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December 2011 Blog Posts (79)

बीत यह भी साल गया

बीत यह  भी साल गया 





जिंदगी की पुस्तक से पृष्ठ कुछ निकाल गया |

करके कंगाल हमे बीत यह भी साल गया ||





भूपेन्द्र हजारिका जगजीत हमे बहुत प्यारे थे |

देवानंद और शम्मी देश के दुलारे थे ||

उनको बड़ी क्रूरता से आज निगल काल गया |

करके कंगाल हमे बीत यह भी साल गया ||





भृष्टाचार ख़त्म हो यह मन में सव विचारे है |

एक अन्ना काफी था यह तो फिर हजारे है…

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Added by Mukesh Kumar Saxena on December 31, 2011 at 8:57pm — 9 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
फुलकी

(छंद - दुर्मिल सवैया)

जब मौसम कुंद हुआ अरु ठंड की पींग चढी, फहरे फुलकी

कटकाइ भरे दँत-पाँति कहै निमकी चटखार धरे फुलकी

तब जीभ बनी शहरी नलका, मुँह लार बहे, लहरे…

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Added by Saurabh Pandey on December 31, 2011 at 2:00pm — 58 Comments

नया साल

शुभकामनाएं लिए

आ गया

नया साल

क्या हुआ है

हसरतों का हाल

कुछ शिकवे हैं

तुमको हमसे

हमको तुमसे

कुछ सतह…
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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on December 31, 2011 at 1:12pm — 5 Comments

नये है रंग

नये है रंग

रुत है नयी तस्वीर बनाने की

नये साज़ नयी आवाज़ में

कुछ नयी धुन गुनगुनाने की

नयी सुबह है नये सूरज के जगमगाने की

खठी मीठी यादे पीछे छोड़ आने की

नयी उम्मीद नई आशाएं जगाने की

जो बीता उसे सम्मान से विदा करे

और नये बरस के स्वागत में दीप जलाने की

लौ से शोला और शोलो से लपटों में बदल जाने की

दिलो से दूरियाँ  मिटाने की

बस यही गीत गुनगुनाने की

:शशिप्रकाश सैनी

Added by shashiprakash saini on December 31, 2011 at 10:00am — No Comments

अपनी गलतियों का बोझ आप ही ढोता हूँ

अपनी गलतियों का भोझ आप ही  ढोता हूँ

गंगा खुद मैली है मै वहा पाप नही धोता हूँ


पाप धोने के लिए बहुत है  आंख के  आसू
रात रो अंतर्मन पश्चाताप से ही भिगोता…
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Added by shashiprakash saini on December 31, 2011 at 3:00am — No Comments

अंधेरा है कितना

रातो के हो गए है पुजारी

कि दिन की खबर नहीं है

पैसे की है ये दुनिया

मेरा ये शहर नहीं है

दिन में भी ये जलाते है बत्तियाँ इतना

ना जाने यहाँ अंधेरा है कितना

आदमी अपने साये पे भी शक करता है

हाथ हाथ मिलाने से डरता है



पैसो से हर चीज तोलने लगा हूँ

की मै भी पैसो की जुबा बोलने लगा हूँ

नीद बेचता हू बेचता हू सासे भी

बेचे है त्यौहार बेचीं है उदासी भी

हसी बेचीं है…

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Added by shashiprakash saini on December 30, 2011 at 8:00pm — 2 Comments

दुत्कार

एक रोटी का छोटा टुकड़ा जब दिल चाहा  तब डाल दिया . 
इस पर भी मैंने  खुश होकर वोह जब आया सत्कार किया .
मैं फिर भी नहीं समझ पाया की उसने क्यों दुत्कार दिया . 
उसके बच्चे मुझको प्यारे वे मोती हैं मैं धागा  हूँ .
मैं उनकी गेंद उठाने को दूर दूर तक भागा हूँ. 
वे मेरे संग दिन भर खेले मैंने भी उनको प्यार दिया .
मैं अब तक नहीं समझ  पाया कि  उसने क्यों दुत्कार दिया.
घर में मेरी कोई जगह नहीं इससे है मुझे इंकार…
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Added by Mukesh Kumar Saxena on December 30, 2011 at 5:33pm — No Comments

