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Santosh khirwadkar's Blog (35)

देख रिश्तों की ......संतोष

अरकान:-फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन

देख रिश्तों की ऐसी बनावट न कर
दोस्त है दुश्मनी की मिलावट न कर

झूट कहने में हर शख़्स माहिर हुआ
सच यहाँ बोलने की दिखावट न कर

ज़ख़्म दिल के हैं दिल में उन्हें दफ़्न रख
अपने चहरे पे उनकी सजावट न कर

टूट जायेंगे रिश्ते ज़रा देर में
कच्चे धागों से इनकी बुनावट न कर

भूक से थे ये बेताब सोए अभी
देख ये जाग जायेंगे आहट न कर
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on October 7, 2017 at 6:17pm — 8 Comments

अपने ग़म को मैं........संतोष

अरकान-फ़ाइलातून मफ़ाइलुन फेलुन

अपने ग़म को मैं छुपा लेता हूँ
सबकी ख़ुशियों का मज़ा लेता हूँ

दिल में जब याद का उठे तूफ़ां
तेरी तस्वीर बना लेता हूँ

सामने जब वो मेरे आता है
अपने सर को मैं झुका लेता हूँ

जब भी होता है वो ख़फ़ा मुझसे
प्यार से उसको मना लेता हूँ

दिल में जब टीस मेरे उठती है
अश्क मैं छुप के बहा लेता हूँ
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on September 27, 2017 at 8:00pm — 16 Comments

दिल ये कैसे बदल गया

अरकान:'फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ा'

दिल ये कैसे बदल गया
यादों से ही बहल गया

देखी जो तस्वीर तेरी
मेरा दिल फिर मचल गया

ज़ालिम हैं सब लोग यहाँ
दिल ये सुनकर दहल गया

डूबा था मैं यादों में
दिन तेज़ी से निकल गया

मेरा क़िस्सा सुनते ही
पत्थर का बुत पिघल गया

#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on September 12, 2017 at 4:30pm — 8 Comments

मिरा दिल ये कैसे ....संतोष

मिरा दिल ये कैसे बदल गया,
फिर तिरी यादों से बहल गया ।

मैंने देखी जो फिर तस्वीर तिरी,
मिरा दिल फिर से मचल गया ।

लोग ज़ालिम हैं सब कुछ जाने है,
क़िस्सा फिर दुनियाँ में उछल गया ।

तिरी यादों में खोया मैं इस क़दर,
सुबह का सूरज शाम में ढल गया ।

दास्ताँ मिरी जो इक बुत को सुनाई,
वो पत्थर भी मोम सा पिघल गया ।
#संतोष
{मौलिक एवं अप्रकाशित}

Added by santosh khirwadkar on September 8, 2017 at 10:30pm — 7 Comments

है शिकायत दिल को ऐसा क्यूँ नहीं.....{.ग़ज़ल } संतोष

 अरकान : फ़ाइलातून   फ़ाइलातून  फ़ाइलुन  

है शिकायत दिल को ऐसा क्यूँ नहीं

जब तू मेरा है तो लगता क्यूँ नहीं



जब नज़र से मिल नहीं पाती नज़र

ख़्वाब से बाहर निकलता क्यूँ नहीं



लग रही है क्यूँ थमी दुनिया मुझे

तू भी मौसम सा बदलता क्यूँ नहीं



है ज़बाँ चुप और धड़कन तेज़ है

तू इशारों को समझता क्यूँ नहीं



जिस्म ठण्डा पड़ गया'संतोष'…

Continue

Added by santosh khirwadkar on September 7, 2017 at 6:58pm — 14 Comments

जब तू मिरा है .....,संतोष

जब तू मिरा है तो अपना लगता क्यूँ नहीं

दिल के आइने में साफ़ दिखता क्यूँ नहीं



अब नज़रें मिलती ही नहीं तिरी नज़रों से,

हसीन ख़्वाबों से फिर निकलता क्यूँ नहीं



दुनियाँ मुझे अब क्यूँ थमी सी लगती है

तू भी मौसम सा कुछ बदलता क्यूँ नहीं



ज़बां चुप और धड़कन भी तेज़ है ज़रा

तू नज़रों के इशारे समझता क्यूँ नहीं



ये जिस्म सर्द है बर्फ़ के मानिन्द'संतोष'

तू रगों में गर्म लहू सा दौड़ता क्यूँ नहीं



#संतोष खिरवड़कर

(मौलिक एवं… Continue

Added by santosh khirwadkar on September 5, 2017 at 5:30pm — 6 Comments

आज तू जो मुझे बदला सा नज़र आता है..............संतोष.

