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Khursheed khairadi's Blog – February 2015 Archive (9)

गीतिका ... ८+८+६ २२-२२-२२-२२-२२-२

आहत युग का दर्द चुराने आया हूं

बेकल जग को गीत सुनाने आया हूं

 

कोमल करुणा भूल गये पाषाण हुये

दिल में सोये देव जगाने आया हूं

 

आँगन आँगन वृक्ष उजाले का पनपे

दहली दहली दीप जलाने आया हूं

 

ग़ालिब तुलसी मीर कबीरा का वंशज

मैं भी अपना दौर सजाने आया हूं

 

दिल्ली बतला गाँव अभावों में क्यूं है

नीयत पर फिर प्रश्न उठाने आया हूं

 

सिस्टम इतना भ्रष्ट हुआ, जिंदा होकर

इसके दस्तावेज़ जुटाने आया…

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Added by khursheed khairadi on February 26, 2015 at 10:09am — 11 Comments

ग़ज़ल--१२२२--१२२२--१२२२--१२२२...मुझे मालूम है यारों

मेरा देहात क्यूँ रोटी से भी महरूम है यारों

कहाँ अटका है रिज़्के-हक़ मुझे मालूम है यारों

 

उठा पेमेंट उसका क्यूँ नरेगा की मज़ूरी से

घसीटाराम तो दो साल से मरहूम है यारों

करें किससे शिकायत हम , कहाँ जायें गिला लेकर

व्यवस्था हो गई ज़ालिम बशर मज़लूम है यारों

सिखाओ मत इसे बातें सियासत की विषैली तुम

मेरा देहात का दिल तो बड़ा मासूम है यारों

लिए फिरता है वो कानून अपनी जेब में हरदम

जो कायम कायदों पर है बशर वो बूम…

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Added by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 12:49pm — 22 Comments

ग़ज़ल--122--122 / 122 --122 चमन की कहानी

कहूँ आपसे क्या थकन की कहानी

न समझोगे गाफ़िल बदन की कहानी

 

बनाती है ज़र्रे को रोशन सितारा

लुभाती बहुत है लगन की कहानी

 

समझ लो य’ अश्कों का सावन निरख कर

लबों से कहूँ क्या नयन की कहानी

 

जली उँगलियों से ज़रा पूछ आओ

कहेंगे फफोले हवन की कहानी

 

हर इक गम को ढाला ग़ज़ल में मुसल्सल

है झूठी अदीबों ग़बन की कहानी

 

सुनाते मिलेंगे चहकते चहकते

कफ़स में परिंदे चमन की कहानी

 

किरन दर…

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Added by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 11:00am — 8 Comments

ग़ज़ल---१२-२२ १२-२२ १२-२२ आ रहा है अब

ग़ज़ल में दर्द ढल कर आ रहा है अब

कोई दरिया मचल कर आ रहा है अब

 

बड़े साहब ने इक साँचा बनाया है

जिसे देखो पिघल कर आ रहा है अब

 

ज़रा सा होश खोते ही हुआ जादू

जुबां पर सच निकल कर आ रहा है अब

 

चलो अच्छा हुआ जो ठोकरें खायी

गिरा लेकिन सँभल कर आ रहा है अब

 

बनाया मोम से पत्थर जिसे मैंने

मेरी जानिब उछल कर आ रहा है अब

 

गरज़ ढुलते ही रस्ता हो गया चिकना

मेरे घर वो फिसल कर आ रहा है…

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Added by khursheed khairadi on February 23, 2015 at 10:23am — 21 Comments

गीतिका .....8 + 8---निगाहें

आँज गगन का नील निगाहें

लगती गहरी झील  निगाहें

 

माँस बदन पर दिख जाये तो

बन जाती है चील निगाहें

 

आन टिकी है मुझ पर सबकी

चुभती पैनी कील निगाहें

 

बंद गली के उस नुक्कड़ पर

करती है क्या डील निगाहें

 

इक पल में तय कर लेती है

यार हज़ारों मील निगाहें

 

बाँध सकेगा मन क्या इनको

देती मन को ढील निगाहें

 

दिखने दे ‘खुरशीद’ नज़ारे

किरणों से मत छील निगाहें 

मौलिक व…

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Added by khursheed khairadi on February 18, 2015 at 3:30pm — 18 Comments

गीतिका --8+8+8 .....फिर आऊँगा

मातृधरा को शीश नवाने फिर आऊँगा

जननी तेरा कर्ज़ चुकाने फिर आऊँगा

 

चंदन जैसी महक रही है जो साँसों में

उस माटी से तिलक लगाने फिर आऊँगा

 

आँसू पीकर खार जमा जिनके सीनों में

उन खेतों में धान उगाने फिर आऊँगा

 

इक दिन तजकर परदेशों का बेगानापन

आखिर अपने ठौर ठिकाने फिर आऊँगा

 

गोपालों के हँसी ठहाके यादों में हैं

चौपालों की शाम सजाने फिर आऊँगा

 

खाट मूँज की छाँव नीम की थका हुआ तन

जेठ दुपहरी…

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Added by khursheed khairadi on February 11, 2015 at 11:29am — 24 Comments

ग़ज़ल --बहारों में

२१२२ — १२१२ — ११२(२२)

खिल रहे हैं सुमन बहारों में

झूमता है पवन बहारों में

 

ओढ़कर फागुनी चुनर देखो

सज गया है चमन बहारों में

 

आइने की तरह चमकता है

निखरा निखरा गगन बहारों में

 

यूँ तो संजीदा हूं बहुत यारों

हो गया शोख़ मन बहारों में

 

देखते हैं खिलाता है क्या गुल

आपका आगमन बहारों में

 

हो धनुष कामदेव का जैसे

तेरे तीखे नयन बहारों में

 

घुल गई है फिज़ा में मदिरा…

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Added by khursheed khairadi on February 7, 2015 at 12:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल :फ़क़ीरों को डराओ मत

1222-1222-1222-1222

दिखाकर तुम हथेली की लकीरों को डराओ मत

रियाज़त से बदल देंगे नसीबों को डराओ मत               रियाज़त=परिश्रम

 

तबस्सुम के दिये की लौ गला देगी हर इक ज़ंजीर

शब-ए-गम की तवालत से असीरों को डराओ मत            तवालत=लम्बाई, असीर=कैदी

                                                  

ये जन्नत की हक़ीक़त भी बख़ूबी जानते हैं जी

दिखाकर डर जहन्नुम का ग़रीबों को डराओ मत

 

मज़ा आने लगा है अब सभी को दर्द-ए-उल्फ़त…

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Added by khursheed khairadi on February 5, 2015 at 1:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल - छोड़ देते हैं

1222--1222--1222--1222

ख़ला की गोद में लाकर हमेशा छोड़ देते हैं

तसव्वुर के परिंदे साथ मेरा छोड़ देते हैं

 

अँधेरी रात हमने तो ब मुश्किल काट ली यारों

तुम्हारे वास्ते उजला सवेरा छोड़ देते हैं

 

ग़मों का साथ हमने तो निभाया है वहाँ तक भी

जहाँ अच्छे से अच्छे भी कलेजा छोड़ देते हैं

 

हमारा नाम लेकर अब न रुसवाई तेरी होगी

मुसफ़िर हम तो ठहरे शह्र तेरा छोड़ देते हैं

 

लड़कपन में जिन्हेँ चलना सिखाया थामकर…

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Added by khursheed khairadi on February 2, 2015 at 10:30am — 18 Comments

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