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बोल उठी सच हैं लकीरें तेरी पेशानी की(७६ )

(2122 1122 1122 22 /112 )

बोल उठी सच हैं लकीरें तेरी पेशानी की

इस जवानी ने बहुत जिस्म की मेहमानी की

**

क्या दिया कोई किसी अपने को धोका तूने

वज्ह  आख़िर तो कोई होगी पशेमानी की 

**

वक़्त का पहिया लगातार चले मर्ज़ी से

फ़िक्र उसको नहीं दुनिया की परेशानी की

**

आब जिस रूप में हो उसकी बशर है क़ीमत…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 27, 2020 at 11:00pm — 4 Comments

सरकारी राशन



गांव मुहल्लों के लोग कोरोना के कहर के भय से मुक्त अब राहती राशन की आस में खुश हैं।मुखिया, सरपंच और गांव के अगहरिया लोगों के सभी लोग राशन कार्ड धारी हैं ही,लाल कार्ड वाले भी हो गए हैं।भले ही साधन संपन्न हों,तो क्या हुआ?एक बार कुछ ले देकर नाम शामिल हो गए,तो फिर चांदी ही चांदी है।मुफ्त का माल खाते रहिए।पूछता ही कौन है? वातावरण इसी मुआफिक बना हुआ है।कल्लू खेतिहर की बीवी बगल के घर आई है।

" कल अनाज लेने जाना होगा", कल्लू की बहुरिया इतराती हुई बोली।

" कहा से?"अनजान बनती हुई मास्टर भोला…

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Added by Manan Kumar singh on March 27, 2020 at 7:06pm — 2 Comments

ऐ पागल पथिक !

ऐ पागल पथिक ! ठहरो जरा ,

रुको जरा , सांस लो तनिक ,

सम्भलो जरा I

सब कुछ पाने की चाह में ,

कुछ टूट गया उस आशियाने में,

कुछ छूट गया उस हसीं फ़सानें में ,

ठहरों, रुको, उसे सवारों, उसे खोजो जरा I

रुको जरा ........

घर पर नन्हों की आस में ,

और बुजुर्गों की लम्बी प्यास में ,

छूटे किसी साज और रियाज़ में ,

वक्त की चीनी घोलो जरा, कोई सुर ताल छेड़ो जरा I

रुको जरा ........

लूडो की गोटियाँ खोजो ,

शतरंज की बिसात बिछाओ जरा ,

कैरम की धूल…

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Added by Dr. Geeta Chaudhary on March 27, 2020 at 3:32pm — 2 Comments

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ ?

जो दिल से भाव निकलते हैं

वह कोमल सा अहसास कहाँ ?

है नर्तन मधुर तरंगों सा

अपना ' प्रणाम ' अन्यान्य कहाँ ?

जिससे झंकृत हृद - तार मृदुल

वह सुन्दरता , उल्लास कहाँ

जब बच्चा ' अम्मा , कहकर के

जा , माँ के गले लिपटता है

इस नैसर्गिक उद्बोधन में

अद्भुत आनन्द , हुलास कहाँ ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ…

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Added by Usha Awasthi on March 27, 2020 at 9:33am — 10 Comments

कोरोना का तांडव

पंख कटे पंछी हुए ,सीमित हुयी उड़ान

सर पे अम्बर था जहाँ, छत है गगन समान

सारी दुनिया सिमट कर कमरे में है कैद

घर के बाहर है पुलिस, खड़ी हुई मुश्तैद

जिनकी शादी ना हुयी , उनकी मानो खैर

और हुयी जिनकी न लें, घर वाली से बैर

घर के कामो में लगें, हर विपदा लें टाल

साँप छुछूंदर गति न हो, करफ्यू या भूचाल

भागवान से लड़ नहीं, बात ये मेरी मान

भागवान के केस में, चुप रहते भगवान

प्रथम दिवस आखिर कटा, साँसों में थे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on March 26, 2020 at 7:54pm — 2 Comments

