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Sulabh Agnihotri's Blog (58)

ग़ज़ल- लहरें पतवार के संग किलकती रहीं - सुलभ

बहर - 212 212 212 212

लहरें पतवार के संग किलकती रहीं

मन के पाँवों में पायल सी बजती रहीं

पालकी बैठ सपने गए साथ में

रास्ते भर उमंगें लरजती रहीं

शोखियों की सहेली बनीं चूडि़याँ

लाजवन्ती निगाहें बरजती रहीं

सपनों में रातरानी ने घर कर लिया

कल्पनायें दुल्हन बन के सजती रहीं

देह भर में खिलीं क्यारियाँ-क्यारियाँ

चाहतें ओढ़ घूंघट मचलती रहीं

तितलियों सी निगाहें उड़ीं दूर तक…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 11, 2015 at 3:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल: जब-जब किसी परिंदे ने पंख फड़फड़ाए - सुलभ

बहर - 22 12122 22 12122 

जब-जब किसी परिंदे ने पंख फड़फड़ाए

वो बदहवास होकर ख़ंजर निकाल लाए

दुनियाँ की चाल चलनी जिस रोज़ से शुरू की

अपनी निगाह से हम गिर के फिर उठ न पाये

वो जानते हैं उनका भगवान जानता है

कानून से भले ही सब जुर्म बख्शवाये

रोज़े खतम न हों तो, क्या चाँद का निकलना

हम ईद मान लेंगे जब चाँद मुस्कुराये

मंजि़ल थी क़ामयाबी, ऊँचा महल अटारी

ईमान बेच आये, ईंटें ख़रीद लाये

हर फूल के…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 10, 2015 at 3:18pm — 12 Comments

एक गजल - सुलभ अग्निहोत्री

बहर - 212 212 212 212

काफिया - अनी, रदीफ - डाल दी

धुंध यादों पे भरसक घनी डाल दी

बन्द कमरे में वो अलगनी डाल दी 

चिथड़ा-चिथड़ा चटाई बिछी देख कर

उसने खा के तरस चांदनी डाल दी

नाम अनचाहे पर्याय भय का बना

हादसों ने अजब रोशनी डाल दी

उम्र के मशवरे चल पड़े स्वप्न भी

ला के आंखों में हीरक कनी डाल दी

वक्त का जायका था कसैला बड़ा

जिक्र भर ने तेरे चाशनी डाल दी

श्याम का नाम तूने लिया क्या…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 9, 2015 at 11:30am — 8 Comments

एक ग़ज़ल -- सुलभ अग्निहोत्री

बहर - 2212 1212   22 1212

वो भ्रम तुम्हारे प्यार सा बेहद हसीन था

सपनों के आसमान की मानो जमीन था

सारी थकान खींच ली गोदी में लेटकर

बच्चा वो गीत रूह का ताजातरीन था

हर खत में अपनी खैरियत, उसको दुआ लिखी

माँ यह कभी न लिख सकी, कुछ भी सही न था

मन, प्राण, आँख द्वार पर, बेकल बिछे रहे

कुनबा तमाम जुड़ गया, आया वही न था

अँजुरी मेरी बँधी रही और सारा रिस गया

वो प्यार रेत से कहीं ज्यादा महीन…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 6, 2015 at 10:00am — 20 Comments

एक ग़ज़ल - सुलभ अग्निहोत्री

सच कहने की हलफ़ उठाई

अपनों से दुश्मनी निभाई

जिसके हाथ तुला दी उसने

पल्ले में पासंग लटकाई

दीपक तले अंधेरा देखा

देखी रिश्तों की गहराई

हम भी बर्फ़-बर्फ़ हैं केवल

जब से पाई है ऊँचाई

शेर कटघरे के अन्दर हो

कुछ ऐसे ही है सच्चाई

अपने ही दुखड़ों में खोये

कैसे पढ़ते पीर पराई

फूट पड़ा आवेग पिघलकर

जब सावन की पाती आई

जिसने कपड़े आप उतारे

उसको कैसी जगत…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 5, 2015 at 11:35am — 18 Comments

एक ग़ज़ल - सुलभ अग्निहोत्री

सुरभि की छाँव में आकर हुआ दरपन सहज कायल

तुम्हारा रूप बादल सा इबादत की तरह निर्मल

नहाकर ओस से निकली प्रकृति की नायिका तड़के

उषा की बाँह फैलाये विमोहित रवि हुआ चंचल

न दो व्यवधान अलियों को उन्हें करने निवेदन दो

सुवासित प्रीति का उपवन, समर्पण के खिले शतदल

समूचा सींच डाला मन, बदन, अस्तित्व रिमझिम ने

तुम्हारी याद सावन सी बरसती हर घड़ी, हर पल

नदी की धार पर लिक्खा किसी ने गीत प्राणों का

बहा जब मन तरल होकर, लहर भी हो उठी…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 4, 2015 at 11:02am — 13 Comments

