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अतुकांत कविता : निर्लज्ज (गणेश बाग़ी)

अतुकांत कविता : निर्लज्ज

=================

उसने कहा,

मेरे पास गाड़ी है, बंगला है

बैंक बैलेंस है

तुम्हारे पास क्या है ?

मैने कहा,

मेरे पास हैं...

फेसबुकिये दोस्त

जो नियमित भेजते रहते हैं

गुड मॉर्निंग, गुड इवनिंग,

गुड नाईट, स्वीट ड्रीम वाले संदेश

उसने कहा,

मूर्ख हो तुम

निपट अज्ञानी हो

मैंने कहा,

हाँ, हो सकता है मैं हूँ

किंतु...

सक्रिय हो जाती है छठी इंद्रीय

जब…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 6, 2020 at 12:30pm — 2 Comments

जुबान इतनी तेरी दोस्त आतिशीं मत रख (८१ )

(1212 1122 1212 22 /112 )

जुबान इतनी तेरी दोस्त आतिशीं मत रख

कि जिसमें मार* पले ऐसी आस्तीं मत रख (*सॉंप )

**

मैं तज़र्बें की बिना पर ये बात कहता हूँ

बहुत दिनों के लिए कोई दिलनशीं मत रख

**

सजाने ज़ुल्फ़ को कुछ देर यासमीं काफ़ी

तवील वक़्त की ख़ातिर तू यासमीं*मत रख 

**

फिसलते दस्त हैं जब हमकिनार करता हूँ 

क़बा पहन के नई यार रेशमीं मत रख

**…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 5, 2020 at 5:30pm — 2 Comments

मीठे दोहे :

मीठे दोहे :

चौखट से बाहर नहीं, रखना अपने पाँव।

घर के अंदर स्वर्ग से, सुंदर अपना गाँव।।

घर के अंदर स्वर्ग से, सुंदर अपना गाँव।

मीठे रिश्तों की यहाँ, मीठी लगती छाँव।।

मीठे रिश्तों की यहां,मीठी लगती छाँव।

बार-बार मिलती नहीं,ऐसी मीठी ठाँव।।

बार बार मिलती नहीं, ऐसी मीठी ठाँव।

अंतस की दूरी मिटे, नफ़रत हारे दाँव।।

अंतस की दूरी मिटे, नफ़रत हारे दाँव।

घर के अंदर स्वर्ग से, सुंदर अपना…

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Added by Sushil Sarna on April 4, 2020 at 4:54pm — 4 Comments

मृदु-भाव

मृदु-भाव

प्रात की शीतल शान्त वेला

हवा की लहर-सी तुम्हारी मेरे प्रति

मृदु मोह-ममता

मैं बैठा सोचता मेरे अन्तर में अटका

कोलाहल था बहुत

क्यूँ किस वातायन से किस द्वार से कैसे

चुपके से आकर मेरे जीवन में

घोल दिए सरलता से तुमने मुझमें

प्रणय के पावन गीत

किसी सपने की मधुरिमा-सी

सच, प्यारी है मुझको तुम्हारी यह प्रीत

नए प्यार के नवजात गीत की नई प्रात

तुम आई,…

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Added by vijay nikore on April 4, 2020 at 4:31pm — 4 Comments

ग़रीब हूँ मैं मगर शौक इक नवाबी है(८०)

(1212 1122 1212 22 /112 )

ग़रीब हूँ मैं मगर शौक इक नवाबी है

ख़िज़ाँ की उम्र में भी दिल मेरा गुलाबी है

**

अधूरा काम कोई छोड़ना नहीं आता

कि मुझ में बचपने से एक ये ख़राबी है

**

मेरे लिए ही सनम क्यों हया का है…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 4, 2020 at 12:30pm — 8 Comments

कोरोना

नहीं हमारी नहीं तुम्हारी

अखिल विश्व में महा-बिमारी

आई पैर पसार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

निकल चीन से पूर्ण जगत में डाल दिया है डेरा

यह विषाणु से जनित बिमारी, खतरनाक है घेरा

रहो घरों में रहो अकेले

नहीं लगाओ जमघट मेले

कहती है सरकार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

नहीं आम यह सर्दी-खाँसी इसका नाम कोरोना

नहीं दवाई इसकी, होने पर केवल है रोना

इसीलिए मत घर से निकलो

धीर धरो पतझड़ से निकलो

मानो…

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Added by आशीष यादव on April 4, 2020 at 11:33am — 2 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

1222   1222   122

यूँ तुझपे हक़ मेरा कुछ भी नहीं है

मगर दिल भूलता कुछ भी नहीं है

तेरी बातें भी सारी याद है पर

कहा तेरा हुआ कुछ भी नहीं है

तेरी आंखों में है गर कोई मंजिल

तो फिर ये रास्ता कुछ भी नहीं है

ग़ज़ल अपनी कलम से खुद ही निकली

तसल्ली से लिखा कुछ भी नहीं है

मेरा अफसाना जो तुम पढ़ रहे हो

ये कुछ लायक है या कुछ भी नहीं है

नज़र जिसमें तेरी…

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Added by मनोज अहसास on April 4, 2020 at 12:30am — 2 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

