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पतझड़

                                      पतझड़ 

                      ---------------------------------------
                          पतझड़ के मौसम के बाद 
                          फिर हरियाली छाती है 
                          बुन्दोंके बरसने के बाद 
                          काली फिजा हट जाती है.
                          लाख उजाला देता सूरज 
                          ग्रहण उसे भी लगता है .
         …
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Added by Mohini Dhawade on June 13, 2011 at 10:30am — 1 Comment

चेक गणराज्य के हिन्दी कवि मित्र डा. ओडोलेन स्मेकल

                                                    

               

 …

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Added by MAHENDRA BHATNAGAR on June 13, 2011 at 10:00am — No Comments

मानसरोवर -- एक

ऊपर है नीला आसमान, नीचे विशाल वसुधा ललाम.
सर -सरिता और उत्स भूधर, फैले अरण्य अनुपम सुन्दर.


राकेश -रवि को जेल यहाँ.…
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Added by satish mapatpuri on June 13, 2011 at 2:00am — 9 Comments

‘हमें मालिक बने रहने दीजिए, मजदूर मत बनाइए’

पर्यावरण की चिंता हर बरस शुरू होती है, उसके बाद दम तोड़ देती है। पेड़ों की अंधा-धुंध कटाई के बाद जंगल घटते जा रहे हैं, वहीं प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। पर्यावरण से खिलवाड़ का खामियाजा हर किसी को भुगतना पड़ रहा है, फिर भी हम चेत नहीं रहे हैं और हरियाली को हर तरह से उजाड़ने में लगे हैं। विकास के नाम पर पेड़ों की बलि चढ़ाई जा रही हैं और यही धीरे-धीरे हमारे जीवन पर आफत बनती जा रही है या फिर दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पर्यावरण में धीमी मौत घुलती जा रही है, जो प्रदूषण के तौर पर हमें मुफ्त…

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Added by rajkumar sahu on June 12, 2011 at 11:14pm — No Comments

मैं अकेला हूँ प्रिये -

मैं अकेला हूँ प्रिये -

हर दृश्य में, हर श्राव्य में,

हर मूर्त में, हर काव्य में,

जो परे हर सुख से, मैं वो क्लान्त बेला हूँ प्रिये...

मैं अकेला हूँ प्रिये -

[१]   इक संग तेरे जीवन मधुर रसधार बन बहता गया,

   तेरे लिए हर क्लेश दुनिया का सहा, सहता गया,…

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Added by डॉ. नमन दत्त on June 12, 2011 at 6:00pm — 5 Comments

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - छग में नक्सली हमले से फिर शहीद हुए जवान।

पहारू - सरकार के कारिंदे इतना जरूर कहेंगे, मुआवजे का ऐलान कर दो।





2. समारू - छत्तीसगढ़ में सैकड़ों डॉक्टरों की कमी बरसों से बरकरार है।

पहारू - जो हैं, वही तो ड्यूटी पर नहीं आते।





3. समारू - छग में 15 जून से 15 जुलाई तक कर्मचारियों के स्थानांतरण होंगे।

पहारू - देखो, सबसे ज्यादा आंख में कौन खटका।





4. समारू - बाबा रामदेव ने संतो के कहने पर अनशन तोड़ा।

पहारू - राजनीति के बर्र को हाथ… Continue

Added by rajkumar sahu on June 12, 2011 at 4:37pm — No Comments

प्यार का नसीब

पसंद तो हर कोई आ जाता है,

किसी भी इंसान को आप अपनी पसंद

आसानी से बना सकते हो पर

प्यार हर किसी इंसान से नही होता

ज़रूरी नही कि आप जिसे पसंद करे

जिसे चाहते है उसी से आपको प्यार हो

प्यार तो कब किससे और

कहाँ हो जाए पता ही नही चलेगा

जब प्यार होता है तब उसका

सौंदर्य नही देखा जायेगा 

ना ही आप ये देख पयेंगे कि

आपकी पसंद क्या थी

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हर किसी इंसान से प्यार नही होता

हर किसी की किस्मत इतनी

अच्छी… Continue

Added by Rohit Singh Rajput on June 12, 2011 at 2:00pm — 3 Comments

गुल तेरे हम ख्वार लिए बैठे हैं....

तेरी याद के अम्बार लिए बैठे हैं,

गुल तेरे हम ख्वार लिए बैठे हैं.

 

क़त्ल कर.. दफना गया है तू जिसको,

हाथो मे वोही प्यार लिए बैठे हैं.

 

जीत का सेहरा तो तेरे सर पे सजा,

हाथ मैं हम 'हार' लिए बैठे हैं.

 

दुश्मन भी शरमा गया.. अब मुझसे,

सीने मैं, इतने वार लिए बैठे हैं.

