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Featured Blog Posts – August 2014 Archive (10)


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दर सारे दीवार हो गए ( गीत ) गिरिराज भंडारी

दर सारे दीवार हो गए

**********************

सारी खिड़की बंद लगीं अब 

दर सारे दीवार हो गये

 

भौतिकता की अति चाहत में

सब सिमटे अपने अपने में

खिंची लकीरें हर आँगन में  

हर घर देखो , चार हो गये

 

सारी खिड़की बंद लगीं अब 

दर सारे दीवार हो गए

 

पुत्र कमाता है विदेश में

पुत्री तो ससुराल हो गयी

सब तन्हा कोने कोने में

तनहा सब त्यौहार हो गए

 

सारी खिड़की बंद लगीं अब 

दर सारे…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 25, 2014 at 8:30pm — 34 Comments

ग़ज़ल ..तालीम-ओ-तरबीयत ने यूँ ख़ुद्दार कर दिया

गागा लगा लगा /लल /गागा लगा लगा 



तालीम-ओ-तरबीयत ने यूँ ख़ुद्दार कर दिया,

चलने से राह-ए-कुफ़्र पे इनकार कर दिया.

.

मै ज़ीस्त के सफर में गलत मोड़ जब मुड़ा,

मेरी ख़ुदी ने मुझको ख़बरदार कर दिया.

.

इज़हार-ए-इश्क़ में वो नज़ाकत नहीं रही, …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on August 25, 2014 at 6:00pm — 33 Comments

खुद का भी अहसास लिखो

खुद का भी अहसास लिखो!
एक मुकम्मल प्यास लिखो!!

उससे इतनी दूरी क्यों !
उसको खुद के पास लिखो !!

खाली गर बैठे हो तुम!
खुद का ही इतिहास लिखो !!

 गलती उसकी बतलाना !
खुद का भी उपहास लिखो!!

हे ईश्वर ऊब गया हूँ!
मेरा भी अवकाश लिखो!!
***************************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित
 

Added by ram shiromani pathak on August 24, 2014 at 1:11am — 28 Comments

चार ग़ज़लें (डॉ. राकेश जोशी)

(चार ग़ज़लें)

1

रास्तों को देखिए कुछ हो गया है आजकल

इस शहर में आदमी फिर खो गया है आजकल

 

काँपते मौसम को किसने छू लिया है प्यार से

इस हवा का मन समंदर हो गया है आजकल

 

अजनबी-सी आहटें सुनने लगे हैं लोग सब

मन में सपने आके कोई बो गया है आजकल

 

मुद्दतों तक आईने के सामने था जो खड़ा

वो आदमी अब ढूँढने खुद को गया है आजकल

 

आदमी जो था धड़कता पर्वतों के दिल में अब

झील के मन में सिमटकर सो…

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Added by Dr. Rakesh Joshi on August 16, 2014 at 6:00pm — 37 Comments

"पुष्प हरसिंगार का "

"गीत"

_____

श्याम घन नभ सोहते ज्योँ ग्वाल दल घनश्याम का ।

चंचला यमुना किनारे नृत्य रत ज्योँ राधिका ||



आ रहे महबूब मेरे

दिल कहे श्रृँगार कर ।

द्वार पर कलियाँ बिछा कर

बावरी सत्कार कर ।

प्यार पर सब वार कर

-दुल्हन सदृश अभिसार कर ।

अब गले लग प्राण प्रिय से

डर भला किस बात का |

श्याम घन नभ सोहते ज्योँ ग्वाल दल घनश्याम का ।

चंचला यमुना किनारे नृत्य रत ज्योँ राधिका ||

चाहती पलकें भी बिछना…

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Added by Chhaya Shukla on August 10, 2014 at 8:30pm — 29 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
राखी (लघु कथा )

“भाभी, अगर कल तक मेरी राखी की पोस्ट आप तक नहीं पँहुची तो परसों मैं आपके यहाँ आ रही हूँ  भैया से कह देना ” कह कर रीना ने फोन रख दिया|

अगले दिन भाभी ने सुबह ११ बजे ही फोन करके कहा, "रीना राखी पहुँच गई है ”

"पर भाभी मैंने तो इस बार राखी पोस्ट ही नहीं की थी !!! "


(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by rajesh kumari on August 9, 2014 at 8:30pm — 58 Comments

हाइकु

मेरे शहर का मौसम !

============
बूँद बरखा 
हरियाला मौसम 
सजा के रखा 
****
आँख झपकी 
घनघोर घटायें 
बूँद टपकी 
****
झूमते पत्ते 
नाचते तरुवर 
घनों के छत्ते 
****
रसिक मन 
भीगने को आतुर 
तन -बदन 
========
@अविनाश बागडे 

Added by AVINASH S BAGDE on August 5, 2014 at 3:30pm — 19 Comments

कुक्कुर

" बाऊ , आज त पेट भर खाए के मिली न " लखुआ बहुत खुश था । आज ठकुराने में एक शादी थी और लखुआ का पूरा परिवार पहुँच गया था । पूरा दुआर बिजली बत्ती से जगमग कर रहा था और चारो तरफ पकवानों की सुगंध फैली हुई थी ।

" दुर , दुर , अरे भगावा ए कुक्कुर के इहाँ से " , चच्चा चिल्लाये और दो तीन आदमी कुत्ते को भगाने दौड़ पड़े । लखुआ भी डर के किनारे दुबक गया । तब तक उन लोगों की नज़र पड़ गयी इन पर " ऐ , चल भाग इहाँ से , अबहीं त घराती , बराती खईहैं , बाद में एहर अईहा तू लोगन " । फिर याद आया कि पत्तल भी तो उठवाना…

Continue

Added by विनय कुमार on August 3, 2014 at 3:34am — 28 Comments

नवगीत : जैसे कोई नन्हा बच्चा छूता है पानी

मेरी नज़रें तुमको छूतीं

जैसे कोई नन्हा बच्चा

छूता है पानी

 

रंग रूप से मुग्ध हुआ मन

सोच रहा है कितना अद्भुत

रेशम जैसा तन है

जो तुमको छूकर उड़ती हैं

कितना मादक उन प्रकाश की

बूँदों का यौवन है

 

रूप नदी में छप छप करते

चंचल मन को सूझ रही है

केवल शैतानी

 

पोथी पढ़कर सुख की दुख की

धीरे धीरे मन का बच्चा

ज्ञानी हो जाएगा

तन का आधे से भी ज्यादा

हिस्सा होता केवल…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 2, 2014 at 8:58pm — 26 Comments

ग़ज़ल

मालूम है कि सांप पिटारे में बंद है
फिर भी वॊ डर रहा है क्यूँ कि अक्लमंद है

.

ये रंग रूप, नखरे,अदा तौरे गुफ्तगू
तेरी हरेक बात ही मुझको पसंद है

.

ये दिल भी एक लय में धड़कता है दोस्तो
सांसो का आना जाना भी क्या खूब छंद है

.

सोचा था चंद पल में ही छू लूँगा बाम को
पर हश्र ये है हाथ में टूटी कमंद है

.

दुश्वारियों से जूझते गुजरी है ज़िन्दगी
अज्ञात फिर भी हौसला अपना बुलंद है

.

मौलिक एवं अप्रकाशित.

Added by Ajay Agyat on August 1, 2014 at 8:30pm — 10 Comments

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