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राजेश 'मृदु''s Blog (78)

तुमसे

तुम ही कहो अब

क्या मैं सुनाऊँ

सरगम के सुर

ताल हैं तुम से

सारी घटाएँ

बहकी हवाएँ

फागुन की हर

डाल है तुमसे

तुम ही कहो .......

तुम बिन अँखियन

सरसों फूलें

रीते सावन

साल हैं तुमसे

तेरी छुअन से

फूली चमेली

शारद की हर

चाल है तुमसे

तुम ही कहो .......

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by राजेश 'मृदु' on December 17, 2013 at 4:11pm — 14 Comments

हाथी हाथ से नहीं ठेला जाता (लघुकथा)

''मिश्रा जी, बेटी का बाप दुनिया का सबसे लाचार इंसान होता है. आपको कोई कमी नहीं, थोड़ी कृपा करें, मेरा उद्धार कर दें. बेटी सबकी होती है.' कहते-कहते दिवाकर जी रूआंसे हो गए । मिश्रा जी का दिल पसीज गया ।

अगले वर्ष घटक द्वार पर आए तो दिवाकर जी कह रहे थे

''अजी लड़के में क्‍या गुण नहीं है, सरकारी नौकर है. ठीक है हमें कुछ नहीं चाहिए, पर स्‍टेटस भी तो मेनटेन करना है. हाथी हाथ से थोड़े ना ठेला जाता है. चलिए 18 लाख में आपके लिए कनसिडर कर देते हैं और बरात का खर्चा-पानी दे दीजिएगा,…

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Added by राजेश 'मृदु' on December 16, 2013 at 1:30pm — 24 Comments

वृद्धाश्रम

भाव की हर बांसुरी में

भर गया है कौन पारा ?

देखता हूं

दर-बदर जब

सांझ की

उस धूप को

कुछ मचलती

कामना हित

हेय घोषित

रूप को

सोचता हूं क्‍या नहीं था

वह इन्‍हीं का चांद-तारा ?

बौखती इन

पीढि़यों के

इस घुटे

संसार पर

मोद करता

नामवर वह

कौन अपनी

हार पर

शील शारद के अरों को

ऐंठती यह कौन धारा ?

इक जरा सी

आह…

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Added by राजेश 'मृदु' on November 30, 2013 at 1:30pm — 34 Comments

गीत (राजेश 'मृदु)

सारथी, अब रुको

ये जुए खोल दो

बस इसी ठांव तक

था नाता तेरा

पथ यहां से अगम

विघ्‍न होंगे चरम

बस इसी गांव तक

था अहाता तेरा

कर्म तरणी सखे

पार ले चल मुझे

सत्‍य साथी मेरे

धर्म त्राता मेरा

होम होना नियम

टूटने दे भरम

नीर नीरव धरा

क्षीर दाता मेरा

जा तुझे है शपथ

कर न मुझको विपथ

फिर मिलूंगा तुझे

है वादा मेरा

(मौलिक एवं…

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Added by राजेश 'मृदु' on November 27, 2013 at 12:33pm — 19 Comments

गीत

मधुमति,

मेरे पदचिन्‍हों को

पी लेता है

मेरा कल

और मेरे

प्राची पनघट पर

उग आते

निष्‍ठुर दलदल

ऐसे में किस स्‍वप्‍नत्रयी की

बात करूं मेरे मादल ?

वसुमति,

मेरे जिन रूपों को

जीता है

मेरा शतदल

उस प्रभास के

अरूण हास पर

मल जाता

कोई काजल

ऐसे में किस स्‍वप्‍नत्रयी की

बात करूं मेरे मादल ?

