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Sushil Sarna's Blog (899)

तुम्हारे हृदय में ....

तुम्हारे हृदय में ...

ये

समय ठहरा था

या कोई स्मृति

वाचाल बन

मेरी शेष श्वासों के साथ

चन्दन वन की गंघ सी

मुझे

कुछ पल और

जीवित रखने का

उपक्रम कर रही थी

ये

समय का कौन सा पहर था

मैं पूर्णतयः अनभिज्ञ था

अपनी क्लांत दृष्टि से

धुंधली होती छवियों में

स्वयं को समाहित कर

अपने अंत को

कुछ पल और

जीवित रखने का

असफ़ल

प्रयास कर रहा था

शायद किसी के

इंतज़ार में

तुम…

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Added by Sushil Sarna on July 3, 2017 at 6:00pm — 8 Comments

ज़िंदगी के सफ़हात...

ज़िंदगी के सफ़हात ...

हैरां हूँ

बाद मेरे फना होने के

किसी ने मेरी लहद को

गुलों से नवाज़ा है

एक एक गुल में

गुल की एक एक पत्ती में

उसके रेशमी अहसासों की गर्मी है

नाज़ुक हाथो की नरमी है

कुछ सुलगते जज़्बात हैं

कुछ गर्म लम्हों की सौगात है

काश

तुम मेरे शिकवों को समझ पाते

जलते चिराग का दर्द समझ पाते

मेरी पलकों को

इंतज़ार की चौखट में

कैद करने वाले

कितना अच्छा होता

साथ इन गुलों के

तुम भी आ जाते…

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Added by Sushil Sarna on June 25, 2017 at 9:30pm — 4 Comments

पीते हैं ...

पीते हैं ...

सब 

कुछ न कुछ

पीते हैं //



रजनी

सांझ को

पी जाती है

और सहर

रजनी को

फिर सांझ

सहर को

सच

सब

कुछ न कुछ

पीते हैं //

अंत

आदि को

पंथ

पथिक को

संत

अनंत को

घाव

भाव को

सच

सब

कुछ न कुछ

पीते हैं //



नयन

नीर को

नीर

पीड़ को

समय

प्राचीर को

सरोवर

तीर को

सच

सब

कुछ न कुछ

पीते हैं…

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Added by Sushil Sarna on June 23, 2017 at 7:22pm — 4 Comments

सौगंध के बंधन ....

सौगंध के बंधन ....

मुझे

सब याद है

समय की गर्द में

कुछ भी तो नहीं छुपा

न तुम

न तुम्हारी

आँखों में आंखें डालकर

सात जन्मों तक

साथ निभाने की

सौगंध

चलते रहे

चलते रहे

साथ साथ

इक दूजे के दिल में

पुष्प भाव से गुंथे हुए

अर्थपूर्ण तृषा

और अर्थपूर्ण तृप्ति की

अभिलाष के साथ

इक दूसरे  के

अंतर्मन को छूते हुए

कब यथार्थ की नदी पर

एक किनारे ने

दूसरे किनारे को जन्म…

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Added by Sushil Sarna on June 23, 2017 at 4:21pm — 8 Comments

अनकहा ...

अनकहा ...

कुछ तो

रहने दिया होता

मन की कंदराओं में

करवटें लेता

कोई भाव

अनकहा

क्या

ज़रूरी था

स्मृति पृष्ठ की

यादों को

नयन तीरों का

पता देना

आखिर

पता लग गया न

ज़माने को

सब कुछ

जो दबा के रखा था

दिल में

इक दूजे से

बांटने के लिए

सांझा दर्द

अनकहा

सांझ

कब तलक

तिमिर को रोकती

प्रतीक्षा की रेशमी डोरी

प्रभात की तीक्षण रश्मियों से…

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Added by Sushil Sarna on June 21, 2017 at 3:25pm — 8 Comments

तुम्हारी कसम ...

तुम्हारी कसम ...

सच

तुम्हारी कसम

उस वक़्त

तुम बहुत याद आये थे

जब

सावन की फुहारों ने

मेरे जिस्म को

भिगोया था

जब

सुर्ख़ आरिज़ों से

फिसलती हुई

कोई बूँद

ठोडी पर

किसी के इंतज़ार में

देर तक रुकी रही

जब

तुम्हारे लबों के लम्स

देर तक

मेरे लबों से

बतियाते रहे

जब

घटाओं की

कड़कती बिजली में

मैं काँप जाती

जब

बरसाती तुन्द हवाओं से…

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Added by Sushil Sarna on June 15, 2017 at 9:35pm — 6 Comments

1 . नटखट नज़र .../2 . भीगी सौगातें ...

1 . नटखट नज़र ...

हो जाती बरसात तो गज़ब  होता
फिर वो भीगी हया का क्या होता
वो उड़ती चुनर पे नटखट  नज़र
भटक जाती अगर तो क्या  होता

2 . भीगी सौगातें ..

.