चौराहे-चौपाल हर जगह मिलते हैं बौराए लोग --- सुलभ अग्निहोत्री

चौराहे-चौपाल हर जगह मिलते हैं बौराये लोग

हमसे, तुमसे, इससे, उससे, सबसे आजिज आये लोग

बड़ी दिलेरी दिखलाते थे बिला वजह हर मौके पर

वक्त पड़ा तो सबसे पहले भागे पूँछ दबाये लोग

भाई का कंधा भी अपने कंधे से उठता देखा

कैसे उसके कद को छांटें, सोच-सोच पगलाये लोग

नुक्कड़-नुक्कड़ ढोल पीटते अपने सूरज होने का

सूरज जब निकला तो बरबस चुंधियाये अँधराये लोग

खुद ही तमगे गढ़े टांककर खुद ही अपने सीने पर

अपने चारण बने आप ही अपने पर…

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Added by Sulabh Agnihotri on October 7, 2014 at 12:00pm — 13 Comments

उनका अभिनंदन है जो कुछ कर गुजरते हैं - सुलभ अग्निहोत्री

उनका अभिनंदन है जो कुछ कर गुजरते हैं ।

भाग्य की प्राण-प्रतिष्ठा के हवन में भी

कर्म ही यजमान बनकर होम करते हैं ।

मेरे शब्दों को अभी स्वर की तमन्ना है,

फड़फड़ाते पंख को आकाश बनना है,

वेदना के गर्भ में संकल्प पलता है

हर अमा को चीर कर सूरज निकलता है

आश्वासन आस से परिहास मत करना

आँसुओं से अन्ततः अंगार झरते हैं ।

चेतना की बाँसुरी को स्नेह की सरगम,

भावना को दे नये उद्गम, नये संगम,

ओस बन अन्तःकरण के कुसुम को धो दे

बीज…

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Added by Sulabh Agnihotri on October 2, 2014 at 8:30pm — 12 Comments

कौन दे उल्लास मन को ? .. सुलभ अग्निहोत्री

कौन दे उल्लास मन को ? फिर वसन स्वर्णिम, किरन को ?

हो गये जो स्वप्न ओझल फिर दरस उनके नयन को ?

कोपलों पर पहरुये अंगार धधके धर रहे हैं

साधना कापालिकी उन्माद के स्वर कर रहे हैं

त्राहि मांगें अश्रु किससे, वेदना किसको दिखायें

कौन दे स्पर्श शीतल अग्निवाही इस पवन को ?

कोटि दुःशासन निरंतर देह मथते, मान हरते

द्रौपदी का आर्त क्रंदन अनसुना श्रीकृष्ण करते

नेह के पीयूष से अभिषेक कर फिर कौन दे अब

भाल को सौभाग्य कुमकुम, आलता चंचल चरन को…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 28, 2014 at 5:20pm — 16 Comments

है अपनी नस्ल पे भी फख्र अपने गम की तरह से .. - सुलभ अग्निहोत्री

है अपनी नस्ल पे भी फख्र अपने गम की तरह से

दिलों में घर किये हुए किसी वहम की तरह से

बहारें छोड़ती गईं निशान कदमों के मगर

उजाड़ मंदिरों के भव्य गोपुरम की तरह से

खरा है नाम पर नसीब इसका खोटा है बड़ा

ये मेरा देश बन के रह गया हरम की तरह से

बचे हैं गाँठ-गाँठ सिर्फ गाँठ भर ही रिश्ते सब

निभाये जा रहे हैं बस किसी कसम की तरह से

सजा गुनाह की उसे अगर दें, कैसे दें बता ?

हमारी रूह में बसा है वो धरम की तरह…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 21, 2014 at 4:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल .......... सुलभ अग्निहोत्री

हद से अपनी गुजर गया कोई ।

चुपके दिल में उतर गया कोई ।।

आँख में आसमान लाया था

मेरी अंजुरी में भर गया कोई ।।

छोटी बच्ची सा झूल बाहों में

मन की हर पीर हर गया कोई

टूटी छत से उतर के कमरे में

चाँदनी सा पसर गया कोई ।।

डाल पे फूल खिल गया जैसे

स्वप्न जैसे सँवर गया कोई ।।

रोशनी को सहेजने में ही

कतरा-कतरा बिखर गया कोई ।।

सामने वालमीकि के फिर से

क्रौंच पर वार कर गया कोई

बह…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 17, 2014 at 3:07pm — 23 Comments

ग़ज़ल - - - सुलभ अग्निहोत्री

कुछ ऐसे सिलसिले हैं जो हमेशा साथ चलते हैं

कुछ ऐसे फासले हैं जोकि यादों में ठहरते हैं

छुपे कुछ राज होते हैं हरेक पैगाम में उसके

कभी हम जान लेते हैं, कभी अनजान रहते हैं

सँदेशे दिल के आते हैं, हमेशा आँख के रस्ते

कभी गालों को तर करते, कभी नूपुर से बजते हैं

वो मेरे साथ ज्यादा रासता तय कर नहीं पाये

पर उतनी राह पर अब भी हजारों फूल खिलते हैं

उन्हें जब याद करते हैं तो कोई गीत होता है

ग़ज़ल होती है जब कोई, उन्हें हम याद…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 16, 2014 at 3:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल - सुलभ अग्निहोत्री

