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रमेश कुमार चौहान's Blog – September 2013 Archive (9)

चुनावी हाइकू

1.

भ्रष्ट नेता रे,
लालची मतदाता,
लोकतंत्र है ?

2.

पढ़े लिखे हो ?
डाले हो कभी वोट ?
क्यो देते दोष ??

3.

देख लो भाई,
कौन नेता चिटर ?
तुम वोटर ।

4.

तुम हो कौन ?
सरकार है कौन  ?
जनता मौन ।

5.

क्या मानते हो ?
ये देश तुम्हारा है ।
मौन क्यों भाई ??

.
...........‘‘रमेश‘‘............
मोलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 27, 2013 at 11:00am — 11 Comments

नेता स्वार्थ के अपने (कुंड़ली)

नेता स्वार्थ के अपने, बदल रहे संविधान ।

करने दो जो चाहते, डालो न व्यवधान ।।

डालो न व्यवधान, है अभी उनकी बारी ।

लक्ष्य पर रखो ध्यान, करो अपनी तैयारी ।।

बगुला बाट जोहे, बैठे नदी तट रेता ।

शिकारी बन बैठो, शिकार हो ऐसे नेता ।।

.............................................

मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 24, 2013 at 10:49pm — 11 Comments

मत्तगयंद (मालती) सवैया

प्रेम दुलार जगावत मानवता मन भावत भारत प्यारा ।
गीत खुशी सब गावत नाचत मंगल थाल सजावत न्यारा ।
बंधु सभी मिल बैठ करे नित चिंतन सुंदर हो जग प्यारा ।
ये सपना मन भावन देख ‘‘रमेश‘‘ खुशी मन गावत न्यारा ।
.........................................................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 24, 2013 at 10:34am — 8 Comments

सवैया

मोर दशा वह देखत सोचत अविरल प्रेम अश्रु जल ढारे ।
पागल जो बन घूम रहा दर बे दर प्यार छुपा मन मारे ।
दोष रहा किसका वह बन चातक ढूंढ रहा दिल हारे ।
मै वरती उसको पर ये दुनिया भई प्रेम दुश्मन हमारे ।

मोर - मेरा/मेरी
..................................
मोलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 22, 2013 at 10:00am — 7 Comments

हिन्दी (कुण्डली)

हिन्दी हिन्द की बेटी, ढूंढ रही सम्मान ।
घर गली हर नगर नगर, सारा हिन्दूस्तान ।।
सारा हिन्दूस्तान, दासत्व छोड़े कैसे ।
उड़ रहे आसमान, धरती पग धरे कैसे ।।
‘रमेश‘ कह समझाय, अपनत्व माथे बिन्दी ।
स्वाभीमान जगाय, ममतामयी है हिन्दी ।।
.....................................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 20, 2013 at 11:30am — 9 Comments

कुंड़ली

काम कैसे कठिन भला, हो करने की चाह ।
मंजिल छुना दूर कहां, चल पड़े उसी राह ।।
चल पड़े उसी राह, गहन कंटक पथ जावे ।
करे कौन परवाह, मनवा जो अब न माने ।।
जीवन में कुछ न कुछ कर, जो करना हो नाम ।
कहत ‘रमेश‘ साथी सुन, जग में पहले काम ।।

......................................
मौलिक अप्रकाशित (प्रथम प्रयास)

Added by रमेश कुमार चौहान on September 11, 2013 at 11:30pm — 7 Comments

होगी सुबह (हाइकू)


जीवन है क्या ?
मन के यक्ष प्रश्न
सुख या दुख ।

मेरा मन
पथ भूला राही है,
जग भवर ।
        
देख दुनिया,
जीने का मन नही,
स्वार्थ के नाते ।

मन भरा है,
 ऐसी मिली सौगात,
बेवाफाई का ।

कैसा है धोखा,
अपने ही पराये,
मित्र ही शत्रु ।

जग मे तु भी,
एक रंग से पूता,
कहां है जुदा ?

क्यों रोता है ?
सिक्के के दो पहलू
होगी सुबह ।

........‘रमेश‘.........
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 8, 2013 at 11:42am — 7 Comments

कुछ हाइकू सा

राजनीतिज्ञ,

कुशल अभिनेता,

मूक दर्शक।



कुटनीतिज्ञ

कुशल राजनेता

मित्र ही शत्रु



शकुनी नेता

लोकतंत्र चैसर

बिसात लोग



लोकराज है

लोभ मोह में लोग

यही तो रोग



अपनत्व है ?

देश से सरोकार ?

फिर बेकार ।



सपना क्या था ?

शहीद सपूतो का

मिले आजादी ?



आजादी कैसी

विचार परतंत्र

वाह रे तंत्र



गांधी विचार

कैसे भरे संस्कार

कहां है खादी ?



विकास गढ़े…

Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on September 4, 2013 at 9:30pm — 9 Comments

जय हो जय हो भारत माता (दोहा चौपाई)

दोहा

मातृभूमि है मेरी, स्वर्ग से भी भली ।

माथा झुका नमन करू, प्रस्सुन ले अंजुली ।।



चैपाई

लहर लहर तिरंगा लहराता । रवि जहां पहले शिश झुकाता

जय हो जय हो भारत माता ।  तेरा वैभव सकल जग गाता



उत्तर हिमालय मुकुट साजे । उन्नत शिखर रक्षक बन छाजे

गंगा यमुना जहां से निकली ।  केदार नंदा तट है बद्री



दक्षिण में सिंधु चरण पखारे ।  दहाड़ता जस हो रखवारे

सेतुबंध कर शंभू जापे     ।  तट राम रामेश्वर थापे



पूरब कोणार्क जग थाती    …

Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on September 2, 2013 at 11:00pm — 9 Comments

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