सावन की रातें हैं सावन की बातें है 

सावन में भीगी सी चंद मुलाकातें है
इक दूजे में सिमटे वो भीगे से  लम्हे
साँसों की साँसों को भीगी सौगातें हैं

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on June 14, 2017 at 1:30pm — 4 Comments

मैं तस्वीर हो गया ...

मैं तस्वीर हो गया ...

क्यूँ

मेरी तस्वीर को

दीवार पर लगाते हों

एक कल को

वर्तमान बनाते हो

आज तक

कोई मेरे चेहरे को

पढ़ न पाया था

हर अपने ने मुझे

अपने स्वार्थ का

मोहरा बनाया था

मेरी हंसी भी मज़बूर थी

मेरा अश्क भी पराया था

यूँ जीवित रहने का

मैंने हर फ़र्ज़ निभाया था

चलो अच्छा हुआ

मैं एक अनकही तहरीर हुआ

बेगानों से अपनों की

ज़ागीर हुआ

अब मेरा सम्मान मोहताज़ नहीं

किसे से छुपा कोई राज़ नहीं…

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Added by Sushil Sarna on June 12, 2017 at 3:00pm — 5 Comments

बाज़ुओं में ....

बाज़ुओं में ....

कौन रोक पाया है

समय वेग को

अपने गतिशील चक्र के नीचे

हर पल को रौंदता

चला जाता है

और लिख जाता है

धरा के ललाट पर

न मिटने वाली

दर्द की दास्तान

शायद

तुमने मेरे चेहरे की लकीरों को

गौर से नहीं देखा

तुमने सिर्फ

मुहब्बत के हर्फ़ पढ़े हैं

उन हर्फों को

बेहिजाब होते नहीं देखा

किर्चियों से चुभते हैं

जब ये हर्फ़

समय के अश्वों की

टापों के नीचे

बे-आवाज़ फ़ना हो जाते…

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Added by Sushil Sarna on June 9, 2017 at 3:52pm — 4 Comments

स्पंदन....

1,स्पंदन......(२ मुक्तक)  :

व्यर्थ व्यथा है हार जीत की
निशा न जाने पीर  प्रीत की
नैन बंध सब शुष्क  हो  गए
आहटहीन हुई राह मीत की
.... ..... ..... ..... ..... ..... ..... ....

2.

गंधहीन हुए चन्दन  सब
स्वरहीन हुए क्रंदन  सब
स्मृति उर से रिसती रही
मौन हो गए स्पंदन  सब

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on June 9, 2017 at 12:54pm — 6 Comments

श्वासों का क्षरण ...

श्वासों का क्षरण ...

मैं

बहुत रोयी थी

अपने एकांत में

तेरे बाद भी

कई रातों तक

तेरे अंक में सोयी थी

तेरा जाना

एक घटना थी शायद

दुनियां के लिए

मगर

असंभव था

तुझे विस्मृत करना

मैं तेरे गर्भ के अंक की

पहचान थी

और तू

मेरे स्मृति अंक की श्वास

सच

कोई भी नहीं देख पाया

मेरे रुदन को

तूने कैसे देख लिया

शुष्क पलकों में

तू मुझसे कल

मिलने आयी थी

अपने अंक में

तूने मुझे सुलाया…

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Added by Sushil Sarna on June 7, 2017 at 4:14pm — 6 Comments

खूंटी पर टंगी कमीज़ को ....

खूंटी पर टंगी कमीज़ को ....

जब जब

मैं छूती हूँ

खूंटी पर

टंगी कमीज़ को

मेरा समूचा अस्तित्व

रेंगने लगता है

उस स्पर्शबंध के आवरण में

जहां मेरा शैशव

निश्चिंत सोया करता था

अब

जब आप नहीं रहे

मैं इस कमीज़ में

आपको महसूस करती हूँ

सामना करती हूँ

हर उस दूषित दृष्टि का

जो मेरे शरीर पर

अपनी कुत्सित भावनाओं की

खरोंचें डालती है

मेरी दृष्टिहीनता को

मेरी कमजोरी मानती है

न, न

आप…

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Added by Sushil Sarna on June 5, 2017 at 4:11pm — 7 Comments

तृषित ज़िंदगी ...

तृषित ज़िंदगी ...

गाँव की
उदास और चुप शाम

टूटे छप्पर
हवाओं से
बिखरे तिनके
बयाँ कर रहे थे
ज़ुल्म आँधियों का

बिखरे 

रोटियों के टुकड़े
और
टूटे हुए मटके में
दो हाथों के इंतज़ार में
ठहरा
तृप्ति को तरसता
अतृप्त पानी
कह रहा था
चली गयी
शायद
कोई  ज़िंदगी

तृषित ही 

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 31, 2017 at 2:00pm — 8 Comments

वो घर मेरा नहीं ...

वो घर मेरा नहीं ...



