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कवि - राज बुन्दॆली's Blog (94)

दीवारॊं मॆं चुनॆं जानॆं कॆ बाद,,,,,,,

दीवारॊं मॆं चुनॆं जानॆं कॆ बाद,,,,,,,

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बात समझ मॆं आती है मगर,गुनॆ जानॆ कॆ बाद ।

शेर हल्का नहीं हॊता बारहां, सुनॆ जानॆ कॆ बाद ॥१॥



नाम मिटाये नहीं मिटता चाहॆ आग मॆं जला दॊ,

चनॆ आखिर चनॆ ही रहतॆ हैं, भुनॆ जानॆ कॆ बाद ॥२॥



मगरूरॊ तुम्हारा मिज़ाज, यकीनन बदल जायॆगा,

रुई भी बदल जाती है डंडॆ सॆ, धुनॆ जानॆ कॆ बाद ॥३॥



इज्जत बचाना किसी की इतना आसान नहीं है,

कपड़ा भी बनता है चरखॆ पॆ बुनॆ जानॆ कॆ बाद… Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 16, 2012 at 6:20pm — 2 Comments

मुक्तक

मुक्तक

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हांथों में ले कर ज़ाम रात भर,

बहकते रहे बे-लगाम रात भर,

लतीफ़े उछलते रहे मुशायरे…
Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 13, 2012 at 1:29am — 6 Comments

मत पूंछिये,,,,,,,,

मत पूंछियॆ,,,,,,,,,,

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मतलब की बात करियॆ, बेकार का हाल मत पूछियॆ ॥

जैसी भी है अपनी है, सरकार का हाल मत पूछियॆ ॥१॥



लहराती है नैया, सरकार की तॊ लहरानॆ दीजियॆ,

आप माझी सॆ मगर,पतवार का हाल मत पूछियॆ ॥२॥



चिल्लातॆ चिल्लातॆ अन्ना की तबियत तंग हुई,

अपनॆ भारत मॆं, भ्रष्टाचार का हाल…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 12, 2012 at 5:30pm — 4 Comments

कर दिया,,,,,,,,,,,,,,,,

कलम को तलवार कर दिया,,,,,,,,,,

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सिखाकर आप ने उपकार कर दिया ।

लो हम पे एक और उधार कर दिया ॥१॥



अब उम्र भर न अदा कर पायेंगे हम,

इस कदर आपने कर्जदार कर दिया ॥२॥



ज़माना नीलाम कर देता आबरू मेरी,

वो आप हैं जो कि खबरदार कर दिया ॥३॥…



Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 12, 2012 at 5:00pm — 5 Comments

दहेज़ में,,,,,,,,

हंसना मना है,,,,,,,,



सामान एक से एक, आला दहेज़ में मिला !

बहरी बीबी गूंगा, साला मिला है दहेज़ मॆं !!१!!



एक आंख नकली है,एक टांग सॆ भी लंगड़ा,

है रंग चॊखा भुजंग काला, मिला है दहॆज़ मॆं !!२!!



नागिन कॊ मात दॆती हैं मॆरी तीनॊं सालियां,

ससुरा भी नशॆड़ी मतवाला,मिला है दहॆज़ मॆं !!३!!



मॆज़बानी मॆं पहलॆ दिन, दारू ठर्रा मिली थी,

बिदाई मॆं एक पटियाला, मिला है दहॆज…
Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on December 16, 2011 at 11:00am — 2 Comments

............त्याग बलिदान सॆ.........

............त्याग बलिदान सॆ.........

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कभी त्याग बलिदान सॆ कभी जीवन-मरण सॆ निकलती है !

कविता कलम सॆ नहीं कवि कॆ अंतःकरण सॆ निकलती है !!

कभी बिंदु मॆं समॆट लॆती चराचर संसार यह,

नयन बिन दॆख लॆती है क्षितिज कॆ पार यह,

हवाऒं का रूप धर लिपट जाती वृक्ष कॆ गलॆ,

कभी बूँद बन नीर की पुकारती रसातल तलॆ,

कभी शबनम का रूप धर, यॆ पर्यावरण सॆ निकलती है !!१!!

कविता कलम सॆ… Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 13, 2011 at 3:09pm — 3 Comments

जानॆं किससॆ मिली प्रॆरणा, और...........................

