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हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

पुनः कुठाराघात सह रहीं,
माँ भारती कुछ वर्षों से ।
पीड़ादायी दंश दे रहे ,
नवल विषधर कुछ अरसे से।
फण पर फणधर के नर्तन को,
हलधर के भाई कम हैं।
हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

संस्कृतियों की प्राचीन धरा पर,
देख राजनीति का अंधपतन।
सोच दुर्दशा आम जन-जन की ,
ब्याकुल-ब्यथित-द्रवित है मन।
मोहित अर्जुन को समझाने को ,
गीता की वाणी कम है।
हिमगिरि की ऑंखें नम है।

सूर्य भारत भू के जो हैं,
अस्ताचल को अग्रसर हैं,
गहन तम के नए प्रवर्तक ,
निष्कंटक प्रभावान प्रखर हैं।
दमन शोषण के दो पाटों में
पिसती जनता की चीख़ें कम हैं?
हिमगिरी की ऑंखें नम हैं।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Mohit mishra (mukt) on June 26, 2018 at 8:06am

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी , रचनावलोकन और सराहना के लिए शुक्रिया

Comment by Mohit mishra (mukt) on June 26, 2018 at 8:05am

आदरणीया नीलम जी सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by Mohit mishra (mukt) on June 26, 2018 at 8:04am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी उत्साहवर्धन का तहे दिल से शुक्रिया

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 22, 2018 at 11:01am

आदरणीय मोहित जी बहुत ही सुन्दर सरस कविता हुई है...बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 21, 2018 at 8:13pm

बहुत खूब...

Comment by Neelam Upadhyaya on June 20, 2018 at 3:12pm

आदरणीय मोहित मिश्रा जी नमस्कार।  अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें।  माननीय समर कबीर साहब की अभ्युक्तियों का संज्ञान लें। 

Comment by Mohit mishra (mukt) on June 20, 2018 at 8:37am

आदरणीय समर सर उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन का बहुत बहुत आभार

Comment by Mohit mishra (mukt) on June 20, 2018 at 8:36am

आदरणीय गुमनाम जी सराहना के लिए अत्यंत शुक्रिया

Comment by Samar kabeer on June 19, 2018 at 8:22pm

जनाब मोहित मिश्रा मुक्त जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

जहाँ जहाँ 'आँखे नम है' लिखा है वहाँ "आँखें नम हैं" कर लें ।

पांचवीं पंक्ति में 'अरसों' शब्द को "अरसे" करना उचित होगा ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 18, 2018 at 8:39pm

वाह बहुत खूब......

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