द्युमति,

मेरे तेज अर्क में

घुल…

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Added by राजेश 'मृदु' on October 31, 2013 at 3:39pm — 14 Comments

एक शोकगीत (राजेश'मृदु')

माते ! मैं ही रहा अभागा

जो तुझको सुख दे न सका

पावन तेरी चरण-धूलि तक

अपने हित संजो न सका

भर नथुनों में अमर गंध तू

ठाकुर का मेहमान हुई

सित फूलों की उस घाटी में

अमर ब्रह्म मुदमान हुई

औ तेरा यह पारिजात मां

गलित गात, क्षत शाख हुआ

खेद-स्‍वेद के तीक्ष्‍ण धार से

गलता-जलता राख हुआ

करूणे ! तेरा वृथा पुत्र यह

तेरी रातें धो न सका

धन,बल,वैभव खूब सहेजा

पर तुझको संजो न…

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Added by राजेश 'मृदु' on October 28, 2013 at 5:30pm — 19 Comments

धर्म हूँ मैं

नख-दंत के संसार में गुम

ढूंढता निज मर्म हूँ  मैं

ये रूचिर

रूपक तुम्‍हारे

गुंबजों की

पीढि़यां

दंगों के

फूलों से चटकी

कुछ आरती,

कुछ सीढि़यां

थुथकार की सीली धरा पर

सूखता गुण-धर्म हूँ मैं

रंगों की

थोड़ी समझ है

कृष्‍ण तक तो

श्‍वेत था

आह्लाद के

परिपाक में भी

एकसर

समवेत था

युगबोध पर कहता मुझे है

कि नहीं यति-धर्म हूँ…

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Added by राजेश 'मृदु' on September 26, 2013 at 1:29pm — 24 Comments

तुमको देखे

तुमको देखे

बरसों बीते

सूखे फूल

किताबों में

अहिवाती बस

एक छुअन ही

रही महकती

हाथों में

मन के कोरे

काग़ज भी तो

क्षत को गिरे

प्रपातों में

अनगिन पारिजात

मगर तुम

रख गए

कलम-दावातों में

आओ ना

इस इंद्रधनुष पर

दो पल बैठें

बात करें

शावक जैसी

कोमल राते

उतर रही

आहातों में

(सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by राजेश 'मृदु' on September 23, 2013 at 1:06pm — 16 Comments

लिखो ना

स्‍वाति सी कोई कथा-कहानी

चातक का इक शहर, लिखो ना

कसमस करती

इक अंगड़ाई

गुनगुन गाता

भ्रमर, लिखो ना

चैताली वो रात सुहानी

शारद-शारद

डगर, लिखो ना

किसी कास की शुभ्र हँसी में

होती कैसी लहर, लिखो ना

इक देहाती

कोई दुपहरी

पीपल की

कुछ सरर, लिखो ना

शीशे सा वो

थिरा-थिरा जल

अनमुन बहती

नहर, लिखो ना

पारिजात की भीनी खुशबू

धिमिद धिमिद वो…

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Added by राजेश 'मृदु' on September 6, 2013 at 11:33am — 18 Comments

राम रम में घोलकर वो /लिख रहे चौपाईयां

राम रम में घोलकर वो

लिख रहे चौपाईयां

कोंपले, कत्‍थई, गुलाबी

औ हरी पुरवाईयाँ

पा भभूति हो चली हैं

पेट वाली दाईयाँ

खोल मुँह बैठा कमंडल

सुरसरि की आस में

ध्‍यान भी, करता यजन भी

डामरी उल्‍लास में

पर सरफिरा हाकिम समझता

खिज्र की रानाईयाँ

चूडि़याँ टुन से टुनककर

छन से पड़ी जिस होम में

बड़ा असर रखता गोसाईं

नीरो के उस रोम में

नरमेध के इस अश्‍व…

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Added by राजेश 'मृदु' on August 29, 2013 at 2:51pm — 17 Comments

सावन गीत (राजेश कुमार झा)

सांवरी सुन सांवरी

आई मधुर मधुश्रावणी



नभ मीत हृद पर दामिनी

नव ताल से इठला रही

या दिगंबर को उमा

अपनी झलक दिखला रही



सुन सौरभे, हर-गौर,…

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Added by राजेश 'मृदु' on August 12, 2013 at 4:00pm — 19 Comments

जिद अपनी छोड़े ना

देहरी लांघ चली

आशाएं

मुंह बाएं प्रीत

भगोना

अँखुवाती भर देह

विवशता

जिद अपनी छोड़े ना

आदिम सब

चट्टान…

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Added by राजेश 'मृदु' on July 18, 2013 at 4:30pm — 5 Comments

