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Manan Kumar singh's Blog – May 2015 Archive (15)

आशियाना ढूंढते हैं

गजलनुमा कविता(मनन कु. सिंह)

हम बस महज इक आशियाना ढूँढते हैं,

तुम्हें लगा बात करने का बहाना ढूँढ़ते हैं।

उब चुके कबके थे मकां तेरे रहते-रहते,

अब बस इक घर का ताना-बाना ढूँढ़ते हैं।

बिन पत्तों की छाँव में कहते होता क्या,

हम तो पतझड़ में गुजरा जमाना ढूँढ़तेे हैं।

टूटे तारों से कहते क्या रिश्ता है धुन का,

हम तो उनमें छूटा हुआ तराना ढूँढ़ते हैं।

साँसें टँगी हैं मेरी, फिर आरजू है बाकी,

हम तेरी साँसों का आना-जाना ढूँढ़ते हैं।

सो गया जहाँ सारे पन्ने… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 29, 2015 at 10:15am — 10 Comments

कविता की चोरी(कविता,मनन कु.सिंह)

कविता की चोरी

कविता छपी किताब में

'कविता' हुई प्रसन्न,

नाम अपर का देख कर

रह गयी फिर सन्न।

बोली जाकर अंकिता से

'तू करती कविता की चोरी,

मुद्रित मेरी,तूने मरोड़ी।'

अंकिता अलग गुर्रायी-

'कहाँ की है तू रे लुगाई?

कविता क्या होती पता है?

यह मेरे रग-रग में बसी है,

मेरे कुल-सरोवर की हंसी है,

मेरी विरासत, आदत है,

मत समझ तिजारत है,

कविता चुराकर थी छपवायी,

मेरी थी,छपी तो आ चिल्लायी,

जा कहीं पल्ले पड़,ऐसा न कर।'

कविता थी… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 27, 2015 at 9:30pm — 7 Comments

फासले(कविता,मनन कु सिंह)

दरमियाँ के फासले जाने लगेंगे एक दिन,

आते-आते याद हम आने लगेंगे एक दिन।

जगते-सोते ख्वाब हम सहेजते तेरे अभी

अब तेरे ख्वाब हम आने लगेंगे एक दिन।

अपने दीये जले घर तेरे,ऐसा लगता है,

दीप तेरे अपने घर छाने लगेंगे एक दिन।

तेरी हीधुन को सहेजे गीत पिरोये मैंने जी,

मेरे नगमे तेरे लब आने लगेंगे एक दिन।

चाहतें अपनी मुकम्मल नाम तेरे हो गयीं,

हम तुझको लगताअबभाने लगेंगे एक दिन।

मांगता हूँ जिंदगी,तो भाव खाती जिंदगी,

जिंदगी से भाव हम खाने लगेंगे एक…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 26, 2015 at 10:00am — 5 Comments

विवाह(कविता)

जरुरी है क्या कि प्रेम हो तो विवाह भी हो?
गर कहीं हो जाये तो आगे निर्वाह भी हो?
आज का प्रेम है,पुरखों की बात पुरानी हुई,
जरुरी है क्या सबके मन में उछाह भी हो?
साथ का सिलसिला चलता रहेगा आगे भी,
जरुरी है क्या तेरे लिए मन में कराह भी हो?
जरूरतों का कुछ भी तो नाम होना चाहिए,
ढेर-सारी जरूरतों के आगे तो विवाह भीहो!
प्रेम हो,फिर विवाह,चाहे विवाह हो तब प्रेम,
प्रेमपूर्ण हो,फिर वही विवाह तो विवाहभी हो!
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on May 25, 2015 at 6:59am — 7 Comments

औरत(कविता)

मजदूर कह औरत की तौहीन मत कर,
गम हैं बहुत उसे,और गमगीन मत कर।
उसके आँसू लबरेज हैं तीखी कथाओं से,
अब उन्हें देख,ज्यादा नमकीन मत कर।
खूब धुली अबतक कलम उसकी धार में,
लेखनी को देख,ज्यादा हसीन मत कर।
अर्थ की माफिक उसकी हकीकत कब ?
अर्थ वह खुद, खुद को जहीन मत कर।
नूर बख्शती रही वह ज़माने को कबसे,
छोड़ फिकरे,फिर पर्दानशीन मत कर।
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन(01/05/2015)

