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Sanjiv verma 'salil''s Blog – June 2010 Archive (14)

हाइकु गीत: आँख का पानी संजीव 'सलिल'

हाइकु गीत:



आँख का पानी





संजीव 'सलिल'



*

आँख का पानी,

मर गया तो कैसे

धरा हो धानी?...

*

तोड़ बंधन

आँख का पानी बहा.

रोके न रुका.



आसमान भी

हौसलों की ऊँचाई

के आगे झुका.



कहती नानी

सूखने मत देना

आँख का पानी....

*

रोक न पाये

जनक जैसे ज्ञानी

आँसू अपने.



मिट्टी में मिला

रावण जैसा ध्यानी

टूटे सपने.



आँख से पानी

न बहे, पर रहे

आँख का… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 27, 2010 at 10:50pm — 4 Comments

मुक्तिका: ज़िन्दगी हँस के.... ---संजीव 'सलिल'

आज की रचना : मुक्तिका:

:संजीव 'सलिल'





ज़िन्दगी हँस के गुजारोगे तो कट जाएगी.



कोशिशें आस को चाहेंगी तो पट जाएगी..





जो भी करना है उसे कल पे न टालो वरना



आयेगा कल न कभी, साँस ही घट जाएगी..





वायदे करना ही फितरत रही सियासत की.



फिर से जो पूछोगे, हर बात से नट जाएगी..





रख के कुछ फासला मिलना, तो खलिश कम होगी.



किसी अपने की छुरी पीठ से सट जाएगी..





दूरियाँ हद से न ज्यादा हों 'सलिल'… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 24, 2010 at 10:58pm — 1 Comment

मुक्तिका: ...आँख का पानी. ---संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



आँख का पानी



संजीव वर्मा 'सलिल'

*

आजकल दुर्लभ हुआ है आँख का पानी.

बंद पिंजरे का सुआ है आँख का पानी..



शिलाओं को खोदकर नाखून टूटे हैं..

आस का सूखा कुंआ है आँख का पानी..



द्रौपदी को मिल गया है यह बिना माँगे.

धर्मराजों का जुआ है आँख का पानी..



मेमने को जिबह करता शेर जब चाहे.

बिना कारण का खुआ है आँख का पानी..



हजारों की मौत भी उनको सियासत है.

देख बिन बोले चुआ है आँख का पानी..



किया… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 23, 2010 at 10:30pm — 2 Comments

स्मृति गीत: हर दिन पिता याद आते हैं... संजीव 'सलिल'

स्मृति गीत:







हर दिन पिता याद आते हैं...





संजीव 'सलिल'





*





जान रहे हम अब न मिलेंगे.





यादों में आ, गले लगेंगे.





आँख खुलेगी तो उदास हो-





हम अपने ही हाथ मलेंगे.





पर मिथ्या सपने भाते हैं.





हर दिन पिता याद आते हैं...





*





लाड, डांट, झिडकी, समझाइश.





कर न सकूँ इनकी पैमाइश.





ले पहचान गैर-अपनों… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 20, 2010 at 7:49pm — 2 Comments

भोजपुरी के संग: दोहे के रंग ---संजीव 'सलिल'

भोजपुरी के संग: दोहे के रंग





संजीव 'सलिल'





भइल किनारे जिन्दगी, अब के से का आस?



ढलते सूरज बर 'सलिल', कोउ न आवत पास..



*



अबला जीवन पड़ गइल, केतना फीका आज.



लाज-सरम के बेंच के, मटक रहल बिन काज..



*



पुड़िया मीठी ज़हर की, जाल भीतरै जाल.



मरद नचावत अउरतें, झूमैं दै-दै ताल..



*



कवि-पाठक के बीच में, कविता बड़का सेतु.



लिखे-पढ़े आनंद बा, सब्भई… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 20, 2010 at 7:33pm — 2 Comments

दोहा का रंग भोजपुरी के संग: संजीव वर्मा 'सलिल'

दोहा का रंग भोजपुरी के संग:





संजीव वर्मा 'सलिल'





सोना दहलs अगनि में, जैसे होल सुवर्ण.



भाव बिम्ब कल्पना छुअल, आखर भयल सुपर्ण..



*



सरस सरल जब-जब भयल, 'सलिल' भाव-अनुरक्ति.



तब-तब पाठकगण कहल, इहै काव्य अभिव्यक्ति..



*



पीर पिये अउ प्यार दे, इहै सृजन के रीत.



अंतर से अंतर भयल, दूर- कहल तब गीत..



*



निर्मल मन में रमत हे, सदा शारदा मात.



शब्द-शक्ति वरदान दे, वरदानी… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 17, 2010 at 8:54am — 3 Comments

कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... --संजीव 'सलिल'

कथा-गीत:

मैं बूढा बरगद हूँ यारों...

संजीव 'सलिल'

*

MFT01124.JPG



*

मैं बूढा बरगद हूँ यारों...



है याद कभी मैं अंकुर था.

दो पल्लव लिए लजाता था.

ऊँचे वृक्षों को देख-देख-

मैं खुद पर ही शर्माता था.



धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ.

शाखें फैलीं, पंछी आये.

कुछ जल्दी छोड़ गए मुझको-

कुछ बना घोंसला रह पाये.



मेरे कोटर में साँप एक

आ बसा हुआ मैं बहुत दुखी.

चिड़ियों के अंडे खाता था-

ले गया सपेरा, किया… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 17, 2010 at 12:06am — 6 Comments

त्रिपदिक मुक्तिका (अनुगीत) : सत-शिव-सुन्दर सृजन कर ---संजीव 'सलिल'

त्रिपदिक मुक्तिका (अनुगीत) :



सत-शिव-सुन्दर सृजन कर



संजीव 'सलिल'



*

*



सत-शिव-सुन्दर सृजन कर,



नयन मूँद कर भजन कर-



आज न कल, मन जनम भर.







