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जयनित कुमार मेहता's Blog (75)

दो घड़ी करके तो सुहबत देखना (ग़ज़ल)

2122 2122 212



लाएगी इक दिन क़यामत,देखना..

जानलेवा है सियासत, देखना..



काम मुश्किल है बहुत संसार में,

दुसरे इंसाँ की बरकत देखना..



देख लेना खूँ-पसीना भी, अगर

आलिशाँ कोई इमारत देखना..



झाँक कर मेरी निगाहों में कभी,

आपसे कितनी है चाहत, देखना..



देखना हो गर खुदा का अक्स,तो

छोटे बच्चे की शरारत देखना..



'जय' न सिखला दे मुहब्बत,फिर कहो

दो घड़ी करके तो सुहबत देखना..

______________________________…

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Added by जयनित कुमार मेहता on December 7, 2015 at 2:30pm — 12 Comments

हाल न हमसे पूछो (ग़ज़ल)

2122   1122   1122   22

किसको कितना है मिला माल,न हमसे पूछो।

हाँ!  करप्शन  का  ये  जंजाल न  हमसे पूछो।

तेरे  कारण  हुई  है, ये  जो  मेरी  हालत  है,

अब  तुम्हीं  आके  मेरा  हाल  न  हमसे  पूछो।

ज़ेह्न-ओ-दिल से तेरी यादों को मिटा डाला,अब

बीते  दिन, गुज़रे  हुए  साल  न  हमसे  पूछो।

कौन आख़िर ले गया गाँव की पंचायत को,

कहाँ  ग़ायब  हुए  चौपाल, न  हमसे  पूछो।

जनवरी और दिसंबर के महीने में…

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Added by जयनित कुमार मेहता on December 4, 2015 at 8:30pm — 17 Comments

लड़ाई मज़हबी फिर से छिड़ी है (ग़ज़ल)

1222 1222 122

कभी है ग़म,कभी थोड़ी ख़ुशी है..

इसी का नाम ही तो ज़िन्दगी है..

हमें सौगात चाहत की मिली है..

ये पलकों पे जो थोड़ी-सी नमी है..

मुखौटे हर तरफ़ दिखते हैं मुझको,

कहीं दिखता नहीं क्यों आदमी है..?

फ़िज़ा में गूँजता हर ओर मातम,

कि फिर ससुराल में बेटी जली है..

सभी मौजूद हों महफ़िल में,फिर भी,

बहुत खलती मुझे तेरी कमी है..

दहल जाए न फिर इंसानियत 'जय',

लड़ाई मज़हबी फिर से…

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Added by जयनित कुमार मेहता on November 25, 2015 at 4:50pm — 8 Comments

और,सारे देखने में हैं तमाशा (ग़ज़ल)

2122 2122 2122

भागता  ही जा रहा है बेतहाशा..

आदमी के हाथ लगती बस हताशा..

मुस्कराहट लब से गायब हो रही है,

पाँव फैलाए खड़ी जड़ तक निराशा..

नष्ट होती जा रही वो स्वर्ण-मूरत,

वर्षों में पुरखों ने जिसको था तराशा..

सुबह का भूला अभी लौटेगा शायद,

सूर्य की अंतिम किरण तक है ये आशा..

है न भक्तों को कफ़न तक भी मयस्सर,

देवता कुर्सी पे खाते हैं बताशा..

जान पंछी की निकलने पर तुली है,

और सारे…

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Added by जयनित कुमार मेहता on November 20, 2015 at 10:02pm — 6 Comments

जिगर से पूछकर देखो,नज़र से पूछकर देखो (ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222



मज़ा क्या है सफ़र का,हमसफ़र से पूछकर देखो

है मंज़िल दूर कितनी,ये डगर से पूछकर देखो

-

सुनाएँगी दरो-दीवार,खिड़की रोज़ ही तुमको

कहानी अपने पुरखों की तो घर से पूछकर देखो

-

बिताई जिस के साये में थी तुमने धूप जीवन की

कि अब तो हाल उस बूढ़े शजर से पूछकर देखो

-

पता चल जाएगा, किसने फ़िज़ा में है ज़हर घोला

हवाओं से,ये बू आती किधर से..पूछकर देखो

-

वफ़ा के ज़ख्म कितने हैं,बहे कितने मेरे आँसू

जिगर से पूछकर… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on October 18, 2015 at 5:00pm — 10 Comments

श्याम से तो श्वेत सबका तन हुआ है (ग़ज़ल)

2122 2122 2122



श्याम से तो श्वेत सबका तन हुआ है..