Added by Manan Kumar singh on May 24, 2015 at 8:00pm — 6 Comments

तू कितनी अजीज है(कविता)

तू कितनी अजीज है!(ककिता)
कैसे कहें ये दास्ताँ कि तू कितनी अजीज़ है
क्या पता कबआया दिल आजाने की चीज है
उड़ने लगीं हवाएँ जब तेरी जुल्फों से टकरा
तब लगा हर शय तुम्हारे सामने नाचीज है।
दिल को रहें सँभालते दिललगी से डर जिन्हें
लगता हर बंदा जहाँ में हुश्न का मरीज है।
कितनी कलाएँ चाँद की तेरे मुखड़े की बला,
चूमती हो गैर को,देख मुझको तो खीज है।
गड़ गयीं नजरें जहाँ की देख तेरी हर लहर,
भीड़ से रौंदा गया मैं,फट गयी कमीज है।
'मौलिक व अप्रकाशित'

Added by Manan Kumar singh on May 24, 2015 at 11:00am — 3 Comments

थोड़-थोडा(कविता)

थोड़ा-थोड़ा तुझसे अटकने लगा हूँ,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं भटकने लगा हूँ।

छोटी-छोटी बातें न समझा कभी,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं समझने लगा हूँ।

गरजा हूँ बहुत पहले बातों पे  मैं,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं सरसने लगा हूँ।

बदली वह लदी  कब से ढोये चला ,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं बरसने लगा हूँ।

शुकूं में था प्यासा,नजर तेरी पी के ,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं तरसने लगा हूँ।

कहाँ-कहाँ अबतक अटकता रहा था,

थोड़ा-थोड़ा अब मैं झटकने लगा हूँ।

भटकता फिरा हूँ मैं ,तेरी नजर में

थोड़ा-थोड़ा अब मैं…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 23, 2015 at 7:00am — 3 Comments

रोज रोज बातें बदल लेती तू(कविता)

रोज-रोज बातें बदल लेती तू,

रोज-रोज घातें बदल लेती तू।1

मंजिल मुझे तो मिली ही नहीं,

रोज-रोज नाते बदल लेती तू।2

मैं बातों से तेरी मचलता कभी,

रोज-रोज अपने मचल लेती तू।3

शब्दों से तेरे बुनता मैं गीत कोई,

रोज-रोज मेरी गजल लेती तू।4

भंगिमा पे तुम्हारी भटकूँ कहाँ?

रोज-रोज रुख अचल लेती तू।5

चलता चला यूँ तो मैं ही अकेला,

रोज-रोज रूकी,न चल लेती तू।6

कहे बिन दिन तू ले लेती है मेरे,

रोज-रोज रातें बेकल लेती तू।7

तुम्हारी हँसी में मैं ढलता… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 21, 2015 at 8:38pm — 2 Comments

सलामती की दुआ(कविता)

वे मेरी सलामती की दुआ करते हैं
दूर रहते भी मेरे पास हुआ करते हैं
आ जाते पास मेरे खिड़की के रस्ते
बातें शुरू हों कि खत्म मुआ करते हैं
कुछ तो सिफत है मेरे दोस्त में कि
कुछ कहते मेरा दिल छुआ करते हैं
गोधूलि की ललाई रौनक ए सहर हो
अब हम हयात- ए -जुआ करते हैं।
बड़े बेदम हो जाते इस आवाजाही से,
गुल-ए-ख्वाब जब जुदा हुआ करते हैं।
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on May 20, 2015 at 6:59am — 4 Comments

बुला लेते(कविता)