कोरोना पर जीत मंत्र

आप अपने आप को ,कर लो घर में बंद।
फिर खुशियां ही खुशियां है, मुश्किल के दिन चंद।।

सेनीटाइजर या साबुन से, धो लो अपने हाथ।
ज्यादा गर याद आए अपनों की, तो फोन पर कर लो बात।।

हम सबको मिलकर लड़नी है, कोरोना की लड़ाई।।
एक दूजे से दूरी ही ,इसकी है दवाई ।।

कानून तुम मान लो ,सुने कर दो रास्ते ।।
हेलो हाय छोड़ के, बस करो नमस्ते ।।

दाल रोटी से काम चला लो, छोड़ो तुम मेवा ।।
घर पर रहकर कर लो, देश की सेवा।।
द्वारा भूपेन्द्र सिंह राणावत

Added by Bhupender singh ranawat on March 26, 2020 at 7:48pm — 1 Comment

जी हाँ (ग़ज़ल)

हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 / 1222 / 1222 / 122

अभी भी है तुम्हें उस बेवफ़ा से प्यार? जी हाँ

निभाने को ये ग़म ता-उम्र हो तय्यार? जी हाँ [1]

उसे देखे बिना इक पल नहीं था चैन दिल को

उसे फिर देखना चाहोगे तुम इक बार? जी हाँ [2]

सिवा ज़िल्लत मिला कुछ भी नहीं कूचे से उसके

अभी भी क्या तुम्हें जाना है कू-ए-यार? जी हाँ [3]

पता तो है तुम्हें सर माँगती है ये मुहब्बत

तो क्या जाओगे हँसते हँसते…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 26, 2020 at 3:38pm — 5 Comments

सब निरोग सब हों सुखी

कोरोना का संक्रमण सारे देश , जहान

है दुस्साध्य परिस्थिति , मुश्किल में है जान

इस संकट की घड़ी में हमको रहना एक

दृढ़ संकल्पित हों खड़े , भुला सभी मतभेद

सर्व हिताय खड़े हुए डा0 नर्स तमाम

पुलिस महकमे के लिए है आराम हराम

नित सफाई कर्मी करें बिना शिकन के काम

इनके सेवा भाव को शत , शत मेरा प्रणाम

आई है , टल जाएगी , यह जो बड़ी विपत्ति

अनुशासित घर में रहें बिना किसी आपत्ति

सब निरोग , सब हों सुखी , करना यही…

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Added by Usha Awasthi on March 25, 2020 at 5:32pm — 2 Comments

ज़रा  सोचें  अगर इंसान सब लोहा-बदन  होते(७५ )

(1222 1222 1222 1222 )

ज़रा  सोचें  अगर इंसान सब लोहा-बदन  होते

यक़ीनन फिर क़ज़ा आने पे पत्थर के क़फ़न होते

**

निज़ामत ग़ौर करती  गर ग़रीबों की तरक़्क़ी पर

वतन में अब तलक भी लोग क्या नंगे बदन होते ?

**

फ़िरंगी की अगर हम नक़्ल से परहेज़ कर लेते 

नई पीढ़ी के फ़रसूदा भला क्या पैरहन होते ?

**

जूँ  लुटती आज है लुटती इसी मानन्द  गर   क़ुदरत

तो क्या दरिया शजर बचते कहीं पर कोई बन होते ?

**

अगर इन्सां न  मज़हब और फिरकों में बँटा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 25, 2020 at 5:00pm — 3 Comments

