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Chandresh Kumar Chhatlani
  • Male
  • Udaipur, Rajasthan
  • India
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Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"//उसने झूठ भरी आवाज़ में कहा "लेकिन बेटे इस वृद्धाश्रम में कोई कमी नहीं।"//  इस अभिव्यक्ति में अनकहे में बहुत कुछ है; तो // लेकिन वहां तो… आपके बिना वह अनाथ-आश्रम है// इस में भी आज के जीवन और आत्म-मूल्यांकन/सिंहावलोकन की…"
18 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani left a comment for Chandresh Kumar Chhatlani
"आदाब। आपकी अद्वितीय लघुकथा ''सत्यव्रत" भी मंच पर "फ़ीचर" किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी  साहिब।"
18 hours ago
Dr. Vijai Shanker commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"आदरणीय चंद्रेश कुमार जी , निसंदेह बहुत ही अच्छी लघु - कथा है , प्रेरक भी है। पर इसमें एक जबरदस्त व्यंग ( छुपा हुआ ) भी है , हम आज भी माँ का अर्थ बता रहे हैं। कहाँ हैं हम ? कहाँ है हमारी उन्नत अवस्था ? सांस्कृतिक मूल्य ? क्या है हमारी शिक्षा व्यवस्था…"
18 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"आपकी यह रचना भी मंच पर "फ़ीचर" किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी साहिब।"
18 hours ago
Chandresh Kumar Chhatlani's blog post was featured

सत्यव्रत (लघुकथा)

"व्रत ने पवित्र कर दिया।" मानस के हृदय से आवाज़ आई। कठिन व्रत के बाद नवरात्री के अंतिम दिन स्नान आदि कर आईने के समक्ष स्वयं का विश्लेषण कर रहा वह हल्का और शांत महसूस कर रहा था। "अब माँ रुपी कन्याओं को भोग लगा दें।" हृदय फिर बोला। उसने गहरी-धीमी सांस भरते हुए आँखें मूँदीं और देवी को याद करते हुए पूजा के कमरे में चला गया। वहां बैठी कन्याओं को उसने प्रणाम किया और पानी भरा लोटा लेकर पहली कन्या के पैर धोने लगा। लेकिन यह क्या! कन्या के पैरों पर उसे उसका हाथ राक्षसों के हाथ जैसा दिखाई दिया। घबराहट में…See More
20 hours ago
Neelam Upadhyaya commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"आदरणीय चंद्रेश कुमार जी, अच्छी अभिव्यक्ति है। गुणीजनों के विचार से मैं भी सहमत हूँ।  नवरात्री में देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा अर्चना करते हैं जो माँ  का ही स्वरुप है। कन्या पूजन भी माँ का ही स्वरुप मानकर करते हैं।  अगर माँ का…"
yesterday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"आदरणीय चंद्रेश जी बधाई...बहुत ही खूबसूरती से एक सामाजिक विद्रूपता को शब्दों में ढाला है...अंतिम तीन पंक्तियों में लघु कथा अपने विराट रूप में निखर के आई..लेकिन मुझे लगता है कि अंतिम पंक्ति न भी हो तब भी लघु कथा बेहतर थी..क्योंकि तब एक टीस सी रह…"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"दो-चार बार अध्ययन करने के बाद कुछ और कहना भी चाह रहा हूं मंच की अनुमति से! 1-//व्रत ने पवित्र कर दिया।, //कठिन व्रत के बाद //, //अंतिम दिन स्नान//, //हल्का और शांत महसूस // आदि  भाव-संप्रेषण के बाद भक्त के सामान्य हाथ द्वारा कन्या चरण…"
yesterday
TEJ VEER SINGH commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"हार्दिक बधाई आदरणीय चंद्रेश जी।माँ बाप की पूजा से बड़ी कोई पूजा नहीं होती। इनका तिरस्कार करके इंसान सदैव अपराध बोध से ग्रस्त रहता है।कितनी ही पूजा पाठ कर लो लेकिन उसे शाँति उन्हीं के चरणों में मिलेगी।लाज़वाब लघुकथा।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post सत्यव्रत (लघुकथा)
"आदाब। त्योहारों/जयंतियों/व्रत-उपवासों आदि से उनके वास्तविक संदेश/सबक़ हासिल कर हमें आत्म-सुधार, आत्मोन्नति कर घर-परिवार/समाज/राष्ट्र हितार्थ कर्मशील रहना चाहिए; केवल औपचारिकताएं या पाखंड/आडंबर/भेड़चाल/अंधानुकरण ही नहीं। समसामयिक परिदृश्य के तहत…"
Sunday
Chandresh Kumar Chhatlani posted a blog post

सत्यव्रत (लघुकथा)