1222    1222      1222       1222

कोई कातिल सुना जो  शहर में है बेजुबाँ आया

किसी भी भीड़ में छुप कर मिटाने गुलिस्तां आया

 

धरा रह जायेगा  इन्सान का हथियार हर कोई 

हरा सकता नहीं कोई वह होकर खुशगुमां आया

 

घरों में कैद होकर रह गए हैं सब के सब इंसाँ

करें कैसे मदद अपनों की कैसा इम्तिहाँ आया

 

अवाम अपने को आफत से बचाने में हुकूमत को

अडंगा दीं लगाए कैसा यह दौर-ए-जहाँ आया

 

अगर महफूज रखना है  बला…

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Added by कंवर करतार on April 3, 2020 at 6:00pm — 6 Comments

एक पंथ दो काज - लघुकथा -

एक पंथ दो काज - लघुकथा -

"हल्लो, मिश्रा जी, गुप्ता बोल रहा हूँ।"

"अरे यार नाम बताने की आवश्यकता नहीं है।मेरे मोबाइल में आपका नाम आ गया। बोलो सुबह सुबह कैसे याद किया?"

"आज आपकी थोड़ी मदद चाहिये।"

"कैसी बात करते हो मित्र।आपके लिये तो आधी रात को तैयार हैं।हुकम करो।"

"अरे भाई आज राम नवमी है।कुछ बच्चे बच्चियों को जिमाना है।मैडम का आदेश हुआ कि सोसाइटी में से अपने दोस्तों के बच्चे बुलालो।"

"ये तो बहुत टेढ़ा मामला है।लॉक डाउन का सरकारी आदेश है।उसकी अवहेलना तो…

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Added by TEJ VEER SINGH on April 3, 2020 at 5:55pm — 6 Comments

समय :

समय :

न जाने किस अँधेरे की जेब में

सिमट जाता है समय

न जाने कब उजालों के शिखर पर

कहकहे लगाता है समय

अंतहीन होती है समय की सड़क 

बिना पैरों का ये पथिक

अपने काँधों पर ढोता है सदा

कल, आज और कल की परतों में

साँस लेते लम्हों की अनगिनित दास्तानें

और नुकीली सुईयों के पाँव के नीचे रौंदे गए

आफ़ताबी अरमानों के बेनूर आसमान



क्षणों की माल धारण किये

उन्नत भाल का ये आहटहीन अश्व

सृष्टि चक्र का वो वाहक है…

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Added by Sushil Sarna on April 3, 2020 at 3:00pm — 4 Comments

क्षणिकाएँ :

क्षणिकाएँ :

क्या ख़बर
हम फिर
मिलें न मिलें
मगर
छोड़ जाऊँगा मैं
समय के भाल पर
हमारे मिलन की गवाह

परछाईयाँ
काँपते चाँद की

.............................

झुलसे हुए होठों पर
रुक गया
फिसल कर
एक अश्क
बेवफ़ाई का

....................

खाली घड़ा
सूखी रोटी
टूटे छप्परों से झाँकती
झूठी आस की
धवल चाँदनी


सुशील सरना /2.4.20
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 2, 2020 at 5:20pm — 4 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

1

गर्म अफ़वाहों का बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे

बिक रहा झूठ का अख़बार ख़ुदा ख़ैर करे

2

चार सिक्कों की ख़नक जेब में क्या होने लगी

हो गए हम भी तलबगार ख़ुदा ख़ैर करे

3

शांत लहरों में भी कश़्ती को सहारा न मिला

डूबी मँझधार में पतवार ख़ुदा ख़ैर करे

4

इश़्क था या कि अज़ीयत ओ फ़ज़ीहत का सफर

है अलम दिल का पुर आज़ार ख़ुदा ख़ैर करे



बाँध रक्खा है किनारों ने संमदर ऐसे

रुक गई लहरों की रफ़्तार ख़ुदा ख़ैर… Continue

Added by Rachna Bhatia on April 2, 2020 at 1:31pm — 4 Comments

"ओबीओ की सालगिरह का तुहफ़ा"

2122 2122 212

.