मानव तेरी करनी

विवेक पर जब मन हावी हो जाता है,

तभी तो ऐसा मंजर नजर आता है।

हे मानव, तू अड़ा रहा मनमानी पे,

किया निरंतर खिलवाड़ प्रकृति से।

हे अधम, प्रगति के मद में,

तूने प्रकृति का तिरस्कार किया।

बस, मैं ही मैं हूं ,तू इस खुश फहमी में जिया।

पर, मत भूल, प्रकृति जब विकराल रूप धर लेती है,

फिर वह सांसे भी हर लेती है।

अब भी समय है, हे मानव ,संभल जा,

अपनी हरकतों से बाज आ।



सुन, ए नादान ,गर जीना है सुकून से,

तो प्रकृति की शरण में जा।

वो मां है,… Continue

Added by Bhupender singh ranawat on March 25, 2020 at 2:11pm — 1 Comment

कोरोना का क्या रोना

जितना हो सकता हो दूरियां बनाइये

मुख से न कहके नयन से जताइये


घबराइये न दिल को दिलासा दिलाइये

विपदा की घड़ी में भी बस  मुस्कुराइये


जीभर  के बात अपनी सबको सुनाइये

बस थोड़ा और अपने मुँह को घुमाइये


घर जो आये हाथ  सोप से धुलाइये

पी के नींबू नींद भी गहरी लगाइये


बस प्राणायाम योग  ध्यान आजमाइये

प्रतिरोध…
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Added by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2020 at 1:43am — 3 Comments

कोरोनामय दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

कोरोनामय जग हुआ, फीका पड़ा बसन्त

माँगे खुद की खैर अब, राजा, रंक, महन्त।१।

**

जन्मा चाहे चीन में, लाये अपने लोग

जिससे सारे देश में, फैल रहा यह रोग।२।

**

विकट घड़ी में आपदा, आयी सबके द्वार

घर के बाहर आ मगर, करो नहीं सत्कार।३।

**

घर में बैठो चन्द दिन, ढककर खिड़की द्वार

कोरोना पर  वार  को, यही सफल  हथियार।४।

**

आज चिकित्सक का कहा, थोड़ा मानव मान

घर  में  चुपके  बैठ  कर, होगा  रोग  निदान।५।

**

करो नमस्ते दूर से , नहीं मिलाओ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 24, 2020 at 8:04pm — 2 Comments

प्रणय-परीक्षा

प्रणय-परीक्षा

सुना है कुछ ऐसा केवल

स्वप्न-लोक में 

या परियों की कहानी में होता है

सात समुद्र पार से आता है

घोड़े पर सवार

सात युगों का प्यार

पर हवा-सी झूमती

शैतानी-भरी हँसी हँसती

भरे आँखों में खुमारी की लालिमा

ऐसी गुड़िया से मिलना

मेरे जीवन के रंग-मंच पर

यह कोई सपना नहीं था

काट रही थी कब से मुझको

समय की तेज़ धार

मिला हवा की लहर-सा…

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Added by vijay nikore on March 23, 2020 at 12:30pm — 2 Comments

क्यों चलते औरों के पथ पर स्वयं बनाओ अपनी राहें |(७४ )

एक ताज़ा गीत

=========

क्यों चलते औरों के पथ पर

स्वयं बनाओ अपनी राहें |

**

माँ की उँगली थाम बहुत तुम

सीख गए पाँवोँ पर चलना |

लेकिन अब काँटों के पथ पर

खुद ही गिरना और सँभलना |

जीवन-रण से बचना मुश्किल

लड़कर करनी जीत सुनिश्चित,

भाग नहीं सकता है कोई

मित्र भागना खुद को छलना |

तुम अपने जीवन के नायक

कोई काम करो अब ऐसा,

जिससे तुम पर दुनिया भर के

सब लोगों की टिके निगाहें…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 23, 2020 at 12:00am — 2 Comments

जीवन का कर्फ्यू

जीवन का कर्फ्यू

रोजमर्रा की तरह टहलते हुये रामलाल उद्यान में गोपाल से मिला तो उसके चेहरे की झाईयां से झलकती खुशी कुछ और ही बयां कर रही थी।इससे पहले मैं कुछ पूछता कि उसने कहा, 'यार,कल जैसा दिन गुजारे जमाना हो गया।'

'पर यार कल तो कर्फ्यू लगा था।न किसी से मिलना-जुलना हुआ।कितना बोरियत भरा दिन था?'

