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Chandresh Kumar Chhatlani
  • Male
  • Udaipur, Rajasthan
  • India
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Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post आपका दिन (लघुकथा)
"आदाब। बहुत ही विचारोत्तेजक और मार्गदर्शक सृजन। हार्दिक बधाई जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी साहिब। "
Jul 13
Rachna Bhatia commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post आपका दिन (लघुकथा)
"आदरणिय एक नई सोच के साथ अच्छी लघुकथा। बधाई।"
Jul 12
Samar kabeer commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post आपका दिन (लघुकथा)
"जनाब चंद्रेश जी आदाब,बहुत अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Jul 10
Chandresh Kumar Chhatlani posted a blog post

आपका दिन (लघुकथा)

"मैं केक नहीं काटूँगी।" उसने यह शब्द कहे तो थे सहज अंदाज में, लेकिन सुनते ही पूरे घर में झिलमिलाती रोशनी ज्यों गतिहीन सी हो गयी। उसका अठारहवाँ जन्मदिन मना रहे परिवारजनों, दोस्तों, आस-पड़ौसियों और नाते-रिश्तेदारों की आँखें अंगदी पैर की तरह ताज्जुब से उसके चेहरे पर स्थित हो गयीं थी।वह सहज स्वर में ही आगे बोली, "अब मैं बड़ी हो गयी हूँ, इसलिए सॉलिड वर्ड्स में यह कह सकती हूँ कि अब से यह केक मैं नहीं मेरी मॉम काटेगी।" कहते हुए उसके होठों पर मुस्कुराहट तैर गयी।वहाँ खड़े अन्य सभी के चेहरों पर अलग-अलग भाव…See More
Jul 8
Neelam Upadhyaya commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post पत्ता परिवर्तन / लघुकथा
"समसामयिक विषय पर अच्छी रचना। बधाई स्वीकार करें आदरणीय चंद्रेश कुमार छतलानी जी।"
Apr 30
Samar kabeer commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post पत्ता परिवर्तन / लघुकथा
"जनाब चंद्रेश जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,मेरी तरफ़ से बधाई स्वीकार करें ।"
Apr 29
Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post पत्ता परिवर्तन / लघुकथा
"आदाब। ... वाह! चुनावी हवा म़े इक्के/राजा/ .... जोकर और दर्शक/ खिलाड़ी के प्रतीकों में समसामयिक परिदृश्य चित्रण के साथ सार्थक चिंतन प्रेरित करती बेहतरीन रचना। हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी साहिब।"
Apr 24
Chandresh Kumar Chhatlani posted a blog post

पत्ता परिवर्तन / लघुकथा

वह ताश की एक गड्डी हाथ में लिए घर के अंदर चुपचाप बैठा था कि बाहर दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने दरवाज़ा खोला तो देखा कि बाहर कुर्ता-पजामाधारी ताश का एक जाना-पहचाना पत्ता फड़फड़ा रहा था। उस ताश के पत्ते के पीछे बहुत सारे इंसान तख्ते लिए खड़े थे। उन तख्तों पर लिखा था, "यही है आपका इक्का, जो आपको हर खेल जितवाएगा।" वह जानता था कि यह पत्ता इक्का नहीं है। वह खीज गया, फिर भी पत्ते से उसने संयत स्वर में पूछा, "कल तक तो तुम अपनी गड्डी छोड़ गद्दी पर बैठे थे, आज इस खुली सड़क में फड़फड़ा क्यों रहे हो?" पत्ते ने लहराते…See More
Apr 24

Profile Information

Gender
Male
City State
Udaipur Rajasthan
Native Place
Udaipur Rajasthan
Profession
Lecturer

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आपका दिन (लघुकथा)

