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कुण्डलियाँ

राम करे गिर जाय सब, नेताऒं पर गाज !
सिसक रही आवाम अब,रुला रही है प्याज !!
रुला रही है प्याज, गगन चूमे यॆ मँहगाई,
सब्जी शक्कर दाल,और कैसॆ मिलॆ दवाई,
जिन्हे चुना संसद दिया, निकले नमक हराम!
तुम्ही बचाऒ देश अब, हॆ सीतापति राम!!

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 6, 2011 at 1:20am — No Comments

poor mango people

कई दिनों पहले अखबार में एक खबर आई - पोलीथिन पैक का उपयोग करने वालो के खिलाफ कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान ,

आम लोगो कि तरह मैंने भी पढ़ी ,आम लोग जो रोज सिर्फ इसलिए अखबार पढ़ते है कि उन्हें नियमो का भान हो सके मगर मानना न मानना हम mango people के हाथ में रहता है , खैर बात कुछ दिनों पहले कि है , बेटे को स्कूल से लाते समय रास्ते में सब्जी कि दुकान दिखाई दी , याद आया सब्जी नहीं है लेती चलू , 4-5 तरह कि सब्जियों तुलवाने के बाद लेजाने कि समस्या थी , सब्जी वाले से मेरी परेशानी देखी नहीं गयी ,तुरंत… Continue

Added by praveena joshi on January 5, 2011 at 9:01pm — 2 Comments

छिपी हुई दूरियां



अनजान चेहरों में ढूँढता वो चेहरा…

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Added by Devesh Mishra on January 5, 2011 at 8:08pm — No Comments

संकेत

उत्त्पत्ति से निष्पत्ति तक
जीवन के मूल्यों से बंधी
आशाएं ,
भावनाएं ,
वेदनाएं ,
संवेदनाएं .
जीवन के उन्ही आयामों के चरम बिंदु हैं
जो जीवन के होने का संकेत देती है

Added by Devesh Mishra on January 5, 2011 at 8:07pm — No Comments

सॉरी सर (कहानी ) अंक -१

सॉरी सर (कहानी )
लेखक - सतीश मापतपुरी
अंक - १
मनोविज्ञान का ज्ञाता होना अलग बात है,अपनी मनोदशा पर नियंत्रण पा लेना  बिल्कुल  अलग बात.शायद मन का भाव चेहरा पर लिख जाता है अन्यथा प्रो.सिन्हा से   प्रो.वर्मा. यह नहीं पूछ बैठते------"कुछ परेशान दिख रहे हैं
सिन्हा साहेब, क्या बात है?"
"नहीं तो,परेशानी जैसी कोई बात नहीं है." और एक मरियल सी मुस्कान प्रो.सिन्हा के सूखे होठों पर अलसाई
सी पसर गई.संभवत: आदमी ही सृष्टि…
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Added by satish mapatpuri on January 5, 2011 at 5:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल :- चार पैसा उसे हुआ क्या है

 

ग़ज़ल :- चार पैसा उसे हुआ क्या है

 

चार पैसा उसे हुआ क्या है

पूछता फिर रहा खुदा क्या है |

 

हर जगह तो यही करप्शन है

रोग बढ़ता गया दवा क्या है |

 

तुम ही रक्खो ये नारे वादे सब

पांच वर्षों का झुनझुना क्या है |

 

तेरे जाने पर अब ये…

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Added by Abhinav Arun on January 5, 2011 at 4:16pm — 12 Comments

रोना अपना-अपना

घर के आंगन के बीचो-बीच लाश पड़ी थी। सभी रो रहे थे। उसका भाई सोच रहा था ”क्या इसके बीबी-बच्चों का भार अब मुझे उठाना पड़ेगा?“ उसके मां बाप सोच रहे थे ”अब हमारा क्या होगा? हमारी देखभाल अब कौन करेगा?“ उसकी जवान बीवी सोच रही थी ”अब पहाड़ जैसा जीवन पति के बगैर अकेले कैसे काटूँगी?“ ..... और सभी ऊँची-ऊँची रो रहे थे।

Added by Ravi Prabhakar on January 4, 2011 at 8:30pm — 5 Comments

"आजादी"



बन्दी है आजादी अपनी, छल के कारागारों में।…
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Added by डॉ.रूपचन्द्र मयंक on January 4, 2011 at 3:49pm — No Comments

Ghazal

इक अंधेरा टिका  कब से मीनार पर

क्या कहें इस ज़माने के किरदार पर



हाथ का भी निवाला जो छीनेगा वो

स्वप्न सोने के रख देगा  बाज़ार पर



सब है डूबे तिजारत की घुड़दौड़ में

अब नज़र कौन डालेगा  बीमार पर



रहनुमाओं के सुख, भत्ते-वेतन सभी

गाज बन कर गिरेंगे ख़रीददार पर



जुगनुओं  के  सहारे  चली  ज़िंदगी

कोई  चंदा  न उतरा था  दीवार पर



बिकती हैं जो कलम इक पुरस्कार में

वो कसीदे लिखें  आज सरकार  पर



रात भर  अध्र्य  जिसको  चढ़ाते रहे

वो  लुटेरा… Continue

Added by satyendr sengar on January 4, 2011 at 2:55pm — No Comments

तॊ नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है,,,,,,,,,,,,

. नव वर्ष तुम्हारा…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 3, 2011 at 8:46pm — No Comments

श्रृँगार नहीं अंगार लिखूंगा...

