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प्रदीप देवीशरण भट्ट's Blog (63)

-गुरु दिवस

झिझको नहीं ठिठको नहीं
लो पकड़ लो मेरा हाथ
मैं तुम्हे ले चलता हूँ
तम से प्रकाश की ओर

प्रकाश तुम्हें दिखाएगा
जीवन के अनंत आयाम
तुम कसौटी पर परखना
औऱ चुन लेना कोई एक

वो एक ही पर्याप्त है
जीवन को दिशा देने के लिए
अन्य के जीवन में
प्रकाश फ़ैलाने के लिए॥

- प्रदीप देवीशरण भट्ट - मौलिक व अप्रकाशित

Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on September 5, 2019 at 3:50pm — 4 Comments

मुफ़लिसी

शाम को जिस वक़्त खाली हाथ घर जाता हूँ मैं

अपने बच्चों की निगाहों से उतर जाता हूँ मैं
भूख से हूँ बेहाल इतना के चला जाता नहीं
जाना चाह्ता हूँ उधर जाने किधर जाता हूँ मैं
एक ठीया है शहर में हम सब जहाँ होते जमा
ख़ुद को लेकिन रोज़ तन्हा उस डगर पाता हूँ मैं
जो मेरी है वो ही अब हालत शहर की हो रही
आइने में ख़ुद की…
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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 26, 2019 at 3:30pm — 4 Comments

सांच को आंच नही

वर्तमान राजनैतिक व्यवस्ठा पर तंज



वक्त दोहराता है अपने आप को

कैसे कैसे दिन दिखाता आपको



भूलना हम जिसको चाहें बारहा

फिर वही मंज़र दिखाता आपको



जो सबक माज़ी में तुम भूले उसे

याद फिर-फिर से दिलाता आपको



जिस के संग जैसा किया है सामने

वक्त बस शीशा दिखाता आपको



शह नहीं है खेल बस शतरंज का

मात वो देना सिखाता आपको



तुम अगर सच्चे थे तब वो आज है

फिर वो क्यूँ झूठा कहाता आपको



सांच को ना आंच होती है कभी…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 23, 2019 at 12:00pm — 1 Comment

सत्ता के गलियारे

जिनको हमने चुनकर भेजा,सत्ता के गलियारों में

उनको लड़ते देखा जैसे, श्वान लड़ें बाज़ारों में

 

कब क्या कैसे गुल ये खिलाते,कोई जान नहीं पाया

इनके असली रंग हैं दीखते, तीज और त्योहारों में

 

चोर उच्चके…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 22, 2019 at 12:30pm — 1 Comment

मेरे प्रिय विभु मेरे प्रिय मोरांडी-

(13 अगस्त-2018-इटली का मोरांडी पुल हादसा)

 

अटठावन वर्ष की उम्र भी कोई उम्र होती है

ना तो पूर्ण  रुपेण युवा और ना ही पूरे वृद्ध

तुम्हारा यूँ इस तरह अकस्मात ही चले जाना

पूरे शहर को कर गया है अचम्भित और विक्षिप्त…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 19, 2019 at 5:00pm — 2 Comments

नया भारत

बरसों से जो ख्वाब थे देखे, पूरे हमने कर डाले

मंसूबे हर एक दुश्मन के, बिना सर्फ़ के धो डाले



धाराओं के जाल में, मज़लूमों का जो हक थे मार रहे

हमने ऐसी धाराओं के हर्फ वो सारे धो डाले



सदियों से जो जमी हुई थी, साफ़ नही कर पाया कोई

हमने ऐसी जमी मैल के, बर्फ वो सारे धो डाले



तीन दुकाने चलती रहती थीं, कश्मीर की घाटी में

हमने ऐसे बीन बीन कर, ज़र्फ वो सारे धो डाले



बार बार समझाया सबको, पर वो समझ नही पाए

हमने 'दीप' फ़िर मजबूरी में कम-ज़र्फ़…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 15, 2019 at 9:00am — 3 Comments

मैं कोई तारा नही खुर्शीद हूँ

मुझसे ना उलझे कोई ये जान ले

मैं कोई श्लाघा नही ताकीद हूँ

तेरी मंज़िल तक तुझे पहुँचाऊगाँ

मैं कोई छलिया नही मुर्शिद हूँ

हंस रहे हैं मुझपे वो ये जान…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 6, 2019 at 4:30pm — 5 Comments

शहर के हंकाई

लहू बुज़ुर्गो का मिट्टी में बहाने वालो

दागदारोँ को सरेआम बचाने वालो

बच्चोँ के हाथ में शमशीर थमाने वालो

बात फूलोँ की तुम्हारे मुँह से नहीं अच्छी लगती



खुदा के नाम पे दुकानों को चलाने वालो

धर्म् के नाम पर इंसा को बाँट्ने वालो…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 30, 2019 at 12:30pm — 3 Comments