"व्रत ने पवित्र कर दिया।" मानस के हृदय से आवाज़ आई। कठिन व्रत के बाद नवरात्री के अंतिम दिन स्नान आदि कर आईने के समक्ष स्वयं का विश्लेषण कर रहा वह हल्का और शांत महसूस कर रहा था। "अब माँ रुपी कन्याओं को भोग लगा दें।" हृदय फिर बोला। उसने गहरी-धीमी सांस भरते हुए आँखें मूँदीं और देवी को याद करते हुए पूजा के कमरे में चला गया। वहां बैठी कन्याओं को उसने प्रणाम किया और पानी भरा लोटा लेकर पहली कन्या के पैर धोने लगा। लेकिन यह क्या! कन्या के पैरों पर उसे उसका हाथ राक्षसों के हाथ जैसा दिखाई दिया। घबराहट में…See More
Sunday
Chandresh Kumar Chhatlani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post भटकना बेहतर (लघुकथा)
"आप सभी आदरणीय सुधीजनों का रचना पर आकर मुझे प्रोत्साहित करने और बेहतर लेखन की राह सुझाने के लिए हृदय से आभारी हूँ। निवेदन है की ऐसे ही स्नेह बनाये रखें। सादर,"
Sunday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post भटकना बेहतर (लघुकथा)
"बहुत ही संवेदनशील लघु कथा लिखी है आपने.. अंतिम पंक्ति जो किसी भी लघु कथा की जान होती है..अपने आप को चरिथार्त कर रही है..बधाई"
Aug 25
vijay nikore commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post भटकना बेहतर (लघुकथा)
"मन को छूती  भावपूर्ण लघुकथा के लिए बधाई, चंद्रेश जी।"
Aug 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post भटकना बेहतर (लघुकथा)
"आ. चंद्रेश जी, अच्छी कथा हुयी है । बधाई स्वीकारें ।"
Aug 23
TEJ VEER SINGH commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post भटकना बेहतर (लघुकथा)
"हार्दिक बधाई आदरणीय चंद्रेश जी।लाज़वाब लघुकथा।एक बेहतरीन धमाकेदार प्रस्तुति।समाज में बढ़ती महिला अपराधों की संख्या पर करारा प्रहार।"
Aug 22

Profile Information

Gender
Male
City State
Udaipur Rajasthan
Native Place
Udaipur Rajasthan
Profession
Lecturer

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सत्यव्रत (लघुकथा)

"व्रत ने पवित्र कर दिया।" मानस के हृदय से आवाज़ आई। कठिन व्रत के बाद नवरात्री के अंतिम दिन स्नान आदि कर आईने के समक्ष स्वयं का विश्लेषण कर रहा वह हल्का और शांत महसूस कर रहा था। "अब माँ रुपी कन्याओं को भोग लगा दें।" हृदय फिर बोला। उसने गहरी-धीमी सांस भरते हुए आँखें मूँदीं और देवी को याद करते हुए पूजा के कमरे में चला गया। वहां बैठी कन्याओं को उसने प्रणाम किया और पानी भरा लोटा लेकर पहली कन्या के पैर धोने लगा।

 

लेकिन यह क्या! कन्या के पैरों पर उसे उसका हाथ राक्षसों के हाथ जैसा…

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Posted on October 14, 2018 at 2:23pm — 8 Comments

भटकना बेहतर (लघुकथा)

कितने ही सालों से भटकती उस रूह ने देखा कि लगभग नौ-दस साल की बच्ची की एक रूह पेड़ के पीछे छिपकर सिसक रही है। उस छोटी सी रूह को यूं रोते देख वह चौंकी और उसके पास जाकर पूछा, "क्यूँ रो रही हो?"

वह छोटी रूह सुबकते हुए बोली, "कोई मेरी बात नहीं सुन पा रहा है… मुझे देख भी नहीं पा रहा। कल से ममा-पापा दोनों बहुत रो रहे हैं… मैं उन्हें चुप भी नहीं करवा पा रही।"

वह रूह समझ गयी कि इस बच्ची की मृत्यु हाल ही में हुई है। उसने उस छोटी रूह से प्यार से कहा, "वे अब तुम्हारी आवाज़…

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Posted on August 20, 2018 at 11:30pm — 10 Comments

खोटा सिक्का (लघुकथा)

"ये लो! मैं बुध ग्रह को जीत गया।" उस सितारे की तीव्र तरंगदैर्ध्य वाली खुशी से भरपूर ध्वनि से आसपास की आकाशगंगाएं गुंजायमान हो उठीं।

 

सूदूर अंतरिक्ष में, जहाँ समय और विस्तार अनंत हैं, चार सितारे अपने ही प्रकार का जुआ खेल रहे थे। दांव पर लग रहे थे, उनके सौरमंडल के विभिन्न छोटे-बड़े ग्रह, उपग्रह, उल्कापिंड आदि। मनुष्यों से प्रेरित हो हमारा सूर्य भी उनमें से एक था। हालांकि उस समय उसका समय सही नहीं था। वह लगातार हार रहा था।

 

शनि के वलय, मंगल का सबसे ऊंचा पर्वत,…

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Posted on August 2, 2018 at 7:00pm — 3 Comments

अस्वीकृत मृत्यु (लघुकथा)

अंतिम दर्शन हेतु उसके चेहरे पर रखा कपड़ा हटाते ही वहाँ खड़े लोग चौंक उठे। शव को पसीना आ रहा था और होंठ बुदबुदा रहे थे। यह देखकर अधिकतर लोग भयभीत हो भाग निकले, लेकिन परिवारजनों के साथ कुछ बहादुर लोग वहीँ रुके रहे। हालाँकि उनमें से भी किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि शव के पास जा सकें। वहाँ दो वर्दीधारी पुलिस वाले भी खड़े थे, उनमें से एक बोला, "डॉक्टर ने चेक तो ठीक किया था? फांसी के इतने वक्त के बाद भी ज़िन्दा है क्या?"

दूसरा धीमे कदमों से शव के पास गया, उसकी नाक पर अंगुली रखी और…

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Posted on June 6, 2018 at 6:00pm — 17 Comments

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At 10:20pm on October 15, 2018, Sheikh Shahzad Usmani said…

आदाब।

आपकी अद्वितीय लघुकथा ''सत्यव्रत" भी मंच पर "फ़ीचर" किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी  साहिब।

At 4:37pm on April 2, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आपका स्वागत है मित्र

 
 
 

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