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खर्चा बचाऊंगा

खर्चा बचाऊंगा



श्री ओसामा बिन लादेन जी मारे गए

कल में जन्मदिन हरगिज़ न मनाऊंगा

इस कुकर्मीं की ही आड़ में ही

जन्मदिन की पार्टी का खर्चा बचाऊंगा

महंगाई के इस दौर में

मुझे अच्छा बहाना मिल गया

वह ख़ूनी,दरिंदा,पापी सही

पर मेरा काम तो कर गया

जीते जी तो यह मेरे काम न आया

मरकर भला कर गया मेरा

हज़ार दो हज़ार की बचत हो गई

पार कर गया बेहड़ा

सही वक़्त पे मरा बेचारा

अमेरिका खुशियाँ मनायेगा

पाकिस्तान का हाल अब

बकरे जैसी हो… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on May 2, 2011 at 10:39am — No Comments

मुक्तिका: मौन क्यों हो? संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
मौन क्यों हो?
संजीव 'सलिल'
*
मौन क्यों हो पूछती हैं कंठ से अब चुप्पियाँ.
ठोकरों पर स्वार्थ की, आहत हुई हैं गिप्पियाँ..
 
टँगा है आकाश, बैसाखी लिये आशाओं की.
थक गये हैं हाथ, ले-दे रोज खाली कुप्पियाँ..
 
शहीदों ने खून से निज इबारत मिटकर लिखी.
सितासत चिपका रही है जातिवादी चिप्पियाँ..
 
बादशाहों को किया बेबस गुलामों ने 'सलिल'
बेगमों…
Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on May 1, 2011 at 5:13pm — No Comments

घर की खुशबू कुरान जैसी है

ख्वाब उनमें नहीं अब पलते हैं
उसकी आंखें चिराग़ जैसी हैं

उसकी आंखों में है जहां का ग़म
उसकी किस्मत खुदा के जैसी है

कहने को तो दुनिया भी एक महफिल है
इसकी सूरत बाजार जैसी है

हरेक घर को इबादत की नजर से देखो
घर की खुशबू कुरान जैसी है

जबसे आया हूं होम करता रहा हूं
जिन्दगी हवन कुंड के जैसी है



- आकर्षण कुमार गिरि

Added by Aakarshan Kumar Giri on April 30, 2011 at 1:00pm — 2 Comments

कविता :- श्रम को सलाम है !

कविता :- श्रम को सलाम है !

छेनियों हथौडियो की चोट को

उस ओट को सलाम है…

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Added by Abhinav Arun on April 29, 2011 at 10:30pm — 9 Comments

अभी अभी एक ख्याब चूर हुआ हैं......................

अभी अभी एक ख्याब चूर हुआ हैं
बो शक्स जो अज़ीज है, दूर हुआ हैं

मैं समझता हू वो मजबूर ही होगा
लोग कहतें हैं के उसें गुरूर हुआ हैं

अब भी उम्मीद हैं मुझें तेरे आनें की
महोब्बत का बुरा हश्र जरूर हुआ है

लुट के जिसनें कुछ नहीं पाया
प्यार में बो ही तो मशहूर हुआ हैं

तन्हा है 'अमि' फ़िर एक बार दुनियां में
दर्द तो इस बार भी भरपूर हुआ है
-अमि'अज़ीम'

Added by अमि तेष on April 29, 2011 at 9:49am — No Comments

कस्तूरी मृग

कस्तूरी की गंध
खुद  मैं सहेजे
भ्रमित,
 भटक रहा था
कस्तूरी मृग
आनंद का सागर 
खुद मैं समेटे 
कदम
भटक रहें थे
दसों दिग्
रजनी छाबरा

Added by rajni chhabra on April 27, 2011 at 10:30pm — 5 Comments

कविता : लोकतंत्र का क्रिकेट

बड़ा अजीब खेल है लोकतंत्र का क्रिकेट

एक गेंद के पीछे ग्यारह सौ मिलियन लोग

उछल कर, गिर कर

झपट कर, लिपट कर

पकड़नी पड़ती है गेंद

कभी जमीन से, कभी आसमान से

जिसकी किस्मत अच्छी हो उसी को मिलती है गेंद



और बल्लेबाज

उसे तो मजा आता है क्षेत्र रक्षकों को छकाने में

अगर किसी तरह सबने मिलकर

बल्लेबाज को आउट कर भी दिया

तो फिर वैसा ही नया बल्लेबाज

उसका भी लक्ष्य वही

अगर पूरी टीम आउट हो गई

तो दूसरी टीम के बल्लेबाजों का भी लक्ष्य वही

सबसे ज्यादा पैसा… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 27, 2011 at 10:20pm — 3 Comments

~हिंसा~

यूँ तो 

बहुत पहले से 
रखी थी 
वह किताब शेल्फ में
उठा कर…
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Added by AjAy Kumar Bohat on April 27, 2011 at 4:30pm — 4 Comments

ऐसा भी एक मन्ज़र...

