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Sushil Sarna's Blog (903)

ऐ आसमान ....

ऐ आसमान ....

क्या हो तुम

आज तक कोई नहीं

छू पाया तुम्हें

फिर भी तुम हो

ऐ आसमान

किसी बेघर की

छत हो

किसी का ख्वाब हो

किसी परिंदे का लक्ष्य हो

या

किसी रूह का

अंतिम धाम हो

क्या हो तुम

ऐ आसमान

नक्षत्रों का निवास हो

किसी चातक की प्यास हो

मेघों का क्रीड़ा स्थल हो

सूर्य का पथ हो

या

चाँद तारों का आवास हो

क्या हो तुम

ऐ आसमान

सुशील सरना

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on August 21, 2018 at 1:53pm — 14 Comments

जीवन के दोहे :

जीवन के दोहे :



बड़ा निराला मेल है, श्वास देह का संग।

जैसे चन्दन से लिपट, जीवित रहे भुजंग।1।

अजब जहाँ की रीत है, अज़ब यहाँ की प्रीत।

कब नैनों की रार से, उपजे जीवन गीत ।2।

बड़ा अनोखा ईश का, है आदम उत्पाद।

खुद को कहता है खुदा, वो आने के बाद।3।

झूठे रांझे अब यहां, झूठी उनकी हीर।

झूठा नैनन नीर है, झूठी उनकी पीर।4।

जैसे ही माँ ने रखा, बेटे के सर हाथ।

बह निकली फिर पीर की, गंगा जमुना…

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Added by Sushil Sarna on August 20, 2018 at 4:30pm — 24 Comments

गर्द (लघु रचना ) .....

गर्द (लघु रचना ) .....

वह्म है
पोंछ देने से
आँसू
मिट जाते हैं
दर्द
मोहब्बत के शह्र में
जब उड़ती है
यादों की गर्द

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 18, 2018 at 6:00pm — 4 Comments

स्वतंत्रता दिवस पर ३ रचनाएं :

स्वतंत्रता दिवस पर ३ रचनाएं :

एक चौराहा

लाल बत्ती

एक हाथ में कटोरा

भीख का

एक हाथ में झंडा बेचता

कागज़ का

न भीख मिली

न झंडा बिका

कैसे जलेगा

चूल्हा शाम का

क्या यही अंजाम है

वीरों के बलिदान का

सुशील सरना

.... .... ..... ..... ..... ..... ....

हाँ

हम आज़ाद हैं

अब अंग्रेज़ नहीं

हम पर

हमारे शासन करते हैं

अब हंटर की जगह

लोग

आश्वासनों से

पेट भरते हैं

महंगाई,भ्रष्टाचार

और…

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Added by Sushil Sarna on August 15, 2018 at 1:00pm — 14 Comments

गोधूलि की बेला में (लघु रचना ) ....

मैं
आस था
विश्वास था
अनभूति का
आभास था
पथ पथरीला प्रीत का
लम्बा और उदास था
जाने किसके हाथ थे
जाने किसका साथ था
गोधूलि की बेला में
अंतिम जीवन खेला में
आहटों की देहरी पर
अटका
मेरा
श्वास था

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 13, 2018 at 6:30pm — 14 Comments

लघु रचना : यथार्थ ...

लघु रचना : यथार्थ ...

एक मैं
चल दिया
एक मैं को
छोड़कर


एक यथार्थ
आभास हो गया
एक आभास
यथार्थ हो गया


जिसका वो अंश था
उस अंश में
उस यथार्थ का
वास हो गया

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 5, 2018 at 11:05am — 13 Comments

आज के दोहे....

आज के दोहे :.....