देख साँसों में बसा है ओ बी ओ

मेरी क़िस्मत में लिखा है ओ बी ओ




कितने आए और कितने ही गए

शान से अब तक खड़ा है ओ बी ओ




बढ़ गई तौक़ीर मेरी और भी

तू मुझे जब से मिला है ओ बी ओ




हों वो 'बाग़ी' या कि भाई 'योगराज'

तू सभी का लाडला है ओ बी ओ



भाई 'सौरभ' शान से कहते…

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Added by Samar kabeer on April 1, 2020 at 9:00pm — 18 Comments

अंतस के हिम निर्झर से जब भाव पिघलने लगते है|(७९ )

अंतस के हिम निर्झर से जब

भाव पिघलने लगते है|

गीतों में ढलने को मेरे

शब्द मचलने लगते हैं ॥

***

लेखन आता नहीं मुझे पर लिखता हृद उद्गारों को |

और बुझा लेता हूँ लिखकर हिय तल के अंगारों को |

कहाँ निभा पाता हूँ अक्सर मैं छंदो का अनुशासन

अलंकार-से भूल गया हूँ शब्दों के श्रृंगारों को |

भाषा शुद्ध न हुई भले ही

लय सुर ताल रहे बाक़ी

बिम्ब-प्रतीक सृजन से जब…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 1, 2020 at 8:00pm — 4 Comments

कोरोना पर कुछ दोहे :

कोरोना पर कुछ  दोहे :
वृत कोरोना का नहीं, इतना भी आसान।
रहना निज आवास में, है मात्र समाधान।।
कोरोना के काल से, हुआ विश्व…
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Added by Sushil Sarna on April 1, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

गजल(शोर हवाओं....)

22 22 22 22

शोर हवाओं ने बरपाए,

घाव हरे होने को आए।1

बंटवारे का दर्द सुना,अब

देख कलेजा मुंह को धाए।2

रोजी खातिर परदेश गए

घर भागे सब,धक्के खाए।3

आफत ऐसी आई उड़कर

सबने अपने रंग दिखाए।4

बबुआ भैया जो कहते थे,

सबने फिर से हाथ उठाए।5

बांट रहे कुछ मुंह की रबड़ी

खाने को भूखे ललचाए।6

तीर कमान चढ़ाए चलते

दोमुख सबको कौन बताए?7

मांग बना जो राजा,बैठा

दाता लाठी -…

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Added by Manan Kumar singh on April 1, 2020 at 1:20pm — 4 Comments

यक़ीं के साथ तेरा सब्र इम्तिहाँ पर है(७८)

(1212 1122 1212  22 /112 )

यक़ीं के साथ तेरा सब्र इम्तिहाँ पर है

हयात जैसे बशर लग रही सिनाँ पर है

**

हमारा मुल्क परेशान और ख़ौफ़ में है

सुकून-ओ-चैन की अब जुस्तजू यहाँ पर है

**

वजूद अपना बचाने में अब लगा है बशर

न जाने आज ख़ुदा छुप गया कहाँ पर है

**

बचेगा क़ह्र से कोविड के आज कैसे भला 

बशर पे ज़ुल्म-ओ-सितम उसका आसमाँ पर है

**

वहाँ की प्यास भला दूर क्या करे…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 1, 2020 at 1:00pm — 7 Comments

एक ग़ज़ल

सुन  रहे  हैं  कि  वो  इक ऐसी दवाई देगा

जिससे  अंधे  को भी रातों में दिखाई देगा



प्यार  से  उसने  बुलाया है मुझे मक़्तल में

जानता हूँ   मैं जो  दावत   में  क़साई देगा



ऐसे चिल्लाओ कि आवाज़ वहाँ तक जाए

एक  दिन  तो  सभी  बहरों को सुनाई देगा



पास  रहता  हूँ  तो मुंह फेर के चल देता है

दूर  जाऊँगा  तो   आने   की   दुहाई  देगा



क़ैदख़ाने   में  उसी  ने  ही रखा सालों तक

जिसने   उम्मीद  जताई   थी   रिहाई  देगा



घुप   अंधेरे  से …

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Added by सालिक गणवीर on April 1, 2020 at 12:00pm — 5 Comments

धूप छाँह होने वाले

तमाम उम्र लगे रहे शहर शहर हो जाने में 
क्यों गांव गांव आज फिर होने लगी है ज़िंदगी …
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Added by amita tiwari on April 1, 2020 at 1:30am — 1 Comment

ग़ज़ल

मुल्क़ है ख़ुशहाल बतलाती रही मुझको हँसी

नित नये किस्सों से भरमाती रही मुझको हँसी

गफ़लतों में झूमते थे छुप गया है सूर्य अब

बादलों की सोच पर आती रही मुझको हँसी

मौत आगे लोग पीछे, था सड़क पर क़ाफ़िला

क़ाफ़िले का अर्थ समझाती रही मुझको हँसी

देखकर मायूस बचपन और सहमी औरतें

चुप्पियाँ हर ओर शरमाती रही मुझको हँसी

गालियों के संग अब तो मिल रहीं हैं लाठियाँ

मौत सच या भूख उलझाती रही मुझको हँसी

अब करोना क़हर…

Continue

Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on March 31, 2020 at 8:00pm — 2 Comments

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