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बृजेश नीरज's Blog – March 2013 Archive (13)

गज़ल/ देह जलती है

शाम सी जिंदगी गुजरती है

रात कितनी करीब लगती है

 

याद नित पैरहन बदलती है

ये शमा बूंद बन पिघलती है

 

आंत महसूस अब नहीं करती

भूख पर आंख से झलकती है…

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Added by बृजेश नीरज on March 28, 2013 at 7:19pm — 14 Comments

लघुकथा ­- चमेली

मंच के सामने आठ दस लोग कुर्सियों पर बैठे थे। सफेद झक कुर्ता पायजामा पहने छरहरे बदन का एक युवक मंच पर खड़ा भाषण दे रहा था, ‘आज हमारे देश को भगत सिंह के आदर्शों की जरूरत है……..।‘ भाषण खत्म होने पर संचालक ने घोषणा की, ‘थोड़ी ही देर में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारम्भ होंगे।‘

कुछ देर बाद एक युवती रंग बिरंगी वेशभूषा में मंच पर आयी और उसने एक गीत पर नृत्य आरंभ कर दिया ‘……चिकनी चमेली……’

भीड़ धीरे…

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Added by बृजेश नीरज on March 25, 2013 at 10:00am — 32 Comments

गज़ल/ अनजान रहा अक्सर

दीदार का बस तेरे अरमान रहा अक्सर

इस प्यार से तू मेरे अनजान रहा अक्सर

 

बाजार में दुनिया के हर चीज तो मिलती है

तेरे हबीबों में भी धनवान रहा अक्सर

 

जिस वक्त दुनिया में था घनघोर कहर बरपा

उस…

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Added by बृजेश नीरज on March 22, 2013 at 11:29am — 12 Comments

हाइकू/ बसंत

1

ऋतु बसंत

उत्सव व उल्लास

मन अनंत।

 

2

अबीर मला

क्लेष की आहुति हो

गुलाल उड़ा।…

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Added by बृजेश नीरज on March 21, 2013 at 6:30pm — 10 Comments

ग़जल/ पिघल गया होगा

जब जिक्र मेरा हुआ होगा

वो कुछ पिघल तो गया होगा

 

जी भर तुझे देख ही लेता

ओझल कहीं हो गया होगा

 

अब सांस भर जी नहीं सकते

इस शहर में कुछ धुंआ होगा…

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Added by बृजेश नीरज on March 19, 2013 at 8:02pm — 12 Comments

राज गहरे कई

ये फिजाएं खोलती हैं राज गहरे कई

इस कली में बंद हैं नादान भौंरे कई

 

हम तो आशिक हैं हमारा क्या बहल जाएंगे

आपके दामन पे हैं ये दाग गहरे कई

 

देर तक खामोश सी रोती रही जिंदगी

छूटते हैं जो यहां…

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Added by बृजेश नीरज on March 14, 2013 at 10:00pm — 6 Comments

नज़्म/ कुछ आराम हो

धीरे धीरे शाम उतर आयी

धरती पर

मेरा इंतजार अभी भी बरकरार है

कि कब तेरा दीदार हो

और मेरी सुब्ह हो

 

तेरा जज्ब ए अमजद

या चाहत का असर

ओढ़ता बिछाता हूं…

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Added by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 11:15pm — 5 Comments

अटक गया विचार

माथे पर सलवटें;

 

आसमान पर जैसे

बादल का टुकड़ा थम गया हो;

समुद्र में

लहरें चलते रूक गयीं हों,

 

कोई ख्याल आकर अटक गया।

 …

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Added by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 7:17am — 18 Comments

याद तेरी

ये बहारें ये फिजा सौगात तेरी आ गयी है

चांद ने घूंघट उतारा बात तेरी आ गयी है

 

याद आई, तू न आया, क्या गिला करना किसी से

रात भर आंसू बहाएं बात तेरी आ गयी है

 

इन घटाओं ने न जाने कौन सा जादू किया जो…

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Added by बृजेश नीरज on March 11, 2013 at 10:18pm — 11 Comments

क्षणिकाएं

कुम्हार

 

रूप दे दो

इधर उधर बिखरी हुई है

ये मिट्टी

रौंद रहे हैं लोग

रंग काला पड़ने लगा

कुछ कीड़े भी पनपने लगे

 …

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Added by बृजेश नीरज on March 7, 2013 at 8:10pm — 18 Comments

हाइकु कविता

पथ के कांटे

तेरी एक छुअन

नया साहस।

   -----

 

ओस की बूंदें

हवा की शीतलता

तेरी छुअन।

   -----

 …

Continue

Added by बृजेश नीरज on March 3, 2013 at 6:32pm — 18 Comments

चौपाई

जय अम्बे जय मातु भवानी

जय जननी जय जगकल्यानी

जय बगुला जय विन्ध्यवासिनी

जय वैष्णव जय सिंहवाहिनी

 

कण कण में है वास तिहारा

तुम जग की हो पालनहारा

करूणा की हो सागर माता…

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Added by बृजेश नीरज on March 3, 2013 at 10:32am — 13 Comments

दोहे

देख धनी बलवान के, चिकने चिकने पात।

दुखिया दीन गरीब के, खुरदुर चिटके पात।।

दुखिया सब संसार है, सुख ढूंढन को जाय।

दूजों का जो दुख हरे, सुख खुद चल के आय।।

अपना कष्ट बिसारि के, औरों की सुधि लेय।

नहीं रीति ऐसी रही, अपनी अपनी खेय।।…

Continue

Added by बृजेश नीरज on March 3, 2013 at 9:00am — 17 Comments

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