सर दाँव पे लगा के अब खेल खेल देखें ।
अपना नसीब देखें, उनकी गुलेल देखें ।

शायद उठे भड़क ही कोई दबी चिंगारी
चल राख हौसलों की परतें उधेल देखें ।

चेहरे सफ़ेद सबको कमज़ोर कर रहे हैं
इन बूढ़े नायकों को पीछे धकेल देखें ।

उद्दंड अश्व खाईं की ओर जा रहे हैं
हाथों में अपने लेकर इनकी नकेल देखें ।।

क्या सूखते दरख्तों का हाल पूछते हैं
हर ओर सर उठाये है अमरबेल देखें ।।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Sulabh Agnihotri on September 7, 2014 at 6:00pm — 11 Comments

गीत

पीर पंचांग में सिर खपाते रहे ।

गीत की जन्मपत्री बनाते रहे ।

हम सितारों की चैखट पे धरना दिये

स्वप्न की राजधानी सजाते रहे ।

लाख प्रतिबंध पहरे बिठाये गये

शब्द अनुभूतियों के सखा ही रहे

आँसुओं को जरूरत रही इसलिये

दर्द के कांधे के अँगरखा ही रहे

श्वास की बाँसुरी बज उठी जब कभी

हम निगाहें उठाते लजाते रहे।।

पर्वतों से मचलती चली आ रही,

गीत गोविन्द मुग्धा नदी गा रही,

पांखुरी-पांखुरी खिल गई रूप की

भोर लहरा रही, चांदनी गा…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 6, 2014 at 5:11pm — 8 Comments

बहुत याद क्यों आज तू आ रही है ?

बहुत याद क्यों आज तू आ रही है ?



किसी ढीठ बच्ची सी नादानियों में

क्यों सुधियों के पन्नों को छितरा रही है ।

सुबह एक छोटी सी प्यारी सी गुड़िया

मेरे गाल पर फूल बिखरा गई थी ।

फुदकती हुई एक नन्हीं गिलहरी

थोड़ी देर गोदी में सुस्ता गई थी ।

अभी तक छुअन रेशमी-रेशमी सी

मेरे नर्म अहसास सहला रही है ।

मेरे सूने कमरे में कुछ देर खेलें

बुलाया था चंचल हवाओं को मैंने

मचलती चली आयें किलकारियाँ सब

कि खोला था मन की गुफाओं को…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 20, 2013 at 10:14am — 14 Comments

ग़ज़ल

वो अपनेपन का सोता खोल दिल की हर गिरह निकले ।

कगारी फाँद ओंठों की सुरीला गीत बह निकले ।

लरजकर चूम ले माथा, हुमक कर बाँह में भर ले

वो बिछड़ी रात भर की धूप बौरी जब सुबह निकले ।

फकत दो बूँद ने भीतर तलक सारा भिगो डाला

हमारे दिल भी ये कच्चे मकानों की तरह निकले ।

इन्हें पोंछो तो पहले कैफियत पीछे तलब करना

हर आँसू बेशकीमत है वो चाहे जिस वजह निकले

इस अपनी आदमी की देह से इतनी कमाई कर

कि तेरे बाद भी तेरे लिये दिल में…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 19, 2013 at 10:00am — 21 Comments

गीत की जन्मपत्री बनाते रहे

पीर पंचांग में सिर खपाते रहे ।

गीत की जन्मपत्री बनाते रहे ।

हम सितारों की चौखट पे धरना दिये

स्वप्न की राजधानी सजाते रहे ।

लाख प्रतिबंध पहरे बिठाये गये

शब्द अनुभूतियों के सखा ही रहे

आँसुओं को जरूरत रही इसलिये

दर्द के कांधे के अँगरखा ही रहे

श्वास की बाँसुरी बज उठी जब कभी

हम निगाहें उठाते लजाते रहे।

पर्वतों से मचलती चली आ रही,

गीत गोविन्द मुग्धा नदी गा रही,

पांखुरी-पांखुरी खिल गई रूप की

भोर लहरा रही, चांदनी गा…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 4, 2013 at 4:00pm — 19 Comments

चांदनी फिर पिघलने लगी है

चांदनी फिर पिघलने लगी है

आँसुओं से धुली वो इबारत

गीत बनकर मचलने लगी है।

रोते-रोते हुए पस्त शिशु से,

भावना के विहग सो गये थे

सांझ की डाल सहमी हुई थी,

भोर के पुष्प चुप हो गये थे

फिर अचानक हुई कोई हलचल,

जैसे लहरा गया कोई आंचल

उनके दिल से उठी एक बदली

मेरी छत पे टहलने लगी है।

इक गजल पर तरह दी किसी ने,

भूला मुखड़ा पुनः गुनगुनाया

प्यार से साज की धूल झाड़ी,

मुद्दतों बाद फिर से उठाया

तार…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 3, 2013 at 3:30pm — 25 Comments

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