अरकान हैं 'फ़ाइलातून फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

आज तू जो मुझे बदला सा नज़र आता है
दोस्ती में तिरी धोका सा नज़र आता है

तूने छोड़ा था मुझे यार किसी की शह पर
इसलिये आज तू तन्हा सा नज़र आता है

ये तो शतरंज की बाजी है बिछाई उसकी
तू तो इस खेल में मुहरा सा नज़र आता है

है शिकन साफ़,शिकस्तों की तिरे माथे पर
तू हमें कुछ डरा सहमा सा नज़र आता है
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by santosh khirwadkar on August 23, 2017 at 8:30pm — 15 Comments

कैसे कहूँ अब तुझसे कुछ कहा भी नहीं जाता,

कैसे कहूँ अब तुझसे कुछ कहा भी नहीं जाता,

तनहा ज़िंदगी में अब यूँ रहा भी नहीं जाता



चले थे जिस मोड़ तलक इस सफ़र में हम ,

रास्ता उस सफ़र का भुलाया भी नहीं जाता



उठता हैं मेरे दिल में तिरी यादों का तूफ़ाँ भी,

हादसा था जैसे ये भुलाया भी नहीं जाता



सुख गये यूँ अश्क़ भी यादों से तिरी,

ग़मों को लिये अब तो रोया भी नहीं जाता



तुम रहो कहीं भी मगर ये सच है ,

वजूद तिरा दिल से फिर मिटाया भी नहीं जाता



वो शख़्स जिसने मुझे अपना माना…

Continue

Added by santosh khirwadkar on August 10, 2017 at 8:30pm — 6 Comments

प्रेम कहलाता है .......संतोष

मैंने जो गाया था कभी,तूने जो सुना ही नहीं

स्नेह,प्रेम,गीत ,वही तो कहलाता है



सावन की फुहारों में,आसमाँ की राहों से

धरती की माटी को भी ,वो तो चूम जाता है



अख़ियों ही अख़ियों से दिल तक जाने वाला,

यही तो वो रोग है जो ,प्रेम कहलाता है



कभी नीम की निम्बोली में भी अमूवा का स्वाद दे वो,

ऐसी स्मृतियों को कोई भूल कहाँ पाता है



नयनों की बरखा में यादों का सहारा लिये,

पलकों के द्वार को भी ,वो तो भीगो जाता है



सावनों के झूलों पे… Continue

Added by santosh khirwadkar on August 9, 2017 at 11:39pm — 4 Comments

तिरी नज़रों में ....संतोष

तिरी नज़रों में ये  बात नज़र आती है
मिरी याद तो तुझे आज भी आती है

ये चाहत का मामला है जनाब,
दिल की कशिश है,लौट आती है

छुपा लो लाख इसे तुम दिल में मगर,
बात दुनियाँ को भी नज़र आती है

दिल गिरफ़्त में है और क़ैद भी'संतोष'
चाहत तिरी वो ज़ंजीर नज़र आती है
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on August 8, 2017 at 8:00pm — 9 Comments