 

पत्थर का, मुझे देखके दिल भर आया,

आँखों मैं वोह. गुबार लिए बैठे हैं,

 

'उफ़' नहीं मेरी कभी दुनिया ने सुनी,

सदा-ए-दिल…

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Added by इमरान खान on June 11, 2011 at 8:00pm — 5 Comments

हाँ मुझे ही रिश्ते निभाने नहीं आते....

ये रचना मैंने लिखी तो महा उत्सव अंक 8 के लिए थी ... १० जून की रात को पोस्ट भी की लेकिन

शायद मैंने ही लेट हो गया जो सम्मिलित नहीं हो पायी कोई बात यहीं.. ऐसे ही पोस्ट कर देता हूँ...

 

ये गीत मुझे ही गुनगुनाने नहीं आते,

हाँ मुझे ही रिश्ते निभाने नहीं आते



प्यारी ज़मी को मैंने सींचा था खून से,

हर एक बीज बोया था मैंने जूनून से



इक रोज़ भी न मैं तो आराम कर सका,

इक रात भी न मैं तो सोया सुकून से



अपनाऊँ हर शख्स…

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Added by इमरान खान on June 11, 2011 at 11:03am — 1 Comment

मुझपे छाया है नशा, बनके उम्मीदों का शजर....

(अदबी महफ़िल की अज़ीम शख्सियात को मेरा आदाब ! मैं बस ऐसे ही किसी को ढूंढते हुए यहाँ चला आया !वो मुझे मिल गया .. लेकिन साथ ही जादूयी जगह भी मिली ! मुझ जैसे शख्स, जो बहुत कुछ लिखना चाहता है सुनना चाहता है ! न तो मुझ पर कुछ कहना आता है न ही साथ निभाना, जब ओपन बुक ज्वाइन कर ही ली है तो सोचा.. अपनी तुकबंदी भी यहाँ पर जोड़ता चलूँ ! गुज़ारिश है सभी से के कुछ तनक़ीद ज़रूर करैं ... तरीफ के लायक तो मेरे अलफ़ाज़ हैं नहीं…

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Added by इमरान खान on June 10, 2011 at 6:30pm — No Comments

बस कुर्सी पर केवल बेईमान चाहिए.

बस कुर्सी पर केवल बेईमान चाहिए.

 


न जीव चाहिए न जहान चाहिए ,

बस कुर्सी पर केवल बेईमान चाहिए.

हैरत हो बाढ़  से या प्लेग का जमाना,

हैजा भूकंप और गोली का निशाना.

न आंख चाहिए न कान चाहिए,

बस कुर्सी पर केवल बेईमान चाहिए.



संविधान प्रजातंत्र पार्टी  व  नेता ,

घूस लूट फूट गुट दुनियां को देता,

न मान चाहिए न सम्मान चाहिए.

बस कुर्सी पर केवल बेईमान चाहिए.



आरक्षण की बोल के बोली…

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Added by R N Tiwari on June 10, 2011 at 3:00pm — No Comments

बाबा-अन्ना लाइव - मीडिया पर सरकारी चाबुक

देश, भ्रष्टाचार के बुखार से तप रहा है और आम जनता महंगाई की आग में जल रही है, मगर सरकार के कारिंदों को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि ऐसा नहीं होता तो वे इन घातक समस्याओं के मामले में माकूल कदम जरूर उठाते। बीते एक दशक में महंगाई चरम पर पहुंच गई है और इसकी आसमानी हवाईयां भी रूकने का नाम नहीं ले रहा है। भ्रष्टाचार की समस्या तो जैसे इस देश के लिए नासूर बनता जा रहा है। वैसे तो देश में सफेदपोश भ्रष्टाचारियों की कोई कमी नहीं है, यह इस बात से भी पता चलता चलता है कि ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब कोई… Continue

Added by rajkumar sahu on June 9, 2011 at 6:44pm — No Comments

26 बरसों से पिला रहा प्यासों को पानी

समाज सेवा की दिशा में वैसे तो कई तरह के अनुकरणीय कार्यों की बानगी आए दिन सुनने को मिलती है और उनके कार्यों से समाज के लोगों को निश्चित ही बहुत कुछ सीखने को मिलता है। ऐसी ही मिसाल कायम कर रहे हैं, जिला मुख्यालय जांजगीर से लगे नैला के श्री गोविंद सोनी। वे पिछले 26 बरसों से निःस्वार्थ ढंग से नैला रेलवे स्टेशन में गर्मी के दिनों में यात्रियों को पानी पिलाते आ रहे हैं। बरसों से जारी उनके जज्बे को देखकर हर कोई दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाता है, क्योंकि ढलती उम्र के बाद भी उनके चेहरे पर कहीं… Continue

Added by rajkumar sahu on June 9, 2011 at 2:51pm — 1 Comment

"व्यथा" मेरी, आवाज़ भी मेरी !

