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आज कल झूठ बोलता हूँ मैं

2122 1212 22

अपना ईमान खो रहा हूँ मैं

आज कल झूठ बोलता हूँ मैं

 

ज़िन्दगी देख भाल करती नहीं

मौत के पास जा रहा हूँ मैं

 

हाल बिखरा हुआ है हिस्सों में

और आगे की सोचता हूँ मैं

 

शाइरी हर्फ़-ए-राएगाँ है तो

किस लिए शे'र लिख रहा हूँ मैं

 

मेरे अंदर जो एक औरत है

उसकी ख़ुशबू से खिल उठा हूँ मैं

 

शाइरी से मिला है रिज़्क़ मुझे

इसलिए लफ़्ज़ फांकता हूँ मैं

 

ध्यान रखने का कह रहे हो तुम

ठीक है फोन काटता हूँ मैं

 

ख़्वाब में सामने खड़े हो तुम

और तस्वीर खींचता हूँ मैं

 

रूपम कुमार -'मीत'

मौलिक एवं अप्रकाशि

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Comment

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Comment by Rupam kumar -'मीत' on May 31, 2020 at 7:58am

 सालिक गणवीर सर ये तो आपकी कृपा है जो मुझे इस मंच के बारे में बताया, अपने ही लिंक दी और मुझे यहाँ पर जोड़ा, इस मंच की खास बात ये है कि यहाँ कोई भी वाह! वाह! नहीं करते और ग़ज़ल में कोई गलती हो तो बताते है, आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ सर्।।। आपका दिन शुभ हो।।

Comment by सालिक गणवीर on May 30, 2020 at 4:59pm

प्रिय रुपम कुमार 

अच्छी ग़ज़ल हुई है. बधाईयां स्वीकार करो.गुरु जनों की इस्लाह पर अमल करते रहें.

मुझे आपमें अपार संभावनाएं दिखती हैं. निरंतर लिखते रहें.

सप्रेम

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on May 30, 2020 at 11:56am

रूपम कुमार जी, शुभ - शुभ। धन्यवाद। 

Comment by Rupam kumar -'मीत' on May 30, 2020 at 8:41am

अमीरुद्दीन खा़न "अमीर सर जी आपकी बात मैं समझ गया, यहाँ पर मैं नया हूँ, बहुत से नियम नहीं मालूम मुझे, इस बालक से कोई गलती हो गई हो तो माफ कर दीजिएगा आपका दिन शुभ हो :)

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on May 29, 2020 at 6:28pm

रूपम कुमार जी, 'हम' कोई नहीं हैं जो किसी का एक मिसरा भी मुकम्मिल करा सकें। मैं भी आपकी तरह तालिब ए इल्म हूँ । और सीख रहा हूंँ। ये सब आपकी महनत और लगन का नतीजा है। जिस पर उस्ताद ए मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब की नज़र पड़ गयी उस की शाइरी ख़ुद ब ख़ुद सँवर जाती है। और हाँ... आप जिस से संवाद करना चाहते हैं उससे उस के नाम या पद नाम के साथ संवाद किया करें, 'आपका शुक्रिया' या 'आप लोगों' जैसे सम्बोधन मुनासिब नहीं। उम्मीद है इसे अन्यथा नहीं लेंगे। 

Comment by Rupam kumar -'मीत' on May 29, 2020 at 10:03am

आपका बहुत शुक्रिया , आप लोगों की वजह से मेरी अधूरी ग़ज़ल मुक्कमल हुई,, आप से निवेदन है की आगे भी मेरी ग़ज़ल इस्लाह कर दीजिएगा मुझे भी सीखना है इस बालक का प्रणाम आपके चरण में!!!!!

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on May 29, 2020 at 9:09am

जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी, उस्ताद मुहतरम की इस्लाह के बाद ग़ज़ल निखर गयी है। वाह... बधाईयाँ ।

Comment by Samar kabeer on May 28, 2020 at 2:43pm

जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'ज़िंदगी देख भाल नईं करती'

इस मिसरे में 'नईं' शब्द उचित नहीं,ये दकनी उर्दू का शब्द है,मिसरा यूँ कर सकते हैं:-

'ज़िन्दगी देख भाल करती नहीं'

'शायरी हर्फ़-ए-राएगानी है'

इस मिसरे में 'राएगानी' शब्द उचित नहीं,और 'शायरी' 

को हमेशा "शाइरी" लिखना उचित होता है,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'शाइरी हर्फ़-ए-राएगाँ है तो'

'शायरी से मिली है रिज़्क़ मुझे'

इस मिसरे में 'रिज़्क़' शब्द पुल्लिंग है,मिसरा यूँ कर सकते हैं:-

'शाइरी से मिला है रिज़्क़ मुझे'

'ख़्वाब में सामने खड़ी हो तुम'

उर्दू शाइरी में महबूब को स्त्रीलिंग नहीं लेते,इसलिए 'खड़ी हो तुम' की जगह "खड़े हो तुम" लिखना उचित होगा ।

बाक़ी शुभ शुभ ।

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