चाँद ढूँढ रहे हो ??......संतोष

क्यूँ आसमां में चाँद ढूँढ रहे हो,

वो मेरे पास उतर आया है



हाँथों की इन लकीरों में जैसे मेरे,

ज़िंदगी बन के चला आया है



आईना सा था वो बिल्कुल साफ़,

छूने से मेरे ,उस पर कुछ दाग़ उभर आया है



चमकता सितारा हूँ ज़मीं पर उसका,

वो आसमाँ सा ज़मीं को सजाने आया है



ये मेरी मुहब्बत ही तो है उससे,

वो मुझसे मिलने ज़मीं तक आया है



जलते हो तो जलो ए दुनियाँ वालों तुम,

वो मुझसे ईद मुबारक़ कहने आया… Continue

Added by santosh khirwadkar on August 7, 2017 at 8:18pm — 10 Comments

चलो फिर यादों के सफ़र पर......संतोष

चलो फिर यादों के सफ़र पर हो आते हैं ,

तन्हाई का ये दौर कुछ देर को भूल आते है



बिखरे हमारे ख़्वाबों को ग़र सवाँरना हो तो,

चलो आज फिर उनसे मुलाक़ात कर आते हैं



ख़्वाबों में ही सही मगर थे हमसफ़र कभी,

यही ऐहसास को फिर पैकर किये आते है



ये कैसा मरज है कि दिलों से जाता ही नहीं,

दिल अफ़्सुर्दा है क्यूँ तुम्हारा ये भी जान आते है



सोचा नहीं था कि फिर सामना होगा तुमसे,

बिखरे ख़्वाबों का एक नया आईना बना आते हैं



उम्मीद आज भी फ़क़त… Continue

Added by santosh khirwadkar on August 6, 2017 at 12:40pm — 9 Comments

कौन है ......... संतोष

कहाँ है,कौन है, कैसा नज़र आता है ,

वो ख़ुद में कम ,अब मुझ में ज़ियादा नज़र आता है

ये कैसी इबादत है ख़ुदा को मिरी,

माँगू ख़ुदा को भी ,तो वो ही नज़र आता है

वो धड़कन है,साँस है, ज़िंदगी भी है मिरी

करूँ आँखें बंद भी तो ,चेहरा उसी का नज़र आता है



अश्क़ ,ग़म,ख़ुशी ,मौसम,सभी तो है शामिल उसमें,

वो मुझे अब मिरी, ग़ज़ल नज़र आता है



चाहता तो वजूद ही मिटा देता उसका मगर,

वो ऐसा ज़ख़्म है दिल का ,जो फिर उभर आता…

Continue

Added by santosh khirwadkar on August 2, 2017 at 9:30pm — No Comments

चले आना...संतोष

चले आ बस एक बार फिर तू ,

अब ये इंतज़ार और नहीं होता



नज़रों के फ़ासलों में है तू दूर,

दिलों के फ़ासलों से तू दूर नहीं होता



चाहते हो आज़माना मुझको तो ,आज़माओ

मगर ये दिल है ,सबका एक सा नहीं होता



तू आ जा मेरे ख़्वाबों में ही सही ,

फिर देखना दुनियाँ में क्या नहीं होता



तलाश मेरी वही है जो वो समझे तो "संतोष"

लेकिन अब मेरी मिन्नतों का भी असर उस पर नहीं होता



#संतोष खिरवड़कर

9826052771

(मौलिक एवं… Continue

Added by santosh khirwadkar on August 2, 2017 at 8:24pm — 2 Comments

इश्क़ की ज़ुबाँ....संतोष

इश्क़ की ज़ुबाँ को तूने किस क़दर आसां कर दिया,

कह न सका कभी, वो निगाहों से बयाँ कर दिया.



दिल में मुरझाये से अरमां थे मिरे,

निगाहों ने तिरे उन्हें फिर जवाँ कर दिया.



अब तो हवाओं में भी आती है ख़ुशबू तिरी,

बंजर था ये दिल मेरा,तूने गुलिस्ताँ कर दिया.



पाना था तुझे जो रुका भी नहीं मंज़िल तलक मैं,

चाहतों ने तिरे इस दुश्वार सफ़र को और आसां कर दिया.



फ़ैसला जब था मेरा तुम्हारा, तो फिर ये ऐतराज़ कैसा,

दुनियाँ वालों ने फिर क्यूँ जीना मेरा… Continue

Added by santosh khirwadkar on August 2, 2017 at 8:02pm — 6 Comments

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