"मैं केक नहीं काटूँगी।" उसने यह शब्द कहे तो थे सहज अंदाज में, लेकिन सुनते ही पूरे घर में झिलमिलाती रोशनी ज्यों गतिहीन सी हो गयी। उसका अठारहवाँ जन्मदिन मना रहे परिवारजनों, दोस्तों, आस-पड़ौसियों और नाते-रिश्तेदारों की आँखें अंगदी पैर की तरह ताज्जुब से उसके चेहरे पर स्थित हो गयीं थी।

वह सहज स्वर में ही आगे बोली, "अब मैं बड़ी हो गयी हूँ, इसलिए सॉलिड वर्ड्स में यह कह सकती हूँ कि अब से यह केक मैं नहीं मेरी मॉम काटेगी।" कहते हुए उसके होठों पर मुस्कुराहट तैर गयी।

वहाँ खड़े अन्य सभी के…

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Posted on July 8, 2019 at 1:00pm — 3 Comments

पत्ता परिवर्तन / लघुकथा

वह ताश की एक गड्डी हाथ में लिए घर के अंदर चुपचाप बैठा था कि बाहर दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने दरवाज़ा खोला तो देखा कि बाहर कुर्ता-पजामाधारी ताश का एक जाना-पहचाना पत्ता फड़फड़ा रहा था। उस ताश के पत्ते के पीछे बहुत सारे इंसान तख्ते लिए खड़े थे। उन तख्तों पर लिखा था, "यही है आपका इक्का, जो आपको हर खेल जितवाएगा।"

 

वह जानता था कि यह पत्ता इक्का नहीं है। वह खीज गया, फिर भी पत्ते से उसने संयत स्वर में पूछा, "कल तक तो तुम अपनी गड्डी छोड़ गद्दी पर बैठे थे, आज इस खुली सड़क में फड़फड़ा…

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Posted on April 23, 2019 at 10:20pm — 3 Comments

अमृतसर रेल दुर्घटना विभीषिका पर 5 लघुकथाएं

(1). मेरा जिस्म

 

एक बड़ी रेल दुर्घटना में वह भी मारा गया था। पटरियों से उठा कर उसकी लाश को एक चादर में समेट दिया गया। पास ही रखे हाथ-पैरों के जोड़े को भी उसी चादर में डाल दिया गया। दो मिनट बाद लाश बोली, "ये मेरे हाथ-पैर नहीं हैं। पैर किसी और के - हाथ किसी और के हैं।

"तो क्या हुआ, तेरे साथ जल जाएंगे। लाश को क्या फर्क पड़ता है?" एक संवेदनहीन आवाज़ आई।

"वो तो ठीक है… लेकिन ये ज़रूर देख लेना कि मेरे हाथ-पैर किसी ऐसे के पास नहीं चले जाएँ, जिसे मेरी जाति से घिन आये और वे…

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Posted on October 22, 2018 at 9:00am — 6 Comments

सत्यव्रत (लघुकथा)

"व्रत ने पवित्र कर दिया।" मानस के हृदय से आवाज़ आई। कठिन व्रत के बाद नवरात्री के अंतिम दिन स्नान आदि कर आईने के समक्ष स्वयं का विश्लेषण कर रहा वह हल्का और शांत महसूस कर रहा था। "अब माँ रुपी कन्याओं को भोग लगा दें।" हृदय फिर बोला। उसने गहरी-धीमी सांस भरते हुए आँखें मूँदीं और देवी को याद करते हुए पूजा के कमरे में चला गया। वहां बैठी कन्याओं को उसने प्रणाम किया और पानी भरा लोटा लेकर पहली कन्या के पैर धोने लगा।

 

लेकिन यह क्या! कन्या के पैरों पर उसे उसका हाथ राक्षसों के हाथ जैसा…

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Posted on October 14, 2018 at 2:23pm — 17 Comments

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At 10:20pm on October 15, 2018, Sheikh Shahzad Usmani said…

आदाब।

आपकी अद्वितीय लघुकथा ''सत्यव्रत" भी मंच पर "फ़ीचर" किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी  साहिब।

At 4:37pm on April 2, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

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