कितना कठिन है

अपने घर का पता जानना



लौट जाते हैं

हर बार

आकर भी

घर के पास से हम

किस से पूछें  पता 

सभी मुसाफिर लगते हैं

अपने घरों से

अंजाने लगते हैं

जानते हैं

ये घर

हमारा नहीं

फिर भी

उसको घर मानते हैं



टूट जाते हैं

जो पत्ते शज़र से

फिर वो शज़र

उनका घर नहीं रह जाता

हो जाते हैं

वो हवाओं के हवाले

घर के पास होते हुए भी…

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Added by Sushil Sarna on May 30, 2017 at 6:00pm — 9 Comments

विश्वास ...

विश्वास ....

क्या है विश्वास

क्या वो आभास

जिसे हम

केवल महसूस कर सकते हैं

और गुजार देते हैं ज़िंदगी

सिर्फ़ इस यकीन पर कि

एक दिन तो

उसे हम स्पर्श कर लेंगे

छू लेंगे एक छलांग में

आसमान को

या

वो है विश्वास

जिसे हम जानते हुई भी

कि वो

चाहे कितना भी

हमारी साँसों के करीब क्यूँ न हो

छोड़ देगा

हमारा साथ

निकल जाएगा चुपके से

हमारे क़दमों के नीचे से

जैसे

ज़मीन होने का…

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Added by Sushil Sarna on May 22, 2017 at 8:30pm — 2 Comments

अँधेरे ...

अँधेरे ...

किसने

स्वर दे दिए

रजनी तुम्हें

तुम तो

वाणीहीन थी

मूक तम को

किसने स्वरदान दे दिया

शून्यता को बींधते हुए

कुछ स्वर तो हैं

मगर

अस्पष्ट से

क्षण

तम के परिधान में

सुप्त से प्रतीत होते हैं

भाव

एकांत के दास हैं

शायद

तुम

इस तम की

वाणीहीनता का कारण हो

पर हाँ

ये भी सच है कि

तुम ही इस का

निवारण भी हो

दे दो प्राण

इन एकांत

अँधेरे को

छू लो इन्हें…

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Added by Sushil Sarna on May 17, 2017 at 5:18pm — 6 Comments

स्वप्न साधना ....

स्वप्न साधना ....



निस्सीम प्रीत के

मधुपलों में

हो समर्पित

चिर सुख की

मिलन वेला में

खो गयी मैं

और हार के

स्वयं को स्वयं से

अमर जीत

हो गयी मैं



करती रही

क्षण क्षण संचित

एकांत वास में

अपने प्रिय के

प्रीतपाश का



विस्मृत कर

विभावरी के

अंतकाल को

श्वास स्पंदन

की मिलन गंध को

विभावरी के

शेष पलों में

जीती रही मैं



शून्य हुआ

तुम बिन हर पल

श्वास मेरी… Continue

Added by Sushil Sarna on May 15, 2017 at 7:23pm — 9 Comments

स्मृति पृष्ठ ...

स्मृति पृष्ठ ...

रजनी के

श्यामल कपोलों पर

मेघों की बूंदों ने

व्यथित यादों के

पृष्ठों पर जैसे

सान्तवना का

आभासीय श्रृंगार कर डाला

दृग कलशों से

सजल वेदना

प्रीत की

पराकाष्ठा को

चेहरे की लकीरों में

शोभित करती रही

प्राण और देह में

जीवन संघर्ष चलता रहा

किसी को विस्मरण करने के

सभी उपचार

रेत की भित्ति से

ढह गए

थके नयन

आशा क्षणों की

गहन कंदराओं में…

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Added by Sushil Sarna on May 9, 2017 at 3:59pm — 13 Comments

बोझ ...(250 वीं रचना )

बोझ ...

हम

कहाँ जान पाते हैं

चेतन या अवचेतन में

अटकी हुई कुंठाओं की

मूक भाषा को

उनींदी सी अवस्था में

कुछ सिमटी हुई

आशाओं को

मन में उबलते

एक असीमित बोझ की

पहचान को

साँसों की थकान

अश्रु की व्यथा

और

रुदन के आह्वान को

तुम्हारे

स्पर्श की अनुभूति में लिप्त

क्षणों की

परिणिती के आभास ने

यूँ तो

अंजाने संताप से

मुक्ति का ढाढस दिया

किन्तु…

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Added by Sushil Sarna on May 4, 2017 at 4:59pm — 12 Comments

गर्व ....

गर्व ....

रोक सको तो

रोक लो

अपने हाथों से

बहते लहू को

मुझे तुम

कोमल पौधा समझ

जड़ से उखाड़

फेंक देना चाहते थे

मेरे जिस्म के

काँटों में उलझ

तुमने स्वयं ही

अपने हाथ

लहू से रंग डाले

बदलते समय को

तुम नहीं पहचान पाए

शर्म आती है

तुम्हारे पुरुषत्व पर

वो अबला तो

कब की सबला

बन चुकी ही

जिसे कल का पुरुष

अपनी दासी

भोग्या का नाम देता था

देखो

तुम्हारे…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 28, 2017 at 5:00pm — 6 Comments

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