दोस्तो ! अपनी एक पुरानी रचना "व्यथा" सुना रहा हूं । बर्दाश्त कीजियेगा ।…

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Added by moin shamsi on June 9, 2011 at 2:00pm — No Comments

अब भगवान पैदा कर...

अब भगवान पैदा कर...

मेरा कहना अगर मानो तो,

एक इन्सान पैदा कर.

सम्हाले डोलती नैया,

बना बलवान पैदा कर.

तुम्हारे ही इशारे पर,

सभी ये दृश्य आते हैं.

हमारी प्रार्थना तुमसे…

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Added by R N Tiwari on June 9, 2011 at 8:00am — 2 Comments

‘वन्दना’

‘वन्दना’

हंस शोभित वीणा पाणिनि वेद गरिमा गायिनी माँ

नवित- नव रस, नवल पद- मय, चन्द्र सी छवि छायिनी माँ ।



पूर्ण शशि की अल्पना तुम, मुकुट ललिता मात मेरी,

अर्चना का दीप हो माँ इस जगत की आप प्रहरी ।

हंस शोभित वीणा पाणिनि वेद गरिमा गायिनी माँ,

नवित- नव रस, नवल पद- मय,चन्द्र सी छवि छायिनी माँ ।



मुझ अकिचंन को, चला दो विश्व के कल्याण पथ पर,

नव धवल शुचि शक्ति संग,निकलूं सदा निर्वाण रथ पर ।

बन अजेय माँ मै बजाऊ, नित तेरी हर प्रात भेरी ,

अर्चना… Continue

Added by Chandraprakash Jha on June 8, 2011 at 10:00pm — 1 Comment

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - उमा भारती पुराने कुनबे भाजपा में लौट आई है।

पहारू - जिस दिन मूड बिगड़ा, उस दिन पूरे कुनबे को खरी-खोटी सुनाएगी।



2. समारू - रायपुर नगर निगम में खड़ी गाड़ियां डीजल पी रही हैं।

पहारू - कौन सी नई बात है, छग में अरबों के निर्माण कार्य कागजों में हो जाते हैं।



3. समारू - बाबा रामदेव ने केन्द्र सरकार को माफ कर दिया है।

पहारू - यही तो सत्याग्रह व सच्ची गांधीवादी है, कोई एक गाल को मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो।



4. समारू - छग के गृहमंत्री ने डीजीपी पर… Continue

Added by rajkumar sahu on June 8, 2011 at 2:44pm — 1 Comment

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू -दिग्विजय सिंह ने लादेन को ‘ओसामा जी’ कहा। पहारू - विवादों में नहीं होने पर उनके पेट का चारा नहीं पचता। 2. समारू - बाबा रामदेव के पीछे भाजपाई राजनीति कर रहे हैं। पहारू - भाजपा में नैया पार कराने वाला कोई नेता भी तो नहीं है। 3. समारू - छग सरकार दो बच्चों से अधिक होने पर नौकरी नहीं देगी। पहारू - मगर चार-छह बच्चे वाले नेता को मंत्री जरूर बना सकती है। 4. समारू - बाबा के सत्याग्रह व अनशन से सरकार घबरा गई है। पहारू - क्यों नहीं, सत्ता की कुर्सी का सवाल जो है। 5. समारू - देश में भ्रष्टाचार व… Continue

Added by rajkumar sahu on June 8, 2011 at 1:34am — 1 Comment

जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान

नैनों में अश्रु बन छाया,होठों पर मुस्कान,
जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान

जीवन में सब पाने की जब अपने मन में ठानी,
तभी सामने आ गयी जीवन की बेईमानी .

देने को हमें कुछ न लाया ये जीवन महान,
जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान,

हमने जब कुछ भी है चाहा हमें नहीं मिल पाया,
जो पाया था इस जीवन में उसे भी हमने गंवाया,

फिर क्यों हालत देख के अपनी होते हैं हैरान,
जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान.
शालिनी कौशिक

Added by shalini kaushik on June 8, 2011 at 12:14am — 1 Comment

ग़ज़ल : भ्रष्टाचार की आंधी तेज है इस कदर की.................

यहाँ कुछ नहीं मिलता है,उल्फत की किरदार में.
खूब मुनाफा हो रहा है, नफरत के कारोबार में.


सत्य अहिंसा की बाते महज एक छलावा है..

सच खड़ा है सर झुकाए झूठों  के बाज़ार में.


आज लूटेरे पढ़ा रहे है…
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Added by Noorain Ansari on June 7, 2011 at 11:00am — No Comments

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