चरणों में माँ बाप के, सदा नवाओ शीश।

इनमें चारों धाम हैं, इनमें बसते ईश।। १



पथ पथरीला सत्य का , झूठी मीठी छाँव।

माँ के आँचल में मिले ,सच्चे सुख की ठाँव।। २



पग-पग पर घायल करें, पुष्प वेश में शूल।

दर्पण पर विश्वास के, जमी छद्म की धूल।।३



समय सदा रहता नहीं, जीवन के अनुकूल।

एक कदम पर फूल तो , दूजे पर हैं शूल।।४



शादी करके सब कहें, शादी है इक भूल।

जीवन में न संग मिले, जीवन के अनुकूल।।५



सदा लगे…

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Added by Sushil Sarna on July 30, 2018 at 2:30pm — 17 Comments

परछाईयाँ (२ क्षणिकाएं ) ....

परछाईयाँ (२ क्षणिकाएं ) ....

1.

एक अंत
मृतिका पात्र में
कैद हो गया
जीवन के धुंधलके में
अर्थहीन परछाईयों का
पीछा करते करते

..............................

2.

बीते कल की
क्षत-विक्षत अभीप्सा का
शृंगार व्यर्थ है
अन्धकार को भेदो
सूरज वहीं कहीं मिलेगा
दुबका हुआ
नई अभीप्सा का

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 24, 2018 at 12:50pm — 11 Comments

क्षणिका - तूफ़ान ....

क्षणिका - तूफ़ान ....

शब्
सहर से
उलझ पड़ी
सबा
मुस्कुराने लगी
देख कर
चूड़ी के टुकड़ों से
झांकता
शब् की कतरनों में
उलझता
सुलझता
जज़्बात का
तूफ़ान

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 18, 2018 at 2:17pm — 6 Comments

एक लम्हा ....

एक लम्हा ....

मेरे लिबास पर लगा

सुर्ख़ निशान 

अपनी आतिश से

तारीक में बीते

लम्हों की गरमी को

ज़िंदा रखे था

मैंने



उस निशाँन को

मिटाने की

कोशिश भी नहीं की



जाने

वो कौन सा यकीन था

जो हदों को तोड़ गया

जाने कब

मैं किसी में

और कोई मुझमें

मेरा बनकर

सदियों के लिए

मेरा हो गया

एक लम्हा

रूह बनकर

रूह में कहीं

सो गया

सुशील सरना

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on July 18, 2018 at 12:25pm — 13 Comments

क्षणिका :विगत कल

क्षणिका :विगत कल

दिखते नहीं
पर होते हैं
अंतस भावों की
अभियक्ति के
क्षरण होते पल
कुछ अनबोले
घावों के
तम में उदित होते
द्रवित
विगत कल


सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 17, 2018 at 6:50pm — 5 Comments

हार ....

हार ....

ज़ख्म की
हर टीस पर
उनके अक्स
उभर आते हैं
लम्हे
कुछ ज़हन में
अंगार बन जाते हैं
उन्स में बीती रातें
भला कौन भूल पाता है
ख़ुशनसीब होते हैं वो
जो
बाज़ी जीत के भी
हार जाते हैं

उन्स=मोहब्बत

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 13, 2018 at 6:41pm — 13 Comments

माँ   ....

माँ   .... 

बताओ न

तुम कहाँ हो

माँ

दीवारों में

स्याह रातों में

अकेली बातों में

आंसूओं के

प्रपातों में

बताओं न

आखिर

तुम कहाँ हो

माँ

मेरे जिस्म पर ज़िंदा

तुम्हारे स्पर्शों में

आँगन में गूंजती

आवाज़ों में

तुम्हारी डाँट में छुपे

प्यार में

बताओं न

आखिर

तुम कहाँ हो

माँ

बुझे चूल्हे के पास

या

रंभाती गाय के पास

पानी के मटके के पास…

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Added by Sushil Sarna on July 9, 2018 at 5:33pm — 11 Comments

आग़ोश -ए-जवानी ...

आग़ोश -ए-जवानी ...


न, न
रहने दो
कुछ न कहो
ख़ामोश रहो
मैं
तुम्हारी ख़ामोशी में
तुम्हें सुन सकता हूँ
तुम
एक अथाह और
शांत सागर हो
मैं
चाहतों का सफ़ीना हूँ
इसे अल्फाज़ की मौजों पर
रवानी दे दो
मेरे वज़ूद को
आग़ोश -ए-जवानी दे दो

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 6, 2018 at 12:00pm — 6 Comments

अकेली ...