बंजर बादल चूम रहे हैं/फिर से प्रेत शिलाएं

बंजर बादल चूम रहे हैं

फिर से प्रेत शिलाएं

लोकतंत्र की

लाश फूलती

गंध भरे

गलियारों में

यहां-वहां बस

काग मचलते

तुष्‍ट-पुष्‍ट

ज्‍योनारों में

नित्‍य बिकाउ नारे लेकर

चलती तल्‍ख हवाएं

गंगा का भी

संयम टूटा

वक्र बही

शत धारों में

क्षुब्‍ध, कुपित

पर्वत, हिमनद भी

कह गए बहुत

ईशारों में

पछताते चरणों से लौटी

कितनी विकल…

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Added by राजेश 'मृदु' on July 11, 2013 at 4:52pm — 16 Comments

नवगीत (राजेश कुमार झा)

इक औरत सी तन्‍हाई को

जब यादें कंधा देती हैं

दीर्घ श्‍वांस की

चंड मथानी

मथ जाती

देह-दलानों को

टूटे प्‍याले

रोज पूछते

कम-ज्‍यादा

मयखानों को

गलते हैं हिमखण्‍ड कई पर

धारा कहां निकलती है

नि:शब्‍द सुलगती

रात पसरती

उष्‍ण रोध दे

प्राणों को

कौन रिफूगर

टांक सकेगा

इन चिथड़े

अरमानों को

कैसे पाउं मंजिल ही जब

पल-पल जगह बदलती…

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Added by राजेश 'मृदु' on July 10, 2013 at 1:24pm — 23 Comments

तुलसी की चौपाई में

तमस मंथरा

के निवास में

ईच्‍छा जब

पग धरती है

**दश रथों की

धीर धुरी भी

विकल हाथ

बस मलती है

ऐसे में

अक्‍सर ही संयम

दूर भरत सा

रहता है

हो अधीर कुछ

मनस लखन भी

चाप चढ़ाए

फिरता है

बस विवेक तब

राम रूप में

सबको पार

लगाते हैं

ज्ञान तापसी

वेश सिया धर

बढ़ते चल

कह जाते हैं

इतना ही तो

लिखा हुआ है

तुलसी…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on July 5, 2013 at 12:01pm — 9 Comments

प्रेम तुम्‍हारी कविता है

प्रेम तुम्‍हारी कविता है…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on June 14, 2013 at 2:01pm — 11 Comments

बस इतनी सी ख़ता हमारी

बस इतनी थी

खता हमारी

कि थोड़ा

जीना चाहा

कॉफी के

हर घूंट में हमने

कितना कुछ

पीना चाहा

मगर बेहया

इन रातों को

इतना भी

मंजूर न था

पलट हंसा

सारे प्रश्‍नों को

जब उत्‍तर कुछ

दूर ना था

और छपे तब

कितने किस्‍से

चेहरे के

अखबार में

समझ चुका था

गहन दहन ही

मिलता इस

संसार में

बस इतनी थी

ख़ता हमारी

कि…

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Added by राजेश 'मृदु' on May 21, 2013 at 1:11pm — 7 Comments

प्रवाह

हर रात

देखता हूं

एक नदी का सपना

जो भरती है

निर्मल धार

उष्‍ण अंतस की गहराई तक

नसों में बहते लावे

जिसके घने स्‍पर्श से

जीवंत हो उठते हैं

पर आंख खुलते ही

घबरा जाता हूं

जब देखता हूं

जलती रेत पर

फड़फड़ाते अंश को

और देह भी तब

भिनभिनाने लगती है

थके डैने थाम पंछी

भी तो सुस्‍ताते नहीं

और फिर

पन्‍नों पर दिखती है

दरिया की लकीरें

सिमटी हुई

इंच दर…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on May 14, 2013 at 4:10pm — 12 Comments

ये सच है मां

मेरे हित

सच है मां तुमने

केवल जन्‍नत

मांगी थी

सच कहना पर

कब बहना हित

कोई मन्‍नत

मांगी थी ?

सदा-सर्वदा

तेरा पूजन

रहा पिता या

मेरे नाम

बहना का पर

रहा हमेशा

एक वहीं

सबका श्रीराम

सच कहना

कब उसकी खातिर

कितनी चौखट

लांघी थी

सदा सर्वदा

मेरी खातिर

दुआ नहीं क्‍या

मांगी थी ?

और सास बन

तुमने ही…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on May 13, 2013 at 5:21pm — 12 Comments

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