कल मैंनॆ भी सोचा था कॊई, श्रृँगारिक गीत लिखूं ,

बावरी मीरा की प्रॆम-तपस्या, राधा की प्रीत लिखूं ,…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 3, 2011 at 8:30pm — 3 Comments

दायरे.. ©

 

दायरे.. ©



कुछ सवाल कुछ ज़वाबों के घेरे में , उलझा जीवनपथ..

सीमित दायरे , दरकता है जीवन उनमें पल-प्रतिपल..



दहकते दावानल, स्वप्नों का होता दोहन उनमें निरंतर..

पल-प्रतिपल , भसम् उठा ख्वाबों की भेंट चढा रहे हम..

चरणों में अर्पित करने लगे , सीमित दायरों भरा जीवन..

चरण उस पथिक के ,…

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Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on January 3, 2011 at 8:18pm — 1 Comment

ग़ज़ल

जो  ग़ल्तियाँ हुईं थीं  उसी का  सिला है ये
बारूद  घर में रखने का  फल ही मिला है ये
 
दुनियाँ से कह रहे थे  हम  फसाना शाँति का
बस ये नहीं बताया.. कि दिल भी छिला है ये

जब जिसका मन किया है हमसे खेल कर गया
मुझको  कोई बताये  कि   कैसा   किला है ये

अपनों की  साजिशों  से  मात  बारहा  मिली
द्वापर से  चलता आया.. ऐसा सिलसिला है ये

घर फूस का बनाया  उसमें आग भी रख ली
कुर्सी की ख्वाहिशों का  फूल ही  खिला है ये

Added by satyendr sengar on January 3, 2011 at 2:54pm — No Comments

मेरा वतन

मुझको   मेरा  वतन   पुर   अमन   चाहिए

तहज़ीब  अपनी   गंग   ओ  जमन  चाहिए



ये  राम  की  ज़मीन  है  गौतम  की ये ज़मीं

नानक  भी  मिलेगा  यहीं  रहमान  भी  यहीं

सब  आ  सकें  इतना  बड़ा  ज़हन  चाहिए



झगड़े   फ़साद   लूट   न  हो  मेरे देश में

या   रब  ग़रीबी  भूख  न  हो  मेरे देश में

मिल बांट  कर के  खाने  का चलन चाहिए



तुमने  बिछा  रखी  यहाँ  कितनी बड़ी चैiसर

मुहरे  बना  दिये  हमें  इस  तरहा  बाँट कर

टुकड़े   नहीं    समूचा   इक   गगन  चाहिए



क्यूं … Continue

Added by satyendr sengar on January 3, 2011 at 2:00pm — No Comments

लघुकथा ”घर“

31 दिसंबर की सर्द रात को अपने फटे कम्बल के सहारे सर्द हवाओं के साथ संघर्ष करते हुए फुटपाथ पर लेटे हुए एक वृद्ध भिखारी ने जब  कुछ नौजवानों को सड़क पर मस्ती करते हुए देखा तो उसने सोचा ”इनका तो घर है, फिर यह घर जाकर लिहाफ की गर्मी में आराम से क्यों नहीं सोते?“

Added by Ravi Prabhakar on January 2, 2011 at 4:35pm — 8 Comments

ग़ज़ल:- आकर्षक चमकीले लोग

 

ग़ज़ल:- आकर्षक चमकीले लोग

 

आकर्षक चमकीले लोग

केंचुल में ज़हरीले लोग |

 

आत्ममुग्धता की परिणति हैं

सुन्दर सुघड सजीले लोग |

 

भूख की आंच पे चढ़ते हैं नित

खाली पेट पतीले लोग |

 

झंझावाती जीवन सागर

हम शंकित रेतीले लोग |

 

चीर हरण करते आँखों से

कुंठाओं के टीले लोग…

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Added by Abhinav Arun on January 2, 2011 at 10:45am — 3 Comments

मिले सुर मेरा तुम्हारा...

 

 

नब्ज़ टटोलोगे तो कोई रोग पकड़ आएगा

 झूठ का रंग भी सच पर से उतर जाएगा

क्यों कहते हो माथे पे लगाया है चन्दन
लहू है ये ,एक दिन ,सबको पता…
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Added by Lata R.Ojha on January 2, 2011 at 12:00am — 1 Comment

यह वर्ष हम सभी को हर तरह रास आये

यह वर्ष हम सभी को हर तरह रास आये--घर घर में शांति हो हर बच्चा मुस्कुराये

कठिनाइयों में अब तक गुज़रा हो जिसका जीवन…
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Added by Hilal Badayuni on January 1, 2011 at 7:30pm — 9 Comments

सबसे पहले नमस्कार दो हजार दस साल को ,

सबसे पहले नमस्कार दो हजार दस साल को ,

हम नहीं भूल पाएंगे जो हुए हाल बेहाल को ,

फिर स्वागत करता हूँ  साल दो हजार ग्यारह ,

आशा नहीं विश्वास हैं रहेगा सबका पौं बारह ,

कसम से ख़ुशी का दिन हैं नया साल आया  ,

और इस ख़ुशी को दोस्तों ने दो गुण है बढाया ,

मुबारकवाद उन को जिनका जनम दिन हैं ,

बबिता जी भरत कुमार संग में बिजय जी ,

धनेश जी , ब्रजेश जी और गयासुदीन शेख ,

गोपाल जी इन्द्रजीत जी और नव सोही ,

प्रभाकर पाण्डेय ,रवि प्रभाकर के संग संजय जी… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on January 1, 2011 at 1:30pm — 3 Comments

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