उनकी सुहबत में सुधरते चले गए ||

जैसे -जैसे दिन गुजरते चले गए |

वो मेरे दिल में उतरते चले गए ||

याद दिलाने की कोशिश की है मगर ,

वो इन वादों से मुकरते  चले गए |

औरों को  देते थे सलाह, मगर खुद ,…

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Added by Nazeel on December 30, 2011 at 1:56pm — 2 Comments

ये ख़ासियत रही उस मुलाक़ात की

ये ख़ासियत रही उस मुलाक़ात की

जुबा कुछ कह न सकी आँखों ने सब बात की

 

ये दुनिया है सब पैसे से चलते है

खबर लेता नहीं कोई बिगड़े हालात की

 

जो करते है लडकियों पे छीटा-कसी

न जाने किस घर के है उपज है किस ख़यालात की

 

हमसे रूठी है यु बात भी करती नहीं

नाराज़गी है न जाने किस रात की

 

किस गम में भीगी है छत की सीढ़ियां "सैनी"

किसके जज़्बात छलके किस आंख ने इतनी बरसात की

 

: शशिप्रकाश…

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Added by shashiprakash saini on December 30, 2011 at 11:00am — 1 Comment

तू वो ही है ना !

तू  वो  ही  है  ना !

जो  मेरे  लात  मारने  पर

सहज  ही  मुस्कुराती  थी

मेरी रग रग में भी तुरंत

गुदगुदी सी दौड़ जाती थी

ये बात तू जानती थी

मेरी हालत पहचानती थी .

और  मै



बस रहता था इंतज़ार में.

 

तेरे पेट से
बाहर निकालनें के



सोच विचार…

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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on December 29, 2011 at 5:11pm — No Comments

आस

ख़ुशी पहले भी बहुत थी,

क़सक थी हर साँस में,
प्रतीक्षा इस  नज़र में थी,
धड़कने थी हर रात में,
कोई आकर के गया,
टीस थी हर याद में,
जाकर आएगा कोई,
जिंदगी बीती इस आस में...
ख़ुशी पहले भी बहुत थी,
आज भी है हर याद में,
कोई जाकर आएगा,
आस थी हर साँस में,
आस है हर याद में....

Added by Yogyata Mishra on December 29, 2011 at 12:04pm — No Comments

बढ़ चल....

पल पल बढ़ चल 

बढ़ चल बढ़ चल....

 

पढ़ कर हर पल, 

चढ़ नभ थल जल. 

 

पल पल बढ़ चल.... 

 

कर कर कर छल 

तन कर मत चल  

मन मन मत जल 

तज मन छल खल  

पल पल बढ़ चल..... 

 

कर पर धन…

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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on December 29, 2011 at 11:37am — 1 Comment

मुखौटा हटाओ

भीड़ में सब मुखौटे है 

इंसा कहा है

जिसकी सूरत पे सीरत दिखे 

वो चेहरा कहा है



खिड़किया यु बंद करली है

की हम खोलते ही नहीं

दुनिया से करते है बात

पडोसियो से बोलते ही नहीं 

न बगल में खुशी न मातम का पता 

पर ये मालूम दुनिया में क्या घटा 





कमरे बंद रखने से सिर्फ सडन होगी

खिडकिया खोलोगे तो हवा…

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Added by shashiprakash saini on December 29, 2011 at 10:29am — No Comments

मै चलने के लिए बना था मै उड़ न सका

रुकना साँस लेना मेरी ज़रूरत थी
जब भी मै रुका
दुनिया ने कहदिया मै पीछें रह गया
मै चलने के लिए बना था
वो कहते रहे मै उड़ न सका
 
