भीतर से त्रस्त और खोखले हैं,

आतंक,दुराचार,विभीषिकाओं के,

भीषण दौर इस विश्व में,

सभी धर्मों, सभ्यताओं,

और समाजों ने झेले हैं,

छुपी हुई दुराचारी,

अहंकारी मनोवृत्ति के,

आतंक और भ्रष्टाचार के,

युद्ध और विनाश के,

अशिक्षा और दरिद्रता के,

इन रावणों का दहन करने,

हे राम…

Continue

Added by Arpana Sharma on October 11, 2016 at 10:30am — 15 Comments

लघुकविता - "मेहरबानी" - अर्पणा शर्मा

" चूँकि,
मुश्किल थी,
देखभाल,
अंततः वह,
छोड़ ही आया,
वृद्धाश्रम में
माँ को,
वर्षों पहले,
इसी कारण से,
वह ले आई थी,
अनाथाश्रम से,
एक नन्हा बालक,
अपने घर को....!!"

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Arpana Sharma on October 7, 2016 at 3:20pm — 6 Comments

लघुकथा- फर्क (अर्पणा शर्मा)

 "अरे , मकान का काम देखने मम्मी जी , पापाजी को भेज दें।", राखी कुनमुनाई, "बेकार ही घर में बैठे हैं" वो सोचने लगी, " हम तो खाना निपटा कर फिर थोड़ी देर वहाँ काम देख आएँगे", सास-ससुर के जाते ही उसने आजादी की साँस ली और जल्दी से मायके फोन लगाया । वैसे तो सुबह उठकर सबसे पहले अपने पिताजी से बात करके ही उसका दिन शुरू होता है पर फिर भी पूछना था कि उन्होंने ठीक से खाना खाया कि नहीं । तभी नन्ही पलक ठुमकती आई-"मम्मी सू आरही है", "अरे भई, अपन से नहीं होता ये सब, बच्चों की सू-सू, पाॅटी", राखी ने…

Continue

Added by Arpana Sharma on October 5, 2016 at 11:00pm — 4 Comments

कविता - "उत्कर्ष"/अर्पणा शर्मा

“उत्कर्ष“

एक टिमटिमाते, बुझते तारे का उत्कर्ष,

देख लोग, होते चमत्कृत,

लेकिन वे बूझने में असमर्थ,

उसका नैपथ्य में छिपा,

गहन, सतत संघर्ष,

रुपहली चमक के पीछे छिपे,

कालिमा के सुदीर्घ, लंबे वर्ष,

फिर भी आशाओं से परिपूर्ण,

बाधाएँ, चुनौतियाँ पार कर,

उत्साहित, प्रसन्नचित्त, प्रकाशमान सहर्ष,

प्रोत्साहन देता अनूठा, गांभीर्य शब्द संघर्ष,

छिपा गूढ इसमें तात्पर्य,

ड़टे रहो कर्तव्यपथ पर “ संग + हर्ष",

अब दूर कहीं मुसकुराता है,…

Continue

Added by Arpana Sharma on October 4, 2016 at 5:41pm — 6 Comments

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