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तुम सम्मोहित कर बैठी हो-------नव वर्ष की मेरी प्रथम ग़ज़ल

22 22 22 22

तुम सम्मोहित कर बैठी हो
निश्चित ही जादूगरनी हो

होश रहित हूँ, दोष तुम्हारा
अधरों पर मधुरस रखती हो

मुस्का कर के मन हरने की
कला कहाँ से ले आई हो

छू, चन्दन तन ताप बढ़े है
बर्फीली ज्वाला जैसी हो

नैनों में पानी है सो तुम
पंकज को अच्छी लगती हो

मौलिक-अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" 12 hours ago

आदरणीय महेंद्र जी बहुत बहुत आभार

Comment by Mahendra Kumar on January 4, 2019 at 7:40pm

नव वर्ष पर लिखी गयी आपकी प्रथम ग़ज़ल अच्छी लगी आदरणीय पंकज जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 4, 2019 at 6:01am

आदरणीय लक्ष्मण धामी सर बहुत बहुत आभार

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 2, 2019 at 7:20pm

आ. भाई पंकज जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 2, 2019 at 5:08pm

आदरणीय सुरेंद्र सर बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 2, 2019 at 5:07pm

आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम और हार्दिक आभार

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 2, 2019 at 3:15pm

आद0 पंकज कुमार मिश्र जी सादर अभिवादन।नव वर्ष की आपकी पहली ग़ज़ल नायाब है,, ऊपर से आद0 समर साहब की बेहतरीन इस्लाह से और निखर जा रही है,, बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Samar kabeer on January 2, 2019 at 3:02pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

तुम सम्मोहित कर बैठी हो'

इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं,गेयता बढ़ जाएगी:-

'तुम सम्मोहित कर लेती हो'

'मुस्का कर के मन हरने की'

इस मिसरे को यूँ कर लें:-

'मुस्का कर हर मन हरने की'

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