लोभ से संत्रास लेकिन मन हुआ है..



अब कली भौरों से शर्माती नहीं है,

बेशरम अब सारा ही उपवन हुआ है..



खटने में ही बीतती है उम्र सारी,

कोल्हू के इक बैल सा जीवन हुआ है..



दिल के ग़म चहरे तलक आते नहीं क्यूँ,

सोच कर हैरान ये दर्पण हुआ है..



सूखी धरती की दरारें पूछती हैं,

तू भी धोखेबाज़ क्यूँ सावन हुआ है..



आजकल की फिल्मों में तो कुछ नहीं..बस,

'काम' का विस्तार से… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on October 2, 2015 at 9:00pm — 6 Comments

हल चलाना जानता हूँ (गीत)

है कला,मिट्टी से मैं,

सोना उगाना जानता हूँ।

पुत्र हूँ किसान का,

मैं हल चलाना जानता हूँ।।



ताप से दिनकर के मैं

तपकर कभी पिघला नहीं

रोक सकती हैं नहीं

मुझको मचलती भी बयारें



प्रात हो या रात,रहता

मैं सदा ही मस्तमौला

बरखा मूसलाधार चाहे

हलकी-फुल्की हों फुहारें



काल के भी गाल से,

मैं लौट आना जानता हूँ..!



लहलहाती है फसल जब

मैं ख़ुशी से झूमता हूँ

संग मेरे झूमते हैं

प्रकृति के सब नज़ारे



ये… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on October 2, 2015 at 7:40pm — 9 Comments

नाम काफ़ी है किसी का,सिर झुकाने के लिये (ग़ज़ल)

(2122 2122 2122 212)

आज फिर आये वो मुझको आज़माने के लिये..

क्या मिले हम ही थे उनको दिल दुखाने के लिये..

-

बात से फ़िर जाएँगे,ये सोच भी कैसे लिया,

सर कटा देंगे, दिया वादा निभाने के लिये..

-

ये शिकन माथे पे मेरे,बेवजह ही है सही,

कुछ तो कारण चाहिये ना, मुस्कुराने के लिये..

-

थे भरे संदूक वो,शैतान सब धन खा गये,

हो गये हैं आज वो,मुहताज दाने के लिये..

-

मंदिरों औ' मस्ज़िदों में 'जय' भटकना छोड़…

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Added by जयनित कुमार मेहता on September 29, 2015 at 12:27pm — 10 Comments

हो ग़म तो शख़्स वो हँसता बहुत है (ग़ज़ल)

1222  1222  122

मेरा दिल प्यार का भूखा बहुत है

ये दरिया है,मगर प्यासा बहुत है

-

मुकद्दर ने हमें मारा बहुत है

ज़माने से मिला धोखा बहुत है

-

उठाएँ हम भला हथियार कैसे

वो दुश्मन है,मगर प्यारा बहुत है

-

छुपाने का हुनर क्या खूब ढूँढा

हो ग़म तो शख़्स वो हँसता बहुत है

-

डराओ मत उसे क़ानून से तुम

कि उसके जेब में पैसा बहुत है

-

यूँ कहने को सितारे साथ हैं "जय"

मगर वो चाँद भी…

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Added by जयनित कुमार मेहता on September 24, 2015 at 12:32pm — 11 Comments

गाँव-घर मुझको बुलाते हैं (ग़ज़ल)

1222  1222  1222  1222

छलकते आँसुओं को हम तभी क्यूं भूल जाते हैं..

किसी को याद करके हम कभी क्यूं मुस्कुराते हैं..

-

न हम अपनी वफ़ाओं को कभी भी छोड़ पाते हैं,

न अपनी बेवफाई से कभी वो बाज़ आते हैं..

-

फ़िदा इन ही अदाओं पर हुऐ थे हम कभी यारों,

ज़रा सी बात पे वो रूठ कर फिर मान जाते हैं..

-

नज़र की बात थी,पर वो कभी भी बूझ ना पाये,

ज़रा, हम हाल दिल का बोलने में हिचकिचाते हैं..