जानॆं किससॆ मिली प्रॆरणा....

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कब मैना मन मुस्कानी है, कब बॊलॆ वह कॊयल कागा !!

जानॆं किससॆ मिली प्रॆरणा, और सृजन का अंकुर जागा !!

शब्द-सुमन चुननॆं मॆं मॆरा,आधा जीवन बीता,

अखिल विश्व का चिंतन,था लगता रीता-रीता,

कभी ढूंढ़ता मॆघदूत मैं,तॊ कभी खॊजता गीता,

मीरा राधा और अहिल्या, कभी द्रॊपदी सीता,

कॆवट और भागीरथ बन कर, क्या-क्या वर मैं मांगा !!१!!

जानॆं किससॆ मिली प्रॆरणा,… Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 13, 2011 at 3:05pm — No Comments

कुण्डलियाँ

चुन-चुनकर भॆजा जिन्हॆं,निकलॆ नमक हराम !

सिसक रही हर झॊपड़ी, मंत्री सब बदनाम !!

मंत्री सब बदनाम, शहद घॊटालॊं की चाटी !

है गंदा इनका खून, नियत गंदी परिपाटी !!

भारत भाग्य विधाता ,भारत की अब सुन !

हॊ परसुराम अवतार, इन्हॆं मारॆ चुन चुन !!

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 6, 2011 at 1:31am — No Comments

कुण्डलियाँ

बापू जब सॆ आपकी,पड़ी नॊट पर छाप !

पड़ॆ-पड़ॆ अब जॆब मॆं,करतॆ रहॊ विलाप !!

करतॆ रहॊ विलाप, तुम बंद तिजॊरी मॆं,

शामिल हॊ गयॆ आप,यहाँ रिश्वतखॊरी मॆं,

सत्य-अहिंसा साधक,हॆ राम नाम कॆ जापू

दॆश हुआ आज़ाद ,क्यूँ बिलख रहॆ हॊ बापू !!

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 6, 2011 at 1:29am — No Comments

कुण्डलियाँ

नॆता खायॆं खीर अरु ,जनता चाटॆ पात !

लॊकतंत्र की छाँव मॆं,अजब निराली बात !!

अजब निराली बात, न अर्थ दिमाग मॆं चढ़तॆ,

है घायल संविधान, अनुच्छॆद संसद मॆं सड़तॆ,

सहनशीलता धन्य लात, गाली, जूतॆ सह लॆता !

निर्लज्ज नमक-हराम भ्रष्ट हैं आज कॆ नॆता !!

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 6, 2011 at 1:27am — No Comments

कुण्डलियाँ

डाला डांका दॆश मॆं ,खुली लूट पर लूट !

पकड़ॆ गयॆ सुयॊग सॆ,आयॆं फ़ौरन छूट !!

आयॆ फ़ौरन छूट,पहुँच इनकी ऊपर की,

बात-बात मॆं खात कसम झूठी रघुबर की,

एक सॆ बढ़कर एक यहाँ नित नया घॊटाला !

अजब लुटॆरॆ मॆरॆ दॆश कॆ,घर मॆं डांका डाला !!

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 6, 2011 at 1:24am — No Comments

कुण्डलियाँ

राम करे गिर जाय सब, नेताऒं पर गाज !
सिसक रही आवाम अब,रुला रही है प्याज !!
रुला रही है प्याज, गगन चूमे यॆ मँहगाई,
सब्जी शक्कर दाल,और कैसॆ मिलॆ दवाई,
जिन्हे चुना संसद दिया, निकले नमक हराम!
तुम्ही बचाऒ देश अब, हॆ सीतापति राम!!

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 6, 2011 at 1:20am — No Comments

तॊ नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है,,,,,,,,,,,,

. नव वर्ष तुम्हारा…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 3, 2011 at 8:46pm — No Comments

श्रृँगार नहीं अंगार लिखूंगा...

कल मैंनॆ भी सोचा था कॊई, श्रृँगारिक गीत लिखूं ,

बावरी मीरा की प्रॆम-तपस्या, राधा की प्रीत लिखूं ,…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 3, 2011 at 8:30pm — 3 Comments

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