'तेरे लिए था।पर इसने मेरी जिन्दगी के कर्फ्यू को हटा दिया।'

'कुछ समझा नही?'प्रश्न भरी निगाह से रामलाल ने गोपाल की तरफ देखकर कहा।

गोपाल ने पास पङी बेंच पर उससे बैठने का इशारा…

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Added by babitagupta on March 22, 2020 at 11:33pm — 2 Comments

ग़ज़ल -:- ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम

ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम

आरती ख़ुद उतारते हैं हम

फिर भी वैसे के वैसे रहते हैं

ख़ुद को कितना सँवारते हैं हम

दूसरों का मजाक करते हैं

ख़ुद की शेखी बघारते हैं हम

सिर्फ़ अपनी किसी जरूरत में

दूसरों को पुकारते हैं हम

डाल कर दूसरों में अपनी कमी

दूसरों को विचारते हैं हम

जीतने से ज़ियादा आये मज़ा

जब महब्बत में हारते हैं हम

इस खुशी…

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Added by सूबे सिंह सुजान on March 22, 2020 at 2:02pm — 6 Comments

बाहर के डर से लड़ लेंगे भीतर का डर कैसे भागे |(७३ )

 एक गीत

-----------

बाहर के डर से लड़ लेंगे

भीतर का डर कैसे भागे |

**

बचपन से देखा है हमने

अक्सर खूब डराया जाता |

दुःख यही है अपनों द्वारा

ऐसा क़दम उठाया जाता |

छोटी छोटी गलती पर भी

बंद किया जाता कमरे में,

फिर शाला में अध्यापक का

डण्डा हमें दिखाया जाता |

एक बात है समता का यह

लागू रहता नियम सभी पर,

निर्धन या धनवान सभी के

बच्चे रहते सदा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 21, 2020 at 11:30am — 4 Comments

एक अवसर सा मानो हाथ आया जबरन

एक अवसर सा मानो हाथ आया जबरन

 
बहुत दिन बाद
इतिहास के पन्नों पर दर्ज़ होंगे
ये आजकल के दिन
ये जबरन बंद के दिन
 
जब पूरा परिवार
एक पूरे परिवार की तरह
पूरा -पूरा दिन साथ -साथ बैठ…
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Added by amita tiwari on March 20, 2020 at 7:00pm — 1 Comment

ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)

रमल मुसम्मन सालिम मख़्बून महज़ूफ़ / महज़ूफ़ मुसक्किन

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़इलुन/फ़ेलुन

2122 1122 1122 112 / 22

ये सफ़र है बड़ा दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे

राह लगने लगी दीवार ख़ुदा ख़ैर करे [1]

इस किनारे तो सराबों के सिवा कुछ भी नहीं

देखिए क्या मिले उस पार ख़ुदा ख़ैर करे [2]

लोग खाते थे क़सम जिसकी वही ईमाँ अब

बिक रहा है सर-ए-बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे [3]

ये बग़ावत पे उतर आएँगे जो उठ बैठे

सो रहें हाशिया-बरदार ख़ुदा ख़ैर करे…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 20, 2020 at 7:00pm — 16 Comments

बैठे निग़ाहें किस लिए नीची किये हुए (७२ )

(221 2121 1221 212 )

बैठे निग़ाहें किस लिए नीची किये हुए

क्या बात है बताइए क्यों लब सिले हुए

**

काकुल के पेच-ओ-ख़म के हैं अंदाज़ भी जुदा

सर से दुपट्टा जैसे बग़ावत किये हुए

**

मिज़गाँ के साहिलों पे टिकी आबजू-ए-अश्क

काजल बिखेरने की जूँ हसरत लिये हुए

**

क्यों हो गए हैं आपके रुख़्सार आतशीं

जैसे कनेर लाल ख़िज़ाँ में खिले हुए

**

शेरू को ख़ौफ़ इतना है बैठा दबा के दुम

मैना के सुर भी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 20, 2020 at 11:30am — 4 Comments

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