कौन यहाँ अक्षर-अजर?



कौन कभी होता अमर?



कोई नहीं, तो क्यों समर?





किन्तु परन्तु अगर-मगर,



लेकिन यदि- संकल्प कर



भुला चला चल डगर पर.





तुझ पर किसका क्या असर?



तेरी किस पर क्यों… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 14, 2010 at 9:10am — 5 Comments

सामयिक त्रिपदियाँ : ---संजीव 'सलिल'

सामयिक त्रिपदियाँ :

संजीव 'सलिल'

*



raining.gif





*

खोज कहाँ उनकी कमर,

कमरा ही आता नज़र,

लेकिन हैं वे बिफिकर..

*

विस्मय होता देखकर.

अमृत घट समझा जिसे

विषमय है वह सियासत..

*

दुर्घटना में कै मरे?

गैस रिसी भोपाल में-

बतलाते हैं कैमरे..

*

एंडरसन को छोड़कर

की गद्दारी देश से

नेताओं ने स्वार्थ वश..

*

भाग गया भोपाल से

दूर कैरवां जा छिपा

अर्जुन दोषी देश का..

*

ब्यूटी… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 13, 2010 at 9:11pm — 4 Comments

कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर की एक रचना का भावानुवाद: ---संजीव 'सलिल'

कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर की एक रचना का भावानुवाद:

संजीव 'सलिल'

*

*

रुद्ध अगर पाओ कभी, प्रभु! तोड़ो हृद -द्वार.

कभी लौटना तुम नहीं, विनय करो स्वीकार..

*

मन-वीणा-झंकार में, अगर न हो तव नाम.

कभी लौटना हरि! नहीं, लेना वीणा थाम..

*

सुन न सकूँ आवाज़ तव, गर मैं निद्रा-ग्रस्त.

कभी लौटना प्रभु! नहीं, रहे शीश पर हस्त..

*

हृद-आसन पर गर मिले, अन्य कभी आसीन.

कभी लौटना प्रिय! नहीं, करना निज-आधीन..



Acharya Sanjiv Salil… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 13, 2010 at 9:00pm — 4 Comments

मुक्तिका: ...चलो प्रिय. ---संजीव 'सलिल'

मुक्तिका
...चलो प्रिय.
संजीव 'सलिल'
*
लिये हाथ में हाथ चलो प्रिय.
कदम-कदम रख साथ चलो प्रिय.

मैं-तुम गुम हो, हम रह जाएँ.
बन अनाथ के नाथ चलो प्रिय.

तुम हो मेरे सिर-आँखों पर.
मुझे बनाकर माथ चलो प्रिय.

पनघट, चौपालें, अमराई
सूने- कंडे पाठ चलो प्रिय.

शत्रु साँप तो हम शंकर हों
नाच, नाग को नाथ चलो प्रिय.

'सलिल' न भाती नेह-नर्मदा.
फैशन करने 'बाथ' चलो प्रिय.

***********************

Added by sanjiv verma 'salil' on June 9, 2010 at 11:58am — 7 Comments

त्रिपदिक नवगीत : नेह नर्मदा तीर पर ---संजीव 'सलिल'

अभिनव सारस्वत प्रयोग:



त्रिपदिक नवगीत :



नेह नर्मदा तीर पर



संजीव 'सलिल'



*

नेह नर्मदा तीर पर,

अवगाहन का धीर धर,

पल-पल उठ-गिरती लहर...

*

कौन उदासी-विरागी,

विकल किनारे पर खड़ा?

किसका पथ चुप जोहता?



निष्क्रिय, मौन, हताश है.

या दिलजला निराश है?

जलती आग पलाश है.



जब पीड़ा बनती भँवर,

खींचे तुझको केंद्र पर,

रुक मत घेरा पार कर...

*

नेह नर्मदा तीर पर,

अवगाहन का धीर… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 9, 2010 at 11:32am — 4 Comments

गीत : भाग्य निज पल-पल सराहूँ..... संजीव 'सलिल'

गीत :



भाग्य निज पल-पल सराहूँ.....



संजीव 'सलिल'



*



भाग्य निज पल-पल सराहूँ,



जीत तुमसे, मीत हारूँ.



अंक में सर धर तुम्हारे,



एक टक तुमको निहारूँ.....





नयन उन्मीलित, अधर कम्पित,



कहें अनकही गाथा.



तप्त अधरों की छुअन ने,



किया मन को सरगमाथा.



दीप-शिख बन मैं प्रिये!



नीराजना तेरी उतारूँ...







हुआ किंशुक-कुसुम सा तन,



मदिर महुआ मन हुआ… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 8, 2010 at 1:00am — 8 Comments

बाल कविता : गुड्डो-दादी --संजीव 'सलिल'

बाल कविता :

गुड्डो-दादी

संजीव 'सलिल'

*



गुड्डो नन्हीं खेल कूदती.

खुशियाँ रोज लुटाती है.

मुस्काये तो फूल बरसते-

सबके मन को भाती है.

बात करे जब भी तुतलाकर

बोले कोयल सी बोली.

ठुमक-ठुमक चलती सब रीझें

बाल परी कितनी भोली.



दादी खों-खों करतीं, रोकें-

टोंकें सबको : 'जल्द उठो.

हुआ सवेरा अब मत सोओ-

काम बहुत हैं, मिलो-जुटो.

काँटें रुकते नहीं घड़ी के

आगे बढ़ते जायेंगे.

जो न करेंगे काम समय पर

जीवन भर… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 7, 2010 at 9:45am — 5 Comments

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