बच्चा ज्यों-ज्यों होता बडा

बच्चा ज्यों-ज्यों होता बड़ा

हँसता कभी रोता ज़रा

उँगली थामे दौड़ रहा वह

गिरता कभी होता खड़ा
देखें बचपन तो जी ललचाए

काश हम भी बच्चे बन जाएँ

अट्खेली से सबै…
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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 29, 2019 at 2:00pm — 3 Comments

दिल का खाली कोना

दिल के बदले दिया सपना सलोना

नहीं खाली था शायद दिल में कोना

ये माना मैंने तुम सबसे हसीं हो

मगर सोना तो फ़िर भी होता सोना

ना  वादा तुम करो मिलने का कोई…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 19, 2019 at 1:30pm — 3 Comments

बेटी बचाओ बेटी पढाओ

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ 

सिर्फ़ एक नारा भर नहीँ है

कुछ करके दिखाना भी है

एक क़दम मैंने बढाया है

एक क़दम तुम भी ढ़ाओ

झिझको मत ठहरो मत

आगे बढो और पढाओ…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 17, 2019 at 5:30pm — 1 Comment

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा पर विशेष

 

गुरु कृपा हो जाए तो सफ़ल सिद्ध हों काम ।

कृपा हनू पर रखते हैं जैसे सियापति  राम॥

 

राम कहें शंकर गुरु ,भोले कहें श्रीराम।

दोनों ही सर्वज्ञ हैं, मैं जाऊं काकै…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 16, 2019 at 4:00pm — 1 Comment

अपने आप में

"यदि तुम्हें

उससे प्रेम है अनंत!

तो तुम स्वीकार

क्यूँ नहीं करते।

 

क्यूँ नहीं देख पाते

उसकी आंखों का सूनापन

जहाँ बरसों से नही बरसी…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 9, 2019 at 6:00pm — 2 Comments

नादान बशर

दर्दों गम से हर कोई बेजार है,

हादसों की हर तरफ़ दीवार है।

 

बिक रहे हैं वो भी जो अनमोल हैं,

 कैसे नादानों का ये बाज़ार हैं।

 

सब्र अब सबका चुका लगता मुझे,

हर बशर लड़ने को बस तैय्यार है।

 

पल में तोला पल में माशा मत बनो,

ये भी जीने का कोई आधार है।

 

मुफलिसी के मारे लगते हैं सभी,

फ़िर भी ये लगते नहीं लाचार हैं।

 

जिसके हाथों में हैं ज्यादा पुतलियाँ,

उनकी ही उतनी बड़ी सरकार…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 4, 2019 at 6:00pm — 2 Comments

ज़ीस्त

ज़ीस्त को मुझसे है गिला देखो

जी रहा हूँ मैं हौसला देखो

साथ रहते हैं एक छत के तले

दरम्याँ फिर भी फासला देखो

तुम जिधर जा रहे हो बेखुद से

वहीं आयेगा जलजला देखो

सँभाल ही लूँगा मरासिम…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 3, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

मेंरी लाडली

जब तू पैदा हुई थी

तो मैं झूम के नाचा था

मेरी गोद में आकर

जब तूने पलकें झपकाई

मैंने अप्रतिम प्रसन्नता क़ो

अनुभव किया था

फ़िर तू शनै शनै

बेल की तरह बड़ी…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on June 24, 2019 at 11:30am — 1 Comment

-ट्विंकल ट्विंकल लिट्ल स्टार-

ट्विंकल ट्विंकल लिट्ल स्टार

बंद करो ये अत्याचार

नज़रो में वहशत है पसरी

जीना बच्चों का दुश्वार

शहर नया हर रोज़ हादसा

क्यूँ चुप बैठी है सरकार

नज़र गड़ाए बैठे हैं फूल पर …

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on June 18, 2019 at 3:00pm — 3 Comments

माँ भी बोझ लगती है

बोझ उठाती हैअकेली माँ कई बच्चोँ का

कई बच्चोँ को मगर माँ भी बोझ लगती है

 

लहू से सींचकर जिसको बडा किया उसको

बहु के साथ ही रहने में मौज लगती है…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on May 30, 2019 at 3:00pm — No Comments

श्वान  का दर्द

जब से शहर में चुनाव का बिगूल बज गया

श्वान का भी श्वान से खौफ निकल गया

शोर और सिर्फ शोर मच रहा सुबह शाम

पांच साल बाद नेता को पडा जनता से काम

  

श्वान हैरान परेशान घूमता रहता इधर उधर…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on April 4, 2019 at 11:00am — 4 Comments

पथ के पथगामी-

नारी तो केवल है नारी है    

नर भी तो केवल है नर      

दोनोँ के विचार अलग हैं

दोनोँ के किरदार अलग

ना इसका कुछ हिस्सा ज्यादा

ना ही उसका है कुछ कम

 

कभी…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on April 2, 2019 at 6:30pm — 4 Comments

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