-

भटक के इस शहर में,उब…

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Added by जयनित कुमार मेहता on September 17, 2015 at 3:50pm — 8 Comments

बिक रही अब तो मुहब्बत दोस्तों (ग़ज़ल)

(2122  2122  212)
बढ़ रही ख़्वाहिश-ए-दौलत दोस्तों..
बिक रही अब तो मुहब्बत दोस्तों..
-
कब रुकेंगी जाने नदियां ख़ून की,
ख़त्म होगी कब ये नफ़रत दोस्तों..
-
न्याय की उम्मीद अब तुम छोड़ दो,
हैं बहस भर ही अदालत दोस्तों..
-
दिल में उनके है नहीं मेरी जगह,
क्यों हमें उनकी है चाहत दोस्तों..
-
टूटने का डर नहीं लगता हमें,
दिल लगाने की है आदत…
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Added by जयनित कुमार मेहता on September 15, 2015 at 6:53pm — 17 Comments

आसमां तक वही गया होगा (ग़ज़ल)

(2122  1212  22)

आसमां तक वही गया होगा..

हो के बेख़ौफ़ जो उड़ा होगा..

-

राह तू जब तलक निकालेगा,

सूर्य तब तक तो ढल चुका होगा..

-

साँच को आंच ना कभी आती,

ये भी तुम ने कहीं सुना होगा..

-

हम नज़र किस तरह मिलायेंगे,

जब कभी उन से सामना होगा..

-

राह ईमान की चुने ही क्यों,

कौन तुमसे बड़ा गधा होगा..

-

ठोकरें ना गिरा सकीं उस को,

शख़्स तूफां में वो पला…

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Added by जयनित कुमार मेहता on September 12, 2015 at 5:26am — 8 Comments

जाता नहीं अब कोई भी दर्द दवा लेकर (ग़ज़ल)

(221 1222 221 1222)

जाता नहीं अब कोई भी दर्द दवा लेकर..

ज़ख्मों को भरा दिल के,यादों का नशा लेकर..

-

अब तक न मेरे फ़न को पहचान सके हैं जो,

फिर बाद में ढूंढेंगे वो मुझको दिया लेकर..

-

फीके सभी पकवानों के स्वाद हो जाते हैं,

खाता है नमक रोटी, जब भी वो मज़ा लेकर..

-

खोले खिड़की बैठा मैं देख रहा रस्ता,

शायद पहुँचे, कोई पैगाम हवा लेकर..

-

न ढूंढ सकेगा सारी उम्र खुदा को 'जय',

फिर बोल करेगा क्या, तू उसका पता…

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Added by जयनित कुमार मेहता on September 6, 2015 at 11:53pm — 10 Comments

यादें मरा नहीं करतीं (कविता)

तुम्हारे जाने के बाद

सोचा था,भुला दूंगा तुम्हें

जी लूँगा,उसी तरह

जैसे जीता था

जब तुम नहीं थे ज़िन्दगी में।

काटता रहा ज़िन्दगी...पल-पल

इसी भ्रम में

जी कहाँ पाया तब से?

काश!पहले पता होता

कमबख्त..यादें मरा नहीं करतीं

दिनभर की आपाधापी के बाद

साँझ ढले लौट आती हैं,घोंसले में

किसी उन्मुक्त पंछी की तरह

बहुत प्रयास किये

तिनका-तिनका नोच फेंकने के बाद भी

उजाड़ न पाया इनका बसेरा

सदा के लिए।

इनके कलरव हरपल

कांटे…

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Added by जयनित कुमार मेहता on September 2, 2015 at 12:08pm — 4 Comments

दुनियादारी निभा रहा हूं! (कविता)

आंखों में आंसू हैं, और गीत ख़ुशी के गा रहा हूं!

कुछ नहीं यारों, मैं तो बस दुनियादारी निभा रहा हूं!!

कुछ अपनों ने लूटा हमको,

कुछ गैरों ने सताया..

मौका मिला जिसे भी, उसने

जी-भर हमें रुलाया..

सबपे किया भरोसा, उसकी क़ीमत चुका रहा हूं!

नित सांझ ढले यादों की,

बारात जब आती है..

भर रहे ज़ख्मों को,

फिर से कुरेद जाती है..

मैं दिल के घाव पे तो, मरहम लगा रहा हूं!

उजड़ गया वो…

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Added by जयनित कुमार मेहता on July 29, 2015 at 12:47pm — 3 Comments

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