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मृत्यु और वर्तमान- लेख

मृत्यु और वर्तमान
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मृत्यु, जीवन की अहर्निश साधना का प्रांजल गंतव्य है और परमाकाश के उदात्त एकांत की प्राप्ति जीवात्मा के नैसर्गिक परिणति का एकमात्र सिद्ध परिणाम। शास्त्रीय सिद्धान्तों की सम्मति में, चाहे वे पुनर्जन्म के चक्र को मान्यता दें या न दें, अनेकानेक मार्ग अन्ततोगत्वा आत्मा को उस अनंत एकांत की ओर ले जाते हैं जहाँ निस्सीम शून्य के वर्तुल प्रभामंडल में जीवन-मृत्यु का चक्र लयबद्ध रूप से अनवरत चलता रहता है। अदम्य शांति का महान एकांत।

हालाँकि प्रकृति का यह सिद्धांत अवश्यम्भावी रूप से सभी जीवों पर लागू होता है पर मनुष्य ने अन्य जीवों को स्वयं के समकक्ष का दर्जा दिया ही कब! वह तो विराट शक्ति के द्वारा प्रदत्त मस्तिष्क के विशिष्ट उपहार को स्वाध्याय से अर्जित अक्षुण्ण रत्न समझ कर प्रकृति में अपने आप को विशेष होने की वंचना पाल बैठा। समय के साथ आदमियत की छाल उतरती चली गयी और उसी अनुपात में मनुष्यता के परिधान का आवरण चढ़ता चला गया। मानवीय परिपेक्ष्य में माया की कलंकित गोद से मोह की मृगमरीचिका का प्रादुर्भाव प्राकृतिक अनुपात से कहीं अधिक उदंडता के साथ हुआ. सामाजिक आर्थिक व्यवस्था का वर्तमान जटिल तंत्र उसी मोह और बौद्धिक लिप्सा का संयुक्त प्रतिफल है। मानव ने स्वयं को स्वयं से ही प्रकृति के संचालक-पद पर आसीन कर दिया और प्रकृति तथा जीव के भौतिक और आध्यात्मिक संबंधों की व्याख्या करने वाले विज्ञान की परिभाषा को प्रकृति के नैसर्गिक संचालन में परिवर्तन करने वाले ज्ञान के रूप में बदल दिया।

बर्बर मनुष्यता के अतृप्त वासनाओं के प्रतिदान में वर्तमान विश्व जब ऐसी विभीषिकाओं से आक्रांत होता जा रहा है जिनके सामने मानवीय मेधा की धार कुंद पड़ती नजर आ रही है क्या आवश्यकता नहीं की हम अपनी चेतना की दिशा को परिवर्तित करें ? यूँ तो मानवीय या प्राकृतिक रूप से नरसंहार का यह वीभत्सक दृश्य नया नहीं है और न ही नयी है ऐसे संहारों की याद को विसर्जित कर आगे बढ़ जाने की मानव प्रवृत्ति। पर इतिहास के उन उदाहरणों की समीक्षा क्या ये नहीं बताती की तमाम प्रयास जो संहार से उबरने के लिए हुए वे लिप्सा के अभीप्सित परिणाम थे और प्रकृति के उन समुचित निर्देशों के अनुपालन की कोशिश नहीं की गयी जो इंगित थे, आवश्यक थे ! हमने बौद्धिक और भौतिक लिप्सा के अनुगमन से तृप्ति की कामना की जबकि लिप्सा और तृप्ति दो ऐसी समानांतर रेखाएँ हैं जिनका अनंत पर मिलन भी किसी एक की समाप्ति के अनिवार्य शर्त पर ही संभव होता है।

आज मानवता की देहरी पर मौत के अनाहूत दूत जुगुप्सित नृत्य में निमग्न हैं। दुनिया भर के संपन्न-विपन्न देशों से आती हृदयविदारक खबरें कलेजा चीर जाती हैं। मृत्यु के बाद का एकांत शांति का महान सुख प्रदान करता होगा पर मौत के पूर्व अंतिम क्षणों में परिवार से दूर का निर्जन एकांत संसार के असीम दुःखों का संकलित प्रभाव उत्पन्न करता है। उस पिता पर उन अंतिम पलों में क्या गुजरता होगा जब वह पुत्र धन से संपन्न होते हुए भी उसके स्पर्श से वंचित ही मर रहा है? हाय रे दुर्दैव कि आज मनुष्यता चयन करने को बाध्य है कि किसे बचाएं और किसे अभिशापित मृत्यु का ग्रास बनने के लिए छोड़ दें। संपृक्ति अभिशाप बन गयी है और गृहवास नियति, हमारे कर्मों के उत्पाद कितने घृणित होते जा रहे हैं ! यदि हम यहाँ से भी नहीं संभले तो यह निश्चित ही है कि ऐसी विपत्तियों की आवृत्ति और प्रभाव बढ़ता ही जायेगा। हमने प्रकृति को यकायक ही विध्वंशित नहीं किया है जो प्रकृति हमें एक झटके में उऋण कर देगी। जब तक हम नहीं थमेंगे न तो ये विनाशलीला रुकेगी और न ही हमारा आर्त-रोदन।

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मोहित मिश्रा

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Mohit mishra (mukt) on April 1, 2020 at 6:55pm
सादर प्रणाम सर
Comment by Samar kabeer on March 31, 2020 at 4:00pm

जनाब मोहित मिश्रा जी आदाब,अच्छा लेख लिखा आपने,बधाई स्वीकार करें ।

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