विचार बीज थे
मै मिट्टी था
दुनिया से अलग सोचता
मै मिट्टी था
बारिश की बूदों पड़े तो मै खुशबू
सूरज की रोशनी में जादू
की विचारों में जिंदगी भर दू
उपजाऊ था
पर था तो मै मिट्टी ही
कइयो ने…
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Added by shashiprakash saini on December 29, 2011 at 8:42am — 8 Comments

आत्मविस्मरण

आत्मविस्मरण

 

विद्युत सी तरंग ,

कम्पन का भूकंप ,

स्पर्श नहीं आग !

मन से तन तक जाग !

सांसों में उच्छ्वास,

एक एहसास ...

 

होश नहीं,

जान बही !

कम्पित होठों की प्यास,

एक एहसास ...

 

हाथों में नर्म बारूद,

बारूद मुख  में,

विस्फोट नस नस में !

बढ़ी प्यास,

एक एहसास ...

 

रिक्तता उभय ओर,     

पूर्णता पे जोर,

साँसों का…

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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on December 28, 2011 at 4:32pm — 2 Comments

कुछ हायकू

 

क्या लोकपाल?

अनिश्चय से भरा

शोर शराबा

 

लोक या पाल

लोकपाल का शोर

थम पाएगा?

 

मुश्किल भरा

लोकपाल का रास्ता

चुनावी रिश्ता

 

फिर चुनाव

फिर शुरु हो रहे

चुनावी शोर

Added by Neelam Upadhyaya on December 28, 2011 at 12:30pm — No Comments

एक ग़ज़ल....

कल रात कहीं कुछ रीत गया.
लम्हे टूटे, मैं बीत गया.

साँसें क्या हैं..? इक व्यर्थ गति,
जब साँसों का संगीत गया.

जीवन सपनों के नाम हुआ,
तज कर मुझको हर मीत गया.

अक्सर जीवन की चौसर पर,
सुख हार गया, दुःख जीत गया.

इक दर्द रहा जो क़ायम है,
'साबिर' बाक़ी सब बीत गया.


[14/04/2007]

Added by डॉ. नमन दत्त on December 28, 2011 at 8:30am — 3 Comments

पिटवा कर छोड़ा

पिटवा कर छोड़ा

प्रो. सरन घई

 

सामने मेरे घर के महल बना कर छोड़ा,

मेरे हिस्से का भी सूरज खा कर छोड़ा।

बहुत पुकारा मैनें मत छीनो मेरा हक,

मगर जालिमों ने मेरा हक खा कर छोड़ा।

 

सब को धूप, हवा सबको, सबही को पानी,

इसी आस को लिये मर गई बूढ़ी नानी,

फटे चीथड़ों में इक घर में देख जवानी,

फिरसे इक अबला को दाग लगाकर छोड़ा।

 

मचा गुंडई का डंका यों मेरे शहर में,

फ़र्क न बचा कज़ा या दोजख या कि क़हर…

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Added by Prof. Saran Ghai on December 27, 2011 at 10:05pm — 5 Comments

अंतिम क्षण (दीपक शर्मा कुल्लुवी)

अंतिम क्षण 


अंतिम क्षण मेरे जीवन के

कितने सुहाने होंगे
कोई न होगा साथ हमारे
हम तन्हा…
Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on December 27, 2011 at 11:30am — 3 Comments

कुछ हाइकू

 

 

ऐसा शहर

 ठिठुरती जिन्दगी

सड़कों पर

 

तार-तार है

नज़र अ़दाजी से

इंसानियत

 

जमती साँस

बच पाती अगर

आस किरण

 

एक कतरा

खुशहाली से भरा

उन्मुक्त हँसी

Added by Neelam Upadhyaya on December 27, 2011 at 10:48am — 3 Comments

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