नूरे-नजर से देखिये,फिर नूर आ जाता,
तबीयत से बुला लें,रब हुजूर आ जाता।
रहे आपको बुलाते अरसा गुजर गया,
आप जो बुलाते, बंदा जरूर आ जाता।
ढका रहा चाँद घटाओं में,हटाते गेशू,
पल भर ही,नजर भरपूर आ जाता।
कैसी झिझक यह? देख लेते एक बार,
आपकी नजर बंदा कम दूर आ जाता।
चिलमन-चादर-ए-बेरुखी,ख्वाहिशे-जहाँ,
हटाते,फिजा-ए-प्यार का शुरुर आ जाता।
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on May 19, 2015 at 7:17am — 7 Comments

आ दुआ करें (कविता)

आ दुआ करें 

आ दुआ करें मिलजुल,

निःस्वार्थ हो बिलकुल,

प्रभु!रचना तेरी चुलबुल,

हँसने दे अभी खुलखुल।…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 15, 2015 at 8:30am — 3 Comments

मैं,वह और तुम (अतुकांत कविता)

*मैं वह और तुम*

मैं पुरुष हूँ,

वह स्त्री,

तुम तुम हो--

श्रोता,पाठक, निर्णायक

सबकुछ।

मैंने उसे अपने को कहने

यानी लिखने के लिए 

प्रेरित करना चाहा,

अपना युग-धर्म निबाहा,

बोली-मुझे हिंदी में लिखना

नहीं आता,है मुझे सीखना।

'सीखा दूँगा सब', मैंने कहा,

मामला बस वहीं तक रहा।

एक दिन एक कथा आयी-

'मेरी सहेली ने ड्राइविंग

सीखना चाहा,

उसके बॉस ने हामी भर दी,

कहा, 'सीखा दूँगा सब',

फिर ड्राइविंग शुरू होती

कि…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 14, 2015 at 8:47am — 6 Comments

बातों में आ जाता हूँ (गजल)

जब बातों में आ जाता हूँ।

तब मैं धोखा खा जाता हूँ,

तू नैनों में बसती हरदम,

तेरी पलकें छा जाता हूँ।

मेरी जां तू कह देती है,

तुझपे जां लु'टा जाता हूँ।

बज़मे-बेदिल से मैं भी तो,

देखो अब रुठा जाता हूँ।

तुझको सहरा फरमाते लेे

फिर मैं अब बु'झा जाता हूँ।

दीया जलने दे जानेमन,

शब तेरी अब उ'ड़ा जाता हूँ।

जल-जल कर जलता दीया हूँ,

तम पी हर दिश छा जाता हूँ।…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 8, 2015 at 11:00pm — 10 Comments

शब्दों की फरियाद(कविता)

शब्द कुछ मेरे घर फरियाद लेकर आ गये,
भाव लगता गौण,शब्द कोश वाले छा गये।
भावों की लहरें उमड़ा किया करतीं कभी,
अर्थ उनके बाँचते हम कई दफा नहा गये।
बादल नहीं बनाये,जब भर आये तेरे नयन,
हमने तो इतना कहा-घन गगन में छा गये।
या उनके जो खुले केश चाँद पर छाने लगे,
हमने रे इतना कहा-फिर से घन लहरागये
आज हमें ढूँढ-ढूँढ गढ़ रहे सब भाव-रूप,
भावना अचेत पड़ी और हम शरमा गये।
मौलिक व स्वरचित@मनन

Added by Manan Kumar singh on May 3, 2015 at 9:47am — 4 Comments

अनुभव(लघुकथा)


-नहीं।
-क्यों?
-डरती हूँ,कुछ इधर-उधर न हो जाए।
-अब डर कैसा?बहुत सारी दवाएँ आ गयी हैं,वैसे भी हम शादी करनेवाले हैं न।
-कब तक?
-अगले छः माह में।
-लगता है जल्दी में हो।
-क्यों?
-क्योंकि बाकि सब तो साल-सालभर कहते रहे अबतक।
लड़के की पकड़ ढीली पड़ गयी।दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।  फिर लड़की ने टोका
-क्यों,क्या हुआ?तेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ है क्या?


'मौलिक व अप्रकाशित' @मनन

Added by Manan Kumar singh on May 1, 2015 at 8:30pm — 12 Comments

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