 

पैगाम लिए पंछी चल दिए सुबह को बुलाने ,
बांसुरी से गुजरती शीतल हवा कुछ गुनगुनाई |
 
पीली धूप पहन किरणों ने झाँका आसमान से ,
बाहें फैलाकर मौसम ने फिर ली अंगड़ाई |
 
सिमटने लगी रज़ाई…
Continue

Added by Veerendra Jain on April 27, 2011 at 12:15pm — 9 Comments

समाज

अखब़ार का एक टुकड़ा
बाहर से जला हुआ,
और राख़ वाली परिधि के दरमयां
सिर्फ़ तुम्हारा ज़िक्र.
हुमाद की वही खुशबू,
जिसका कोई आकार नहीं, 
जिसकी कोई दिशा नहीं;
ठंडी आवाज़ में बजती घंटियों सा चमकता है,
दीया और पुष्प जैसा नदियों में बिख़र जाता…
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Added by Rahul Raj on April 26, 2011 at 9:30pm — 1 Comment

सुर्ख लाल जोड़े में सजी वो जान मेरी

सुर्ख लाल जोड़े में सजी वो जान मेरी

रस्मो को आज निभाने चली है

सीने में मेरी मुहब्बत को दफना कर

रिश्तो की लाज बचाने चली है



मेंहदी से सजा के वो सुर्ख हथेली

दिल के दर्द छुपा तो वो लेगी

होठो पे लाली लगा कर के अपने

गले की हिचकियाँ छुपाने चली है



फेरे जो लेगी वो वेदी पे उस पल

सपनों को अपने जलाती चलेगी

हर ख्वाब जो कभी सजाये थे उसने

वेदी के अग्नि में चढाने चली है



फूलो से सजे उस सुहाग के सेज पे

सपनों की चिता जलाने चली… Continue

Added by Dheeraj on April 26, 2011 at 5:00pm — 2 Comments

मुक्तिका : माँ _संजीव 'सलिल'

मुक्तिका "माँ"

संजीव 'सलिल'

*

बेटों के दिल पर है माँ का राज अभी तक.

माँ के आशिष का है सिर पर ताज अभी तक..



प्रभू दयालु हों इसी तरह हर एक बेटे पर

श्री वास्तव में माँ है, है अंदाज़ अभी तक..



बेटे जो स्वर-सरगम जीवन भर गुंजाते.

सत्य कहूँ माँ ही है उसका साज अभी तक..



बेटे के बिन माँ का कोई काम न रुकता.

माँ बिन बेटों का रुकता हर काज अभी तक..



नहीं रही माँ जैसे ही बेटा सुनता है.

बेटे के दिल पर गिरती है गाज अभी तक..…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on April 26, 2011 at 2:00pm — 1 Comment

सपने हसीन क्यों होते हैं

स्नेह,दुलार,प्रीत

मिलन,समर्पण
आस, विश्वास  के 
सतरंगी 
ताने बाने से बुने
सपने इस कदर   
हसीन  क्यों होते हैं
कभी मिल जाते हैं 
नींद को पंख
कभी आ जाती है
पंखों को नींद
हम सोते मैं जागते
ओर जागते मैं सोते हैं
सपने इस  कदर  
हसीन क्यों होते हैं
बे नूर आँखों मैं 
नूर जगाते
उदास लबों पर 
मुस्कान…
Continue

Added by rajni chhabra on April 26, 2011 at 1:00pm — 12 Comments

विश्‍व भोजपुरी सम्‍मेलन में भोजपुरी के सम्‍मान की मांग तेज

                   देवभूमि ऋषिकेश में दिनांक 23-24 अप्रैल को आयोजित विश्‍व भोजपुरी सम्‍मेलन के दसवें राष्‍ट्रीय अधिवेशन के दौरान भोजपुरी भाषा, संस्‍कृति व कला को सम्‍मान दिए जाने की जोरदार मांग की गई । दिनांक 24 अप्रैल को समापन समारोह के अवसर पर मुख्‍य अतिथि के रूप में…

