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Featured Blog Posts – December 2012 Archive (12)


सदस्य टीम प्रबंधन
नव वर्ष मंगलमय हो.. .

चिड़िया थी उत्साह में, सम्मुख था आकाश

किन्तु स्वप्न धूसर हुए, तार-तार विश्वास !

तार-तार विश्वास,  मगर जीवन  चलता है.. .…

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Added by Saurabh Pandey on December 31, 2012 at 7:30pm — 28 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
प्रयाग में कुंभ (मत्तगयंद सवैया) // -सौरभ

बालक-वृंद सुनैं, यह भारत-भूमि सदा सुख-साध भरी है

पावन चार नदी तट हैं, इतिहास कहे छलकी ’गगरी’ है

नासिक औ हरिद्वार-उजैन क घाट प बूँद ’अमी’ बिखरी है

धाम प्रयाग विशेष सदा जहँ धर्म-सुकर्म ध्वजा फहरी है



पुण्यधरा तपभूमि महान जो बारह साल प कुंभ सजावैं

तीनहुँ…

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Added by Saurabh Pandey on December 26, 2012 at 12:30am — 48 Comments

मुझको "तुम्हारी" ज़रूरत है!

मुझको "तुम्हारी" ज़रूरत है!





दूर रह कर भी तुम सोच में मेरी इतनी पास रही,

छलक-छलक आई याद तुम्हारी हर पल हर घड़ी।

पर अब अनुभवों के अस्पष्ट सत्यों की पहचान

विश्लेषण करने को बाधित करती अविरत मुझको,

"पास" हो कर भी तुम व्यथा से मेरी अनजान हो कैसे

या, ख़्यालों के खतरनाक ज्वालामुखी पथ पर

कब किस चक्कर, किस चौराहे, किस मोड़ पर

पथ-भ्रष्ट-सा, दिशाहीन हो कर बिखर गया मैं

और तुम भी कहाँ, क्यूँ और कैसे झर गई…

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Added by vijay nikore on December 19, 2012 at 12:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल - शहर की रोशनी में गाँव की ढिबरी बुलाती है !

यहाँ की भागा दौड़ी में वो बेफ़िक्री ही  भाती  है ,
शहर की रोशनी में गाँव की ढिबरी बुलाती है ।



बनावट वाली राधाओं को उनके कृष्ण कब मिलते ,
वो तो मीरा के होते हैं जो उनको मन में गाती है ।


सिमटना दायरों में और बातें चाँद से करना ,
ये करता हूँ जो माँ मुझको तुम्हारी  याद आती है ।


पिता की डांट से गुमसुम जो बैठी थी उदासी में ,
लिपटकर माँ के आँचल से वो बच्ची खिलखिलाती है…
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Added by Abhinav Arun on December 19, 2012 at 9:48am — 28 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
नवगीत - चाहना // -- सौरभ

छू दो तुम.. . / फिर

सुनो अनश्वर ! 



थिर निश्चल

निरुपाय शिथिल सी

बिना कर्मचारी की मिल सी

गति-आवृति से

अभिसिंचित कर

कोलाहल भर

हलचल हल्की.. .

अँकुरा दो

प्रति विन्दु देह का   

लिये तरंगें

अधर पटल पर.. . !



विन्दु-विन्दु जड़, विन्दु-विन्दु हिम

रिसूँ अबाधित 

आशा अप्रतिम.. .

झल्लाये-से चौराहे पर

किन्तु चाहना की गति …

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Added by Saurabh Pandey on December 17, 2012 at 6:00pm — 29 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हिम सौंदर्य

अनुपम अद्दभुत कलाकृति है या द्रष्टि का छलावरण

जिसे देख विस्मयाभिभूत हैं द्रग और अंतःकरण

त्रण-त्रण चैतन्य औ चित्ताकर्षक रंगों का ज़खीरा

पहना सतरंगी वसन शिखर को कहाँ छुपा चितेरा

शीर्ष पर बरसते हैं रजत,कभी स्वर्णिम रुपहले कण

जिसे देख विस्मयाभिभूत हैं आँखें और अंतःकरण…

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Added by rajesh kumari on December 16, 2012 at 10:30pm — 11 Comments

चांदनी आज फिर विदा होगी.........

एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ ...... गुरुजनों से अनुरोध है कृपया मार्गदर्शन किजिए 



चांदनी आज फिर विदा होगी

रोशनी आज फिर फना होंगी



जब कभी रंग रोशनी होंगे

आपके हाथ में हिना होगी



दर्द दे आज फिर हमें मौला

दर्द की आज इन्तहा होगी



हो गया एक नज़्म का सौदा

शायरी देख कर खफा होगी



चूम लों आँख, सोख लों…

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Added by अमि तेष on December 16, 2012 at 1:30pm — 9 Comments

एक भिक्षुक की याचना .....

मुझे जानो समझो
पर इतना न झकझोरो
कि मैं नग्न हो जाऊं
अपमानित फिरू !

यह जो पाने, न पाने के दायरे है
तुम्ही कहो, इन्हें मैं कैसे तोडू ?
अगर मुझे पूर्ण न कर सको
तो न समझने का भान करो !
पर इतना भी न झकझोरो
कि मैं नग्न हो जाऊं
अपमानित फिरू !
अन्वेषा....
हम सब के ह्रदय में कही न कही एक भिक्षुक छुपा हुआ है !

Added by Anwesha Anjushree on December 16, 2012 at 9:00am — 10 Comments

चर्चा के विषय

ज्यादा क्या कोई फर्क नहीं मिलता

हुक्के की गुड़गुड़ाहटों की आवाज़ में

चाहे वो आ रही हों फटी एड़ियों वाले ऊंची धोती पहने मतदाता के आँगन से

या कि लाल-नीली बत्तियों के भीतर के कोट-सूट से...

नहीं समझ आता ये कोरस है या एकल गान

जब अलापते हैं एक ही आवाज़ पाषाण युग के कायदे क़ानून की पगड़ियां या टाई बांधे

हाथ में डिग्री पकड़े और लाठी वाले भी

किसी बरगद या पीपल के गोल चबूतरे पर विराजकर

तो कोई आवाजरोधी शीशों वाले ए सी केबिन में..

गरियाना तालिबान को,…

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Added by Dipak Mashal on December 15, 2012 at 11:30pm — 7 Comments

तुम्हें चुप रहना है

तुम्हें चुप रहना है

सीं के रखने हैं होंठ अपने

तालू से चिपकाए रखना है जीभ

लहराना नहीं है उसे

और तलवे बनाए रखना है मखमल के

इन तलवों के नीचे नहीं पहननी कोई पनहियाँ

और न चप्पल

ना ही जीभ के सिरे तक पहुँचने देनी है सूरज की रौशनी

सुन लो ओ हरिया! ओ होरी! ओ हल्कू!

या कलुआ, मुलुआ, लल्लू जो भी हो!

चुप रहना है तुम्हें

जब तक नहीं जान जाते तुम

कि इस गोल दुनिया के कई दूसरे कोनों में

नहीं है ज्यादा फर्क कलम-मगज़ और तन घिसने वालों को…

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Added by Dipak Mashal on December 14, 2012 at 3:03pm — 13 Comments

मैं यमुना ही बोल रही हूं

तेरे वादे कूट-पीस कर

अपने रग में घोल रही हूं

खबर सही है ठीक सुना है

मैं यमुना ही बोल रही हूं



पथ खोया पहचान भुलाई

बार-बार आवाज लगाई

महल गगन से ऊंचे चढ़कर

तुमने हरपल गाज गिराई



मेरे दर्द से तेरे ठहाके

जाने कब से तोल रही हूं

लिखना जनपथ रोज कहानी

मैं जख्‍मों को खोल रही हूं



ले लो सारे तीर्थ तुम्‍हारे

और फिरा दो मेरा पानी

या फिर बैठ मजे से लिखना

एक थी यमुना खूब था पानी



बड़े यत्‍न से तेरी…

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Added by राजेश 'मृदु' on December 6, 2012 at 2:00pm — 17 Comments

गीत संजीव 'सलिल'

गीत 

संजीव 'सलिल'

*

क्षितिज-स्लेट पर

लिखा हुआ क्या?...

*

रजनी की कालिमा परखकर,

ऊषा की लालिमा निरख कर,

तारों शशि रवि से बातें कर-

कहदो हासिल तुम्हें हुआ क्या?

क्षितिज-स्लेट पर

लिखा हुआ क्या?...

*

राजहंस, वक, सारस, तोते

क्या कह जाते?, कब चुप होते?

नहीं जोड़ते, विहँस छोड़ते-

लड़ने खोजें कभी खुआ क्या?

क्षितिज-स्लेट पर

लिखा हुआ क्या?...

*

मेघ जल-कलश खाली करता,

भरे किस तरह फ़िक्र न करता.…

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Added by sanjiv verma 'salil' on December 6, 2012 at 1:00pm — 16 Comments

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