अकेली ...

मैं

एक रात

सेज पर

एक से

दो हो गयी

जब

गहन तम में

कंवारी केंचुली

ब्याही हो गयी

छोटा सा लम्हा

हिना से

रंगीन हो गया

मेरी साँसों का

कंवारा रहना

संगीन हो गया

एक अस्तित्व

उदय हुआ

एक विलीन

हो गया

और कोई

मेरे अस्तित्व की

ज़मीन हो गया

अजनबी स्पर्शों की

मैं

सहेली हो गयी

एक जान

दो हुई

एक

अकेली हो गयी

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on July 4, 2018 at 4:48pm — 11 Comments

प्रतीक (लघु रचना ) .....

प्रतीक (लघु रचना ) .....

मेरे होटों पे
तूने अपने स्पर्श से
जो मौन शब्द छोड़े थे
सोचा था
वो
ज़हन की गीली मिट्टी में गिरकर
अमर गंध बन जाएंगे
क्या पता था
वो स्पर्श
मात्र
भावनाओं की आंधी थे
जो अन्तःस्थल में
एक घुटन के
प्रतीक
बन कर रह गए
एक स्वप्न का
यथार्थ कह गए

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on June 29, 2018 at 12:43pm — 4 Comments

5 क्षणिकाएं :

5 क्षणिकाएं :

१ 

रात 

रोज मरती है

अपने दोस्त 

दिन के 

इंतज़ार में 

................

२ 

तपते सागर का 

दर्द 

लाते हैं मेघ 

भीग जाती हैं 

वसुधा 

...................

३ 

नैनालिंगन 

मौन अभिनन्दन 

अधर समर्पण 

....................

४ 

ज़िद पर आ जाये 

तो 

पाषाणों को…

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Added by Sushil Sarna on June 28, 2018 at 4:30pm — 4 Comments

विषाक्त उजाले :

विषाक्त उजाले :

कितना लालायित था
बाहर की दुनिया से
मिलने के लिए

दम घुटने लगा था मेरा
अंदर ही अंदर
गर्भ के
घुप अँधेरे में
रोशनी से
आलिंगनबद्ध होने के लिए

जब से
गर्भ से निकला हूँ
जी रहा हूँ
अपनी ही अंतस में
चुपचाप सा
यही सोचते हुए
क्या इन्हीं
विषाक्त

उजालों के लिए
जीव
गर्भ के
अन्धकार का
त्याग करता है


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on June 27, 2018 at 6:18pm — 6 Comments

अदेह रूप .....

अदेह रूप ...

सर्वविदित है

देह का शून्यता में

विलीन होना

निश्चित है

मगर

अदेह चेतना

सृष्टि में व्याप्त

चैतन्य कणों से

निर्मित

आदि अंत से मुक्त

अनंत

अभिश्रुति की

अभिव्यंजना है

मुझे तुमसे मिलने के लिए

उन अदृश्य कणों से निर्मित

धागों की अदेह को

अपने चेतन में

अवतरित करना होगा

मैं

मेरी देह सी

अतृप्त नहीं रह सकती

मैं

तुमसे

अवश्य मिलूंगी

अपने

अदेह रूप…

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Added by Sushil Sarna on June 25, 2018 at 11:59am — 10 Comments

अमर हो गयी .. (लघु रचना )

अमर हो गयी .. (लघु रचना )

स्मृति गर्भ में
एक शिला
साकार हो उठी
भाव अस्तित्व
उदित हुआ
शिला की दरारों से
आसक्ति
अदृश्यता की घाटियों से
प्रवाहित हो
स्मृतियों वीचियों पर
अक्षय पल सी
सुवासित हो
अमर हो गयी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on June 24, 2018 at 1:27pm — 8 Comments

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