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Added by देवDevकान्‍तKant पाण्‍डेयPandey on April 25, 2011 at 6:00pm — 1 Comment

मकड़ियाँ दिलों की

बड़ी शिद्दत से इनकी आवाजाही रंग लायी है,
किसी का न तिलक और न कहीं कोई सगाई है,
सफ़ाई रोज़ होती है, हठी ये गिर कर पलती है,
मगर फिर भी दीवारों पर मेरे चुपचाप चलती है,…
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Added by neeraj tripathi on April 25, 2011 at 3:30pm — 2 Comments

कालचक्र

कालचक्र : आचार्य संदीप कुमार त्यागी

 

ओस कण भी दोस्तों अँगार हो गये ।

घास के तिनके सभी तलवार हो गये॥

 

रौंदते ही जो रहे फूलों को उम्र भर।

देखलो उनके सभी गुलखार हो गये॥

 

था यकीं जिनपर उन्हें सौ फीसदी कभी।

सब फरेबी देखलो मक्कार हो गये ॥

 

टाँकते थे जो हमारे आसमां पर चिंदियाँ।

चीथड़ों में आज वो सरकार हो गये॥

 

कीजियेगा क्या उन्हें देकर सलाम ।

आजकल वो दुश्मनों के यार हो…

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Added by आचार्य संदीप कुमार त्यागी on April 24, 2011 at 9:30pm — 1 Comment

पक्षपात

पक्षपात





दोष लगेगा उस पर

पक्षपात का

गर ज़रा सा भी दुःख

न वो देगा मुझे

मैं भी तो एक ज़र्रा हूँ

उसकी कायनात का

उसी कारवां की

एक… Continue

Added by rajni chhabra on April 24, 2011 at 4:30pm — 7 Comments

व्यंग्य - टेक्नालॉजी का फसाना

सबसे पहले आपको बता दूं कि औरों की तरह मैं भी तकनीक की टेढ़ी नजर से दूर नहीं हूं। तकनीक के फायदे कई हैं तो नुकसान तथा फजीहत भी मुफ्त में मिलती हैं। वैसे मेरे पास न तो विरासत में मिली संपत्ति है और न ही मैंने इतनी अकूत संपत्ति जुटाई है, जिससे जिंदगी बड़े आराम से गुजरे। मेरा तो ऐसा हाल है, जैसे बिना सिर खपाए कुछ बनता ही नहीं, मगर पिछले दिनों से इस बात को लेकर चिंतित हूं कि मैं रातों-रात लखपति क्या, करोड़पति से अरबपति बनते जा रहा हूं। दरअसल, मैंने सोचा कि जब बड़े शहरों में तकनीक की खुमारी छाई हुई है…

Continue

Added by rajkumar sahu on April 24, 2011 at 1:05am — No Comments

कविता : चिकनी मिट्टी और रेत

चिकनी मिट्टी के नन्हें नन्हें कणों में

आपसी प्रेम और लगाव होता है

हर कण दूसरों को अपनी ओर

आकर्षित करता है

और इसी आकर्षण बल से

दूसरों से बँधा रहता है



रेत के कण आकार के अनुसार

चिकनी मिट्टी के कणों से बहुत बड़े होते हैं

उनमें बड़प्पन और अहंकार होता है

आपसी आकर्षण नहीं होता

वो एक दूसरे की गति का विरोध करते हैं

उनमें केवल आपसी घर्षण होता है



चिकनी मिट्टी के कणों के बीच

आकर्षण के दम पर

बना हुआ बाँध

बड़ी बड़ी नदियों का प्रवाह रोक देता… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 24, 2011 at 12:48am — 4 Comments

ग़ज़ल

पत्ते जीवन के कब बिखर जाए क्‍या मालूम
शाम जीवन की कब हो जाए क्‍या मालूम

बन्‍द हो गए है रास्‍ते सभी गुफतगू के
अब वहां कौन कैसे जाए क्‍या मालूम

झूठ पर कर लेते है विश्‍वास सब
सच कैसे सामने आए क्‍या मालूम

दो मुहें सापों से भरा है आस पास
दोस्‍त बन कौन डस जाए क्‍या मालूम

विक्षिप्‍त की दुनिया है बेतरतीव बेरंग
कोई संगकार सजा जाए क्‍या मालूम

Added by रौशन जसवाल विक्षिप्‍त on April 23